
Sushobhit-
क्या यह अंत है? या अंत की शुरुआत है? यों अंत की शुरुआत भी कोई छोटी बात नहीं होती, ख़ासतौर पर तब, जब तंत्र पर सत्ता की जकड़ और पकड़ इतनी मज़बूत हो। जब सत्य, सत्य नहीं रह गया हो, ‘आभासी सत्य’ बन गया हो। जब सत्य दिखता न हो, ‘दिखाया’ जाता हो, और बीसियों कैमरों से, बीसियों चटखारेदार कोणों से दिखाया जाता हो। जब सिस्टम ‘हैक’ कर लिया गया हो, लेकिन जनमत ऐन आख़िरी लम्हे में हैक्ड होने से इनकार कर देता हो। यहाँ यह आख़िरी लम्हे वाली बात ग़ौरतलब है, क्योंकि G-20 और J-22 (मंदिर वाली तारीख़) से उत्पन्न जन-ज्वार को अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ। खिचड़ी पकी हुई थी, उसको बस खाना था। सत्ताधीश अगर रेसकोर्स रोड पर आराम भी फ़रमाते तो उतना ले आते, लेकिन अब ला पा रहे हैं। लेकिन आराम तो हराम है। इसलिए बाहर निकले। और बाहर निकले तो बोले। पर क्या बोले?
क्या इसे जीती बाज़ी को ख़ुद ही हारना कहा जाएगा? अपने पैरों पर हथौड़ा मारना? मैंने कुल्हाड़ी के बजाय ‘हथौड़ा’ इसलिए कहा, ताकि आपको साथ में ‘हँसिया’ भी याद आए। जनता अपेक्षा कर रही थी कि उज्जवला, जनधन, जीवन-ज्योति, अमृतकाल, विकसित भारत के गुणगान सुनेगी, पर उसने सुना कुछ और। जो सुना, उससे सत्ता के समर्थक भी चौंके। चौंके इसलिए क्योंकि ऐसा बोलने की कोई आपातकालीन आवश्यकता नहीं थी। ‘इंकंबेंट’ को ‘चैलेंजर’ की भाषा बोलने की कोई हाजत न थी। फिल्म-स्कूल से तमाम थ्योरियाँ पढ़कर निकला सुप्रशिक्षित फिल्मकार भी जब बॉक्स ऑफिस पर सफल फिल्म बनाना चाहता है तो वह जानता है कि किन संवादों पर ताली पिटेगी और किन दृश्यों पर सीटी बजेगी। पर मतदाता दर्शक नहीं होता। अगर वह मौक़े पर रैली में ताली पीट भी दे तो बहुत सम्भव है वोट डालते-डालते उसकी मति में फेर आ जाये।
भारत में तो 62 प्रतिशत मतदाता ऐसे थे, जो यह ‘एक्शन-फिल्म’ देखना ही नहीं चाहते थे और जिन 37.36% ने उसे देखने के लिए 2019 में उसका ‘टिकट’ ख़रीदा था, उनमें भी सभी ‘बंधक-मतदाता’ नहीं थे। उनमें से कई ऐसे ‘फ़्लोटिंग-वोटर्स’ भी थे, जो इस अप्रत्याशित भाषा-शैली, रीति-नीति से बिदके। ऊँट की करवट में क्या उन्होंने ही मुख्य भूमिका निभाई है?
क्या नई सरकार बनेगी? पता नहीं। लेकिन अगर पुरानी ही फिर से दोहराई तो उसकी ताक़त ज़रूर घटेगी। यह ताक़त सीधे-सीधे उसी अनुपात में विपक्ष में जुड़ेगी। लोकतंत्र के जीवित होने की सनद में सिमटेगी। संसद बहसों से गूँजेंगी। ‘ट्रेज़री बेंचेस’ कँपकँपाएंगी। एकाधिकार इतना निर्विवाद नहीं रह जाएगा। नाक थोड़ी नीची होगी। आवाज़ में थोड़ा संयम आएगा। आना भी चाहिए।
आना ही चाहिए!
आने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर ‘डबल-इंजिन’ के एक-एक इंजिन भी अलग होते चले गए तो क्या रुआब पहले जैसा रह पाएगा? और क्यों रहना चाहिए? सत्तारूढ़ों के गढ़ मेरे गृहनगर इन्दौर में अगर एक लाख बटन नोटा पर दब जाते हैं तो यह मामूली बात नहीं है। यूपी में ज़मीन पैरों के नीचे से खिसक जाती है तो यह छोटा संकेत नहीं, क्योंकि यूपी में ही धर्म की ध्वजा फहराई गई थी और पुजारियों-महंतों-शंकराचार्यों को किनारे करकर सत्ताधीश ने भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा की थी। अहंकार और आत्ममुग्धता लोकसेवक में जनता एक सीमा के बाद देखना पसंद नहीं करती। और जब जनता दिखाई जा रही छवि और प्रकट हो रहे आचरण के बीच के भेद को चीन्हती है तो ‘छब्बेजी’ बनने चले ‘चौबेजी’ ‘दुबेजी’ बनकर रह जाते हैं। अभद्र मुहावरे के लिए क्षमा करें।
“वो लाए हैं” और “वो आएंगे” के शोर के बीच वो भूल गए कि “आती हमेशा जनता है”- या तो सिंहासन ख़ाली करवाने के लिए, या सिंहासन डिगाने के लिए!


