हेमंत मालवीय-
चांद सामने दिखता है. वैसे धरती से उसकी दूरी 3.83 लाख किलोमीटर है. ये दूरी सिर्फ चार दिन में पूरी हो सकती है. या हफ्ता भर. किसी भी अंतरिक्ष यान को सीधे किसी ग्रह पर क्यों नहीं भेजा जाता? क्यों उसे धरती के चारों तरफ चक्कर लगाने के लिए छोड़ दिया जाता है?

नासा अपने यान को चंद्रमा पर चार दिन से हफ्ता भर के अंदर पहुंचा देता है. इसरो क्यों नहीं ऐसा करता? क्यों चार दिन के बजाय 40-42 दिन लेता है इसरो. क्या इसके पीछे कोई खास वजह है? है. वजह दो है. पहली बात तो ये धरती के चारों तरफ घुमाकर अंतरिक्ष यान को गहरे अंतरिक्ष में भेजने की प्रक्रिया सस्ती पड़ती है.
ऐसा नहीं है कि ISRO सीधे अपने यान को चंद्रमा तक नहीं भेज सकता. लेकिन NASA की तुलना में इसरो के प्रोजेक्ट सस्ते होते हैं. किफायती होते हैं. मकसद भी पूरा हो जाता है. इसरो के पास नासा की तरह बड़े और ताकतवर रॉकेट नहीं हैं. जो चंद्रयान को सीधे चंद्रमा की सीधी कक्षा में डाल सकें. ऐसे रॉकेट बनाने के लिए हजारों करोड़ रुपए लगेंगे.
विजय सिंह ठकुराय-
पूर्वकाल में नासा द्वारा भेजे गए स्पेस मिशन मात्र 3-4 दिन में चांद पर पहुंच गए थे, वहीं इसरो का चंद्रयान 384000 किलोमीटर दूर मौजूद चांद पर लगभग 40 दिन में पहुंचेगा। आखिर इतना भारी अंतर क्यों…

