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‘आदिपुरुष’ से सबसे अधिक नुकसान मनोज मुन्तशिर को हुआ है!

डॉ अरविंद मिश्रा-

आदिपुरुष से यदि सबसे अधिक कोई नुकसान हुआ है तो वह मनोज मुन्तशिर की इमेज को। और जैसा कि आम भारतीयों की फितरत है वह निन्दा करने का कोई अवसर गवांना नहीं चाहता। और जयकारा लगाने का भी। विजेता क्रिकेट टीम का पलक पांवड़े बिछाकर स्वागत और वही टीम हारकर लौटे तो हाय हाय और जूते की माला। आम भारतीय संजीदा नहीं है वह अतिवादी है। या भोला-भाला। क्या कहा जाय?

मनोज मुन्तशिर एक विलक्षण प्रतिभा हैं। उनकी प्रतिभा के उदाहरण यत्र तत्र सर्वत्र डिजिटल मीडिया में बिखरे हुए हैं। मुन्तशिर उपनाम को ही चरितार्थ करते हुये। पक्के राष्ट्रवादी हैं। मुगल शासन और शासकों के प्रबल और मुखर विरोधी। हिन्दू भावनाओं के चीयर लीडर। अब एक फिल्म में यदि अपने पेशागत मजबूरियों के आगे इस शख्स को थोड़ा झुकना पड़ गया तो शुरु हो गया हिन्दी पट्टी में हंगामा। हो हल्ला। भाई! घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा ही।

मनोज मुन्तशिर ने भले ही आदिपुरुष के लिजलिजे संवाद लिखे हों तो उन्हें इस तरह भला बुरा कहने की जरुरत नहीं है। वह उनकी रोजी रोटी का मामला है। इस शख्सियत को इस नजरिये से अलग देखने की जरुरत है। वे निश्चय ही और खरे और चमक के साथ उभरेंगे। उनके तमाम अन्य कामों को देखने की जरुरत है। आज हिन्दुओं में जिस प्रतिनिधित्व और मुखरता की जरुरत है मनोज उसकी जीवंत अभिव्यक्ति हैं।

आदिपुरुष के पीछे व्यावसायिकता की जो निर्लज्ज प्रवृत्ति है उसने ही सब बंटाधार किया है। पुरुषोत्तम श्रीराम के चरित्र के प्रस्तुतिकरण में जिस शुचिता विनम्रता और समर्पण की जरुरत है वह मूल भावना ही इस फिल्म के निर्माण में नदारद है। फिर तो कूड़ा ही सामने आना था। यह किसी अकेले मुन्तशिर के वश का नहीं था कि वह फिल्म को डूबने से बचा ले।

हमारी यह आलोचना और दुत्कार प्रवृत्ति कई बार खास अपनों को हमसे छीन लेती है। अलग कर देती है। और लक्षित व्यक्ति इतना हतोत्साहित हो उठता है कि वह सोचमग्न हो कर यह निर्णय नहीं ले पाता कि क्या यही वे लोग हैं जिनके लिये हमने जोखिम उठाये, अपने इर्द-गिर्द लोगों से पंगे लिये? इससे तो दुश्मन भले। यही दशा इन दिनों मनोज मुन्तशिर की है।

आदिपुरुष भाड़ में जाय। मगर मनोज मुन्तशिर पर हमारा विश्वास और स्नेह कायम रहना चाहिए। उनसे बड़ी उम्मीदें हैं। उस व्यक्ति में एक ऐसी चेतना है जिससे भारत भूमि, मां सरस्वती और भारती की बड़ी सेवा होनी है। उसे हताश और उपेक्षित अनुभव करने की हमारी अविवेकपूर्ण फितरत पर लगाम लगनी चाहिए।

आदिपुरुष निश्चय ही एक घटिया प्रस्तुति है। मत जाईये देखने। मगर इस एक फिल्म को लेकर किसी प्रतिभाशाली शख्सियत की ऐसी तैसी करने की प्रवृति त्यागिये। मनोज वह कर सकने की क्षमता रखते हैं जो हम आप कई उनके नये नवेले विरोधी लाख जतन करके भी नहीं कर पायेंगे। इन्तज़ार कीजिये।


समरेंद्र सिंह-

दो टके की फिल्म है आदिपुरुष। डॉयलॉग तो बहुत ही वाहियात हैं। लिखने वाले को भाषा की जरा भी समझ नहीं है। मनोज मुंतशिर शुक्ला ने राम और रावण दोनों को एक बार में ही निपटा दिया है। खुद जितना हल्का है, उसने इन दोनों का उतना ही हल्का किरदार रचा है! और एक दो जगह छोड़कर सारे सेट भी घटिया हैं।

हाउस ऑफ ड्रैगन के ड्रैगन की पूंछ काट कर चमगादड़ बना दिया है। और उस चमगादड़ पर सवार रावण तो कार्टून लग रहा है। मेघनाद और कुंभकर्ण भी जोकर लग रहे हैं। हनुमान को सच में बंदर बना दिया है। ये फिल्म श्रीराम और राम भक्तों के खिलाफ ओछी साजिश है। इसका बहिष्कार होना चाहिए!

‘आदिपुरुष’ फ़िल्म में हनुमान जी के जिस संवाद की चर्चा हो रही है, संवाद लेखक शुक्ल जी कह रहे हैं कि उनके यहाँ दादियाँ-नानियाँ और कथावाचक इसी शैली और भाषा में रामकथा सुनाते हैं।

मैंने भी रामायण-महाभारत की कहानियाँ सबसे पहले अपनी दादी से ही सुनी हैं। लेकिन ऐसी भाषा में नहीं।

यहाँ तक कि हमारे गाँवों की रामलीला में भी ऐसे संवाद नहीं बोले जाते।

शुक्ल जी पता नहीं किस द्वीप के निवासी हैं, जहां इस भाषा में रामकथा सुनाई जाती है।

वैसे शुक्ल जी खुद ही बता रहे हैं कि डायलॉग्स कहीं से टीपे गए हैं। कहाँ से टीपे हैं, ये नहीं बताया उन्होंने। पर कुछ लोगों ने ढूंढ़ लिया है उस बाबा को, जिसके हूबहू संवाद को शुक्ल जी ने यहाँ चेंपा है।

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4 Comments

4 Comments

  1. UV ENTERPRISES

    June 17, 2023 at 7:12 pm

    रोजी रोटी के लिए धर्म और आराध्य का मजाक बना दिया जाय ?

    गलत डिफेंड मत कीजिये।

  2. Parvez

    June 18, 2023 at 9:07 am

    Agar roji roti se hi defen krna h to bakiyon ko bura kyon kah rhe ho mujhe to aap hi dogle lage

  3. Ambikesh Soni

    June 19, 2023 at 9:05 am

    Aap to aise manoj muntshir ka gudgaan kar rahe hain jaise hamare desh ka vidhata wahi hai, itni badi -badi speech deta hai to usko itni bhi samajh nahi thi ki ye dialogues kahan tak sahi hain, sab kuch paisa nahi hota,dharm se khilwad karne wala bhi deshdrohi hota hai Mr. Mishra ji….

  4. Vivek

    June 19, 2023 at 11:49 am

    Arvind Mishra aur manoj muntashir dono faaltu aadmi hain. Nafrat ka zeher ghol k koi aage ni bdh sakta. Aur ye ghatiya aadmi arvind usi ko defend krra h.

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