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सुख-दुख

इस सचित्र एफबी पोस्ट के कारण जमकर ट्रोल किए जा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा!

यशवंत सिंह-

क्या बुरा लिख दिया है Rajiv Nayan Bahuguna जी ने?

जिस भावना से तस्वीर का क्रिएशन कराया गया है, उसी अभिव्यक्ति को उन्होंने शब्द रूप दे दिया है।

अगर तस्वीर में कुछ भी ग़लत नहीं दिख रहा है तो राजीव जी के लिखे में भी कोई ग़लती नहीं है।

अगर तस्वीर जानबूझकर सेमी-इरोटिक / सेमी-पोर्न स्टाइल में गढ़ी गई है तो उस बेहूदगी पर कटाक्ष है राजीव जी की टिप्पणी!

ध्यान देने वाली बात है, तस्वीर में किसी स्त्री का चेहरा उजागर नहीं है। बस जो उजागर करना था, वो करा दिया गया है चित्र में। वैसे ही राजीव जी के कमेंट में कहीं अश्लील शब्द का इस्तेमाल नहीं है। लेकिन वो जो व्यंग्य करना चाहते थे इस घटिया तस्वीर पर, वो उन्होंने संवैधानिक शब्दावली में कर दिया है।

तस्वीर आपको सही लग रही है तो कमेंट को भी उसी सही और सहज तरीक़े से लीजिए।

तस्वीर गढ़ने में अगर द्विअर्थी भाव नज़र आ रहा हो तो उसी अश्लीलता पर एक तगड़ी मौज के रूप में राजीव भाई की टिप्पणी लीजिए।

इस देश के हिप्पोक्रेट सुधरेंगे नहीं। हाँ, सुनो… मुझे भी अनफ़्रेंड कर दो, कुंद और बंद दिमाग़ वालों/वालियों!

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूर्ण सहमति, महिला सशक्तिकरण मानव समाज के लिये जितना हितकारी है, फेक फेमिनिज्म उतना ही नुकसानदेह है। उपरोक्त तस्वीर जानबूझकर जो प्रदर्शित करने के लिए ली गई है, उसपर बेहद ही सभ्य शब्दों में बेहद शानदार कटाक्ष है कटाक्षकर्ता महोदय का..!! – Vivek Tripathi

मने आप भी क्रांति में शामिल हो गए! अब यह क्रांति मुकम्मल हुई… इंकलाब जिंदाबाद! -Satyendra PS

मुझे कुछ लोगों ने क्रांति करने के लिए प्रेरित किया। आप जानते ही हैं ठाकुर लोग क्रांति करने के मौक़े तलाशते रहते हैं क्योंकि उनकी बुद्धि घुटने में होती है। इसलिए क्रांतिकारी दावानल में हम भी कूद गए। भारत माता की जै हो! -Yashwant Singh

