सत्येन्द्र पीएस-
भारत में बहुत कम लोग वीगन शब्द जानते हैं। इस शब्द से मेरा भी पाला इधर 3-4 साल से पड़ा है। जो मित्र नहीं जानते हैं, उन्हें बता दूं कि वीगन होना शाकाहारियों की उस जमात में शामिल होना है, जो दूध, दही, शहद जैसी चीजों का सेवन भी नहीं करते। उनकी नज़र में वह खाना भी पशुओं के प्रति क्रूरता है।
हाल के वर्षों में मुस्लिमो के प्रति घृणा फैलाने में शाकाहार का बड़ा इस्तेमाल किया गया। यह प्रचारित किया गया कि हिन्दू शाकाहारी और मुस्लिम मांसाहारी होते हैं। मैंने तथ्यात्मक रूप से देखना शुरू किया कि क्या सचमुच हिन्दू शाकाहारी होते हैं?
बुद्ध के समय मे 2 धर्म थे। वेद मानने वाले ब्राह्मण और श्रम को मानने वाले श्रमण। श्रमणों में आजीवक, चार्वाक वगैरा बहुत लोकप्रिय थे।वैदिक या ब्राह्मण धर्म मे जगह जगह बलि है।
आयुर्वेद की सबसे ऑथेंटिक किताब चरक संहिता और सुश्रुत संहिता है। इसमें जानवरो के एक एक अंगों के मांस के स्वास्थ्य संबंधी फायदे बताए गए हैं। बकरी, बकरा, बूढ़ी बकरी, बकरी के बच्चे के मांस के गुण बताए गए हैं। पशु उत्पादों में दूध दही तक्र के अलग अलग गुण बताए गए हैं। घी, शहद पर अलग अध्याय है। पटना वाले झाजी के अनुरोध पर इस पर एक किताब लिख रहा हूँ, उम्मीद है कि जल्द पूरी हो जाएगी। तो यह कहना कि वैदिक धर्म मे मांसाहार वर्जित है, महा मूर्खता और तथ्यहीन बात है। गाय, घोड़ा, घोड़ी, बकरी, भेंड़, पुरुष, महिला के मूत्र तक पर शोध हुआ है कि उसके क्या स्वास्थ्य लाभ हैं। मुझे नहीं लगता कि मांसाहार पर जितना भारत मे शोध हुआ है, विश्व के किसी देश मे हुआ है।
खैर अब सीधे यशवंत सिंह के शाकाहार और वीग्निज्म पर आते हैं। भारत मे शाकाहार को लेकर इतनी उग्रता है कि शाकाहारी लोग मांसाहारियों से ज्यादा हिंसक हो जाते है। इसे नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है, टाइप माना जा सकता है। वीग्निज्म भी अतिशय हिंसा के बाद उपजा आइडिया है।
मनुष्यों ने अपने पेट के चक्कर में बहुत पाप किया है। आप गायों की स्थिति देखें। उनकी ब्रीडिंग करके तरह तरह की नस्लें बनाई गईं। कुछ मांस लायक बना दी गईं, कुछ दूध लायक। कुछ गायें तो 100-100 लीटर दूध देती हैं उन्हें इतना विकृत किया गया है। गायों के नेचुरल सेक्स तक को छीन लिया गया। उनके बछड़ों को पैदा होते ही उनसे दूर कर दिया जाता है, कुछ को मार दिया जाता है। यूँ समझिए कि आप एक विक्षिप्त, बीमार, पागल, मनोरोगी बनाई जा चुकी गाय का दूध पीते हैं। यही हाल मुर्गी मुर्गे का हो गया। उदय प्रकाश जी ने एक बार कहा था कि मनुष्य अगर व्हाइट टाइगर का भी मांस खाने लगे तो वह विलुप्त नहीं होगा, क्योंकि वह कुछ ब्रीडिंग वगैरा करके टाइगर भी ढेर सारे पैदा करने लगेगा!
मेरा व्यक्तिगत मानना है कि मध्यमार्ग अपनाएं। हर तरह की हिंसा का कम से कम इस्तेमाल हो। अगर आप हफ्ते में एक मुर्गा खाते हैं तो घटाकर महीने में एक मुर्गा कर दें। मनुष्य जीवन को सबसे अमूल्य समझें और इस जीवन को बचाने के लिए न्यूनतम हिंसा करें। गायों का जीवन तो हमने अपने पेट के चक्कर मे नर्क बना रखा है, मुर्गी मुर्गा सबसे शोषित पक्षी हैं। इस स्तर तक हिंसक हमें नहीं होना चाहिए। गाय अगर अपनी मर्जी से हमको दूध दे रही है तो उसे पीने में कोई बुराई नहीं है। मनुष्य को बचाने के लिए मुर्गा बकरा शहीद करना पड़े तो करना ही चाहिए। मक्खी मच्छर से बचने के लिए उनको मारना ही पड़ता है। हर आदमी एकाध जीव को रोज ही शहीद कर देता है, चाहे वह पैर से कुचलकर मर जाए, या हाथ से पटाक से मार दे, या चावल में उबलकर मर जाए।
हाल में वज्रयान बुद्धिज्म में एक चीज और जाना। वज्रयान में एक मंत्र होता है, जिसे पढ़कर हम अपने तलवे पर फूंक मारते हैं या थू थू थू थू करते हैं, जिससे कि हमारे पैरों से दबकर अगर किसी कीड़े जा जीव की मृत्यु हो जाए तो उसका भी उद्धार या कल्याण हो जाए। मुझे नहीं पता कि उससे जीव का किस तरह का उद्धार या कल्याण होगा। लेकिन इतना तो समझ में आता है कि हम कामना और कवायद करते हैं कि किसी भी जीव की हिंसा हमसे न होने पाए और अगर हो भी जाती है तो उसके कल्याण की कामना करते हैं। इस हद तक हिंसा से बचने की कामना होती है।
ऐसे में मध्यमार्ग ही बेहतर है। हर तरह की हिंसा को अपने जीवन से कम करें। यह किसी दबाव में नहीं होना चाहिए, आपके भीतर ही दया, करुणा, प्रेम, सद्भाव विकसित होने से आना चाहिए। आपका अस्तित्व दूसरों से जुड़ा हुआ है, उसके लिए हर पल थैंकफुल रहें। इससे जीवन के अधिकतम उपद्रव दूर हो जाते हैं और अज्ञात, अदृश्य, अपरिभाषित वजहों से मिल रही तकलीफों के प्रति समता भाव लेकर आप सुखी रह सकते हैं।


