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मीडिया हाउसेज में वैकेंसी आमतौर पर नहीं निकलती!

Dinesh Pathak-

मेरे अनुभव शायद आपके काम आ जाएं… मीडिया हाउसेज में वैकेंसी आमतौर पर नहीं निकलती। युवाओं का चयन कैम्पस प्लेसमेंट से करने की व्यवस्था है। इक्का-दुक्का पदों पर आवश्यकतानुसार भर्तियाँ चलती रहती हैं। कोई जगह खाली हुई तो सीवी की फ़ाइल पलटी जाएगी या फिर सहयोगियों से किसी योग्य उम्मीदवार की तलाश करने को कहा जाएगा।

इस पेशे में क्रेडिबिलिटी एक बड़ा मुद्दा है इसलिए मिडिल लेवल के सीनियर्स अक्सर बहुत सावधानी से नाम आगे करते हैं।

मेरे सामने जब भी कोई युवा साथी आया तो प्रायः मैं दो-चार पेज कागज देकर घर से मेरे पास तक पहुँचने का विवरण लिखकर लाने को कहता। इसी के साथ जो भी अंग्रेजी का अखबार सामने होता उसी से दो-तीन सौ शब्दों की कोई खबर अनुवाद करने को दे देता। सब एडिटर/ रिपोर्टर के लिए मैंने इससे ज्यादा कभी कुछ नहीं किया।

सीनियर रिपोर्टर/सीनियर सब एडिटर जैसे पदों के लिए प्रायः अपने अखबार और एक अंग्रेजी अखबार की एक हफ्ते की समीक्षा बनाने को कह देता। मेरा काम इससे चल जाता। अगर किसी ने मेरे अखबार की झूठी सराहना की तो मैं सतर्क हो जाता।

टीवी में भर्ती करते समय भी युवा साथियों से कैजुअल वे में स्क्रिप्ट लिखवा लेता। एंकर्स, प्रोड्यूसर्स से बातचीत करके समझता। डिजिटल में भर्ती के समय कुछ तकनीकी समझ भी आंकने की कोशिश करता रहा हूँ।

मेरे पास नौकरी के सिलसिले में जो भी आया, सबसे पहले मैं उसे सहज करने को कोशिश करता। प्रयास करता कि उसे इंटरव्यू न लगे। इस दौरान सामने वाले की बातचीत का तरीका, कपड़े, जूते, कमरे के अंदर पहुँचने, कुर्सी पर बैठने के तरीकों पर भी नजर रखता।

पत्रकारिता में भाषा पर पकड़ के साथ ही आपका सामान्य व्यवहार भी भर्ती में मददगार हो सकता है। जब आप पेशे में नए होते हैं तो किसी न किसी मिडिल लेवल के सीनियर के साथ आपको लगाया जाता है। उस समय जो काम मिला करते गए। सीखते गये तो कुछ ही महीनों में आपकी छवि निखर जाएगी। शुरुआती चार-पाँच वर्ष तक कॅरियर में धैर्य, लगन, परिश्रम से जुटे रहे तो कम से कम 15-20 अपने दफ्तर के और इससे ज्यादा दूसरे संस्थानों के लोगों की नजर में आप बरबस आ जाते हैं। फिर पीछे नहीं मुड़ने की जरूरत नहीं पड़ती है।

एक और जरूरी बात यह है कि जब भी किसी सीनियर से नौकरी के सिलसिले में मिलें तो किसी भी तरह का झूठ न बोलें। क्योंकि आपका कोई भी झूठ अव्वल तो तुरंत पकड़ में आ जाता है, भले ही सामने वाला आपको एहसास न होने दे।

वैसे भी दुनिया बहुत छोटी है। बातें पता चल जाती हैं।

थोड़ी सी सावधानी, भाषा पर पकड़, खबरों की समझ, टीवी में विजुअल्स का महत्व, आपका व्यवहार कॅरियर को उड़ान दे देते हैं।

दिनेश पाठक कई अखबारों में संपादक रहे हैं.

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