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सुख-दुख

बिहार के पत्रकार सुनील सौरभ का निधन

मदन तिवारी-

पत्रकार सुनील सौरभ जी नहीं रहे। कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। गया के एम्स में इलाज शुरू हुआ था। फिर पारस अस्पताल पटना ले जाया गया और वही उनकी मृत्यु हो गई।

आजकल मृत्यु का कोई ठिकाना नहीं रहा गया है। कब आ जाए। सौरभ जी से बहुत पुराना नाता रहा है। उन्होंने उस बुरे समय में मेरी मदद की है जब बेहद नजदीकी लोग भी मेरे खिलाफ थे। उस समय वह हिंदुस्तान अखबार के गया के प्रभारी थे।

सुनील सौरभ जी आजकल मगध में बिखरे इतिहास पर लेखन कर रहे थे। रोज नई कल्पना, नई प्लानिंग, सब धरा रह जाता है। मौत आती है एक पल में सबकुछ खत्म हो जाता है। सुनील सौरभ जी का जाना मेरे लिये व्यक्तिगत क्षति है। एक बहुत बड़े स्तंभ थे। निर्भीक। सच के लिए दुनिया के खिलाफ कलम उठाने वाले। ऐसे पत्रकार नही मिलते।

कभी कभी हम खुद मौत को निमंत्रण देते हैं। पत्रकार सुनील सौरभ जी की पारस अस्पताल में ईलाज के दौरान मृत्यु हो गई। पैनक्रियाज में इंफेक्शन था। पारस अस्पताल तो मुझे भी मार चुका था। तकरीबन 8-9 साल पहले की बात है। तबियत बहुत खराब हो गई। मेडिकल हॉस्पिटल गया। वहां मोनोसेफ दिया, कुछ टेस्ट लिखा, जिसकी जांच बाहर से करवाना था। रिपोर्ट दो दिन बाद आती, लेकिन रात 10 बजे हालत बहुत ही गंभीर हो गया। एडमिट होना जरूरी हो गया।

गया जिले के 2-3 प्राइवेट में गया। रिस्क बताकर किसी ने भी एडमिट नही किया। ऑपरेशन में रिस्क था। एक डॉक्टर ने तो यहां तक कह दिया कि सेप्टीसीमिया हो गया है। मैं उस तकलीफ में भी हंसा। डाक्टर को कहा, मेरे होंठ पर सूजन नहीं है। सिर्फ पेट, पैर वगैरह में सूजन के आधार पर multi organ failure नहीं कहा जा सकता। परिवार रो रहा था। एम्बुलेंस पर आक्सीजन लगाकर पटना पारस में आईसीयू में भर्ती किया गया।

3 दिन तक अलग अलग चेक का ड्रामा होता रहा।

रात में एक लेडी डाक्टरनी आई उसने अल्ट्रा साउंड लिया, लेकिन पेट को जगह जगह इतने जोर से दबाया की दर्द से तड़पने लगा। खैर निर्णय तो मैंने ले लिया, यह मार देगा यहां ईलाज नही कराना। दूसरे दिन राउंड पर डॉक्टरों की टीम आई। हालचाल पूछा, गुस्सा तो था ही। बोला- वह बेहूदी डाक्टरनी कहाँ है, उस बेहूदी को अल्ट्रा साउंड तक करने नहीं आता, डिस्चार्ज कर हमको। तैयार नहीं हो रहा था, खूब गाली दी।

वाइफ को बुलाया। चेयर मंगाया। बैठकर लिफ्ट में ले जाने के लिए कहा, सिक्युरिटी कमीना रोकने लगा। वहां भी खूब गाली। कोर्ट में समझेंगे। हत्या करता है तुम्हारा अस्पताल। बाद में पूरा मैनेजमेंट नीचे आकर माफी मांगने लगा। वहां से गाड़ी से निकला। अपने डॉक्टर एस एन मिश्रा जी को फोन किया। मोनोसेफ का इंजेक्शन लेने के लिए बोले, तुरन्त आराम मिला। किडनी फैलयुर की बात हो रही थी। ऑपरेशन तक नहीं करवाया। 6 महीने बेड पर रहा, ठीक हो गया।

सुनील सौरभ जी को कोई खास समस्या नहीं थी। पैंक्रियाज में स्टोन हो भी तो आपरेट होता है। वैसे स्टोन हो या घाव, समय लगता है। दवा से भी ठीक रहता है। गया में डाक्टर रतन अच्छे डाक्टर हैं। उनसे सलाह लेनी चाहिए थी। पिलग्रिम के डॉक्टर भी कह रहे थे कि आपरेट हो जाएगा, ठीक हो जायेंगे। न जाने किस काबिल सलाहकार ने पारस में भर्ती करने का सुझाव दिया। अगर दिया भी था तो ऑपरेशन के लिए 10-12 दिन इंतजार क्यों ?

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