मेरी भी बुद्धि बहुत स्लो खुलती है। कई मसलों पर तो जब क्रांति की ज्वाला बुझ जाती है तब मैं लिखता हूँ। आपने जो फोटो साझा की, उसको देखकर अगर मेरे मुंह से स्वतः स्फुटित आवाज निकलेगी, वह यही होगी… मार ब…. एक से एक हरामिन हैं, कैसे कैसे फोटो खिंचवाती हैं। बहुगुणा जी ने क्या लिखा, उसे लेकर क्या तर्क दिया, वह लिखने का क्या आशय था, मुझे समझ में नहीं आया। आपके लिखने के बाद सीरियस हुआ तो विभिन्न क्रांतियों को घण्टा भर पढ़ा। और आखिरकार इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दिस डिस्प्यूट डिसाइड्स नो टाइटल। मैं अपनी बात करूं तो ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं सामंतवादी पुरुष हूँ। इधर बहुत सभ्य हो गया हूँ। फिर भी अगर मेरी बगल में कोई कार में बैठा हो और सामने से कोई आड़ा तिरछा निकले, या पीछे से कोई हॉर्न बजाए तो मुख सेस्वतः स्फूर्त जो शब्द निकलते हैं वह सुनकर कोई नारीवादी पुरुष महिला या तो चलती कार से कूद जाएगा या मुझे अपनी क्रांति का शिकार बना देगा। मैं अभी कार के हॉर्न, उसके टायर, साइड मिरर तक की माँ बहन को गाली दे सकता हूँ। जो साथ होता है, वह बेचारा हंसकर रह जाता है कि साइड मिरर की बहन कौन है? कभी कभी मैं भी महिलावादियों का शिकार बनते बनते बचा हूँ। मेरा अनुभव यह रहा है कि महिलावादी हों या दलितवादी या पिछडावादी। अगर आप उनके समर्थक हैं और उनके प्रति कहीं न कहीं साफ्ट कार्नर रखते हैं, उनकी प्रजाति के नहीं हैं तो कभी न कभी आप ही निशाना बनेंगे, आपको सबसे बड़ा खलनायक घोषित किया जाएगा। और जो वास्तव में स्त्री विरोधी, दलित विरोधी, पिछड़ा विरोधी होते हैं, उनसे भिड़ने की तो इन वादियों की हिम्मत ही नहीं होती। सिर्फ अभी एक लखनऊ की महिला को देखा, जो भिड़ी और उसने एफआईआर करा दिया। ऐसी महिलाओं और खासकर उन्हें समर्थन करने वाले उनके घर के पुरुषों की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। लेकिन यह जो क्रांतिकारी क्रान्तिकारिन होते हैं, वह हमेशा सॉफ्ट टारगेट खोजते हैं जिसका जुलूस निकाल देने पर उनकी नौकरी, उनके निजी जीवन पर असर न पड़े। इसलिए ऐसी क्रांतियों को मैं इग्नोर करता हूँ। -Satyendra PS

बिल्कुल सही लिखा है आपने। ये फोटो जानबूझकर इसी उद्देश्य से खिंचवाई गई है जो कि ज़्यादा घटियापन है। -Aftab Alam

बुरा लिखा है और अपनी बेहूदगी को एक और पोस्ट लिखकर जायज भी ठहराया है। -Musafir Baitha

बेहूदगी बंद और कुंद लोगों के दिमाग़ में भरी होती है जो चले आते हैं लट्ठ लेकर क़बीलाई न्याय करने… कि तस्वीर सही है, कमेंट ग़लत है … या तो दोनों ग़लत है या फिर दोनों सही है… ऐसी तस्वीरें किस मक़सद से गढ़ी / फ़िल्माई जाती हैं, ये सबको पता है.. लेकिन इस पोर्न इंडस्ट्री के ख़िलाफ़ बोलने की बजाय जो इस पर व्यंग्य कर रहा है, सब उसी को दौड़ा रहे हैं. -Yashwant Singh

ददा. बुरा मानें या भला, आप लोग ग़लत बात को डिफेंड कर रहे हैं. राजीव दा विलक्षण प्रतिभा वाले हैं, लेकिन उनकी ग़लत हरकत को जस्टिफाई करने की क्या मजबूरी है? ये उन्हें भी और उनके साथ खड़े हुए बाक़ी लोगों को भी हल्का बना रहा है. राजीव दा जैसी प्रतिभा अद्वितीय है, लेकिन वो अगर ऐसी छोटी बहस में ज़ाया हो जाती है तो ये सामूहिक नुक़सान होगा हमारे पूरे दौर का. उनके ग़लत को ग़लत कहना होगा, ताकि उनके सही को सही कहते हुए रीढ़ सीधी रह सके. – Rahul Kotiyal

एक बुरी नीयत से प्लांट की गई घटिया तस्वीर पर करारा व्यंग्य है राजीव भाई का कमेंट! बस एक लाइन का मेरा आँकलन है। सम्भव है मेरे ऑब्जरवेशन से आप सहमत न हों। -Yashwant Singh

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