चलिए, अब एक दूसरा सवाल पूछते हैं। आपने देखा होगा कि लांचिंग के बाद कुछ समय तक तो कोई भी राकेट सीधी रेखा में ऊपर की ओर बढ़ता है, पर कुछ समय बाद रॉकेट टेढ़ा होकर, सिधाई में, क्षितिज की ओर जाता प्रतीत होने लगता है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर रॉकेट ऊपर की ओर ही जाता रहा, तो अंत में अपना ईंधन समाप्त करके परकटे पक्षी की तरह भूमि पर आ गिरेगा।
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पृथ्वी की ग्रेविटी स्पेसटाइम को Distort करके, पृथ्वी के इर्दगिर्द एक कुंए जैसी संरचना पैदा करती है। इस कुएं के तल में हम और आप रहते हैं। अब मजे की बात यह है कि यह कुंआ अपना अक्ष पर घूम भी रहा है, और इसके साथ-साथ सतह के ऊपर मौजूद सभी चीजें घूम रही हैं, वातावरण समेत। अगर आप भूमध्य रेखा पर हैं तो इसका अर्थ यह है कि आप पश्चिम से पूर्व 1670 किमी/घण्टा की रफ्तार से घूम रहे हैं।
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ऐसा कोई रॉकेट बना ही नहीं, जो पृथ्वी की ग्रेविटी और घूर्णन को मात देता हुआ सीधा 11 किमी/सेकंड का पलायन वेग प्राप्त कर सीधा-सीधा पृथ्वी की ग्रेविटी से बाहर निकल जाए। मैंने कुछ दिन पहले लिखा भी था कि एक टिपिकल केमिकल एनर्जी से चलने वाला रॉकेट अधिकतम 4-5 किमी/सेकंड का ही वेग प्राप्त कर सकता है। तो फिर हम पृथ्वी से निकलते कैसे हैं? जवाब कुछ यूं है कि – जब धारा के विपरीत तैरने में शक्ति लगती है, तो क्यों न धारा के साथ-साथ तैरो।
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तो होता कुछ यूं है कि रॉकेट उड़ान भरता है, और फिर ऊपर जाने की बजाय, पहले खुद को पृथ्वी के ऑर्बिट या यूं कहें कि – कुंए की दीवारों – पर स्थापित करता है। फिर ऊपर जाने की बजाय सिधाई में रॉकेट अपने बूस्टर फायर करता है। इस बीच पृथ्वी के घूर्णन के कारण रॉकेट भी घूमता है, बूस्टर फायर करने से उसका ऑर्बिट बड़ा हो जाता है, और इस तरह पृथ्वी के घूर्णन से प्राप्त ऊर्जा से रॉकेट की स्पीड बढ़ती रहती है।
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यह प्रक्रिया दोहराते हुए रॉकेट पृथ्वी से 35 हजार किमी की ऊंचाई पर पहुंचता है जहां पर पृथ्वी की ग्रेविटी को टाटा बाय-बाय करने के लिए आवश्यक पलायन वेग मात्र 4.3 किमी/सेकंड रह जाता है। इस ऊंचाई पर रॉकेट की रफ्तार पहले से ही 3.07 किमी/सेकंड होती है। तो बस, एक आखिरी बूस्टर और पृथ्वी की ग्रेविटी को बॉय बोलकर स्पेसशिप निकल जाता है चंदा मामा के घर के लिए।
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जिन्हें इस प्रक्रिया को समझने में दिक्कत हुई है, वे मेलों में लगने वाला बाइक और कुएं वाला खेल याद करें। कुंए के तल से सीधी रेखा में मोटरसाईकल चला कर या दौड़कर कुंए से निकलना बेहद मुश्किल है। इसलिए मोटरबाइक सवार कुंए की दीवारों पर गोल-गोल घूम कर कुंए में ऊपर तक आ जाते हैं। चंद्रयान भी कुछ ऐसी ही करामात दिखा रहा है। सोचकर देखिए, अगर चंद्रयान की ट्राजेक्टरी की कैलकुलेशन में थोड़ी हेर-फेर भी हो जाये तो चंद्रयान मुंह के बल धरती पर आ गिरे, अथवा अंतरिक्ष में हमेशा के लिए गुमशुदा हो जावे। पृथ्वी से बाहर एक यान भेजना भी एक बेहद असाध्य कार्य है।
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किसी भी ग्रह की ग्रेविटी के इस्तेमाल से रॉकेट की स्पीड बढाने को “स्लिंगशॉट” कहते हैं। नासा वाले भी स्लिंगशॉट इस्तेमाल करते हैं, पर हमेशा उतना नहीं। अमेरिका में चीजें महंगी होने के कारण एक स्पेस मिशन 20-25 हजार करोड़ का पड़ता है। वहीं हम भारतीय फुरसत में भी हैं और काम हमें किफायती करना है इसलिए भी हम स्लिंगशॉट का मैक्सिमम इस्तेमाल करते हैं, भले ही 40 दिन लग जाएं पर बचत होनी चाहिए और बचत ऐसी कि हमारे स्पेसमिशन की कीमत हॉलीवुड फिल्मों से भी कम होती है।
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आज इसरो का सबसे शक्तिशाली रॉकेट भी चांद तक सिर्फ 4000 किलो मटेरियल भेजने में सक्षम है, ईंधन का वजन काटकर। वहीं स्पेसएक्स अथवा नासा जैसों के पास ऑलरेडी मौजूद रॉकेट के भार वहन करने की रेंज हमसे 6 गुना, यानी 26000 किलो है। और दो-तीन साल में 46000 किलो हो जाने की उम्मीद है।
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एक सैल्यूट तो इसरो के लिए भी बनता है कि सीमित संसाधन, सीमित बजट और कमतर मशीनरी होने के बावजूद हौसलों की उड़ान नीचे नहीं होने दी है।
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चंद्रयान मिशन के लिए सभी मित्रों को बधाई और शुभकामनाएं, उम्मीद यही कि इस बार चांद की सरजमीं पर उतरने में कोई दिक्कत न हो।



Dr. VNPandey
July 20, 2023 at 10:34 am
शानदार…अभिभूत हुआ…।
दुनिया भर की तमाम गपसप के बीच भटकते समाज के लिए ख़ास कर कुछ जानकारी चाहने वालों के लिए सोशल मीडिया प्लेट फॉर्म का इससे अच्छा और सार्थक उपयोग कुछ नहीं हो सकता।
@हेमंत मालवीय और @भड़ास संपादक को हार्दिक धन्यवाद