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डीबी कॉर्प लिमिटेड को लेबर कोर्ट से लगा बड़ा झटका, फुल बैक वेजेस के साथ अस्बर्ट गोंसाल्विस को नौकरी पर रखने का आदेश

मुंबई से एक बड़ी खबर आ रही है… यहां के माननीय लेबर कोर्ट से “डी. बी. कॉर्प लि.” को बड़ा झटका लगा है ! 8वें लेबर कोर्ट की जज श्रीमती एस. एम. औंधकर ने अस्बर्ट गोंसाल्विस को न सिर्फ नौकरी पर पुनः रखने का आदेश दिया है, बल्कि आदेश में अस्बर्ट को फुल बैक वेजेस भी प्राप्त करने योग्य माना है ।

आपको बता दें कि “डी. बी. कॉर्प लि.” नामक मातृ कंपनी के अंतर्गत भारत में मुख्य रूप से तीन अखबारों का प्रकाशन किया जाता है – ‘दैनिक भास्कर’ (हिंदी), ‘दिव्य भास्कर’ (गुजराती) और ‘दिव्य मराठी’ (मराठी) । सन् 2008 के फरवरी महीने में “डी. बी. कॉर्प लि.” (दैनिक भास्कर) ने मुंबई स्थित अपने कार्यालय में अस्बर्ट गोंसाल्विस (एंप्लॉई कोड: 13688) की जब सिस्टम (कंप्यूटर) इंजीनियर के तौर पर नियुक्ति की, तब से सन् 2016 के मध्य तक सब कुछ ठीक-ठाक चला… समय-समय पर अस्बर्ट का इंक्रीमेंट भी होता रहा ! लेकिन इसी दौरान अस्बर्ट ने मजीठिया अवॉर्ड की मांग क्या कर दी, कंपनी में मानो भूचाल आ गया !! अब कंपनी को अस्बर्ट में कमियां ही कमियां नज़र आने लगीं और आखिरकार 31 अगस्त, 2016 को उन्हें टर्मिनेट कर दिया गया !!!

अस्बर्ट गोंसाल्विस ने मुंबई स्थित लेबर कमिश्नर के समक्ष इसकी शिकायत की, जहां महीनों तक चली सुनवाई के बाद मामले को माननीय श्रम न्यायालय में भेज दिया गया । यहां बरसों तक चली सुनवाई के दौरान कंपनी ने ऐसे हर दांव-पेंच आजमाए, जिसके चलते मामले को ज्यादा से ज्यादा डिले किया जा सके… कोरोना काल ने भी इसमें कंपनी की काफी मदद की । बहरहाल, कहते हैं न- जाको राखे साइयां… सन् 2022 के मध्य में अदालत के समक्ष “डी. बी. कॉर्प लि.” (मुंबई) की एचआर हेड अक्षता करंगुटकर की पहली गवाही हुई, तत्पश्चात आईटी हेड शिवेन्द्र शर्मा की गवाही की डेट सुनिश्चित की गई । लेकिन अपना एफिडेविट देने के बावजूद श्री शर्मा करीब 8 महीने बाद गवाही देने से पीछे हट गए, जिसके बाद फर्स्ट पार्टी (डी. बी. कॉर्प लि.) के वकील वी. बी. कांबले और सेकंड पार्टी (अस्बर्ट गोंसाल्विस) के वकील विनोद शेट्टी के बीच अदालत में बहस की शुरुआत हुई ।

‘दैनिक भास्कर’ (डी. बी. कॉर्प लि.) का आरोप था कि अस्बर्ट वर्कमैन नहीं हैं, वह एडमिनिस्ट्रेटिव कैपेसिटी में आते हैं । इस कारण अस्बर्ट सेक्शन 25 की परिभाषा में नहीं आते, साथ ही 20 (जे) फॉर्म पर दस्तखत करने की वजह से वह किसी भी बेनिफिट के पात्र नहीं हैं ! कंपनी का कहना था कि अस्बर्ट के खिलाफ लगातार शिकायतें आ रही थीं… अस्बर्ट को बार-बार चेतावनी दी गई थी और अपना काम व व्यवहार सुधारने के लिए उन्हें तीन महीने का समय भी दिया गया था, पर कोई सुधार / बदलाव नहीं होने के कारण ‘दैनिक भास्कर’ प्रबंधन के पास उन्हें टर्मिनेट करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था !!

इसके जवाब में अस्बर्ट के विद्वान वकील श्री शेट्टी के रखे तर्कों और सबूतों से अदालत पूरी तरह सहमत और संतुष्ट नज़र आई, मसलन- अस्बर्ट परमानेंट एंप्लॉई थे, जिन्हें कोई चार्जशीट नहीं दी गई… 30 अगस्त, 2016 को ई-मेल करके उन्हें सीधे टर्मिनेट कर दिया गया, जो कि पूरी तरह गैर-कानूनी था ! यही नहीं, अदालत ने श्री कांबले के सायटेशन को जहां केस से संबंधित मानने से इनकार कर दिया और कहा कि वे फर्स्ट पार्टी (डी. बी. कॉर्प लि.) की मदद नहीं करते, वहीं श्री शेट्टी द्वारा प्रस्तुत सायटेशन को केस से संबंधित माना कि वे लीगल होने का समर्थन करते हैं ।

माननीय जज ने इश्यूज से संबंधित अपने ऑब्जर्वेशन में भी कहा है- ‘यह सिद्ध करना फर्स्ट पार्टी का दायित्व था कि वह सिद्ध करे, अस्बर्ट वर्कमैन नहीं हैं… फर्स्ट पार्टी यह सिद्ध नहीं कर पाई । दूसरी ओर यह सिद्ध करने का दायित्व सेकंड पार्टी (अस्बर्ट गोंसाल्विस) का था कि वह सिद्ध करे कि उसका टर्मिनेशन इल्लीगल है… अस्बर्ट को यदि 6 इंक्रीमेंट मिले हैं तो फिर वह नाकारा कैसे हुए ? अक्षता करंगुटकर ने अस्बर्ट के खिलाफ मौखिक शिकायतें मिलने की बात तो मानी, पर इसके समर्थन में वह कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाईं ।’ गौरतलब है कि फर्स्ट पार्टी तो यह भी सिद्ध नहीं कर पाई कि शिवेन्द्र शर्मा के पास अस्बर्ट को टर्मिनेट करने का अधिकार था… अस्बर्ट के अप्वाइंटमेंट लेटर में क्लॉज होने के बावजूद कंपनी द्वारा उन्हें नोटिस पीरियड के एक महीने की सैलरी का न तो प्रूफ दिया गया, न ही कंपनी ने अस्बर्ट को रिलीविंग लेटर इश्यू किया ।

माननीय अदालत ने यह भी पाया कि ‘आरोप लगने के ही कारण अस्बर्ट को कहीं भी नौकरी नहीं मिली, इसलिए उन्हें अब तक बेरोजगार रखने की जिम्मेदारी पूरी तरह “डी. बी. कॉर्प लि.” की है । अस्बर्ट का टर्मिनेशन इल्लीगल है और वह विक्टिमाइज हुए हैं !’ इन सभी तथ्यों और तर्कों संग अस्बर्ट गोंसाल्विस के सर्विस के पीरियड को देखते हुए जज श्रीमती औंधकर ने अपना फैसला सुनाया है- ‘सेकंड पार्टी 1 सितंबर, 2016 से अब तक फुल बैक वेजेस के साथ-साथ कंपनी द्वारा प्रदत्त अन्य लाभ पाने एवं नौकरी पर पुनः रखे जाने की अधिकारी है ।’ आखिर में अदालत ने स्टेट गवर्नमेंट को निर्देश दिया है कि अस्बर्ट गोंसाल्विस के अवॉर्ड के अनुपालन हेतु वह समुचित कदम उठाए !

बहरहाल, “डी. बी. कॉर्प लि.” के विरुद्ध आए इस फैसले से देश भर के पत्रकारों में उत्साह की लहर है ! इस जीत का श्रेय सत्य और अपनी टीम को दे रहे अस्बर्ट गोंसाल्विस ने बड़ी सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की है- ‘मुझे तो पता था कि मैं सही हूं, लेकिन अदालत को यह विश्वास दिलाना मेरे वकील शेट्टी सर के हाथ में था । सर ने बहुत मजबूती से मेरा पक्ष रखा, जबकि मेरा धैर्य बनाए रखने और हौसला बढ़ाने में मेरी पूरी टीम का योगदान है… खासकर, हमारी ‘न्यूजपेपर एंप्लॉईज यूनियन ऑफ़ इंडिया’ (NEU India) के जनरल सेक्रेटरी धर्मेन्द्र प्रताप सिंह और वाइस प्रेसीडेंट शशिकांत सिंह से मिले सहयोग के लिए मैं उनका सदैव आभारी रहूंगा !’

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1 Comment

1 Comment

  1. Mahamajithia Mission

    May 13, 2023 at 2:38 pm

    Ye log kuchh nahi denge
    Netaji log maal kha rahe hain
    Arjun Chaudhary
    Chandigarh

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