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मानवाधिकार, मीडिया और एंटी करप्शन : धंधा चोखा है, माल मोटा है!

पवन गोयल-

मित्रों… मानव अधिकार आयोग मात्र 2 स्तर के होते है! एक राज्य मानव अधिकार आयोग और दूसरा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग इसके अलावा जितने भी मानव अधिकार आयोग से मिलते जुलते नाम है, वो सब फर्म एंड सोसायटी पंजीयन अधिनियम के तहत बनाए गए हैं। जिनकी सरकारी मान्यता एक NGO से अधिक नहीं है!

देश भर में, हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हजारों लोगों के पास इन NGO रूपी मानव अधिकार आयोगों के ID कार्ड मिल जायेंगे, जो अलग-अलग सदस्यता शुल्क देकर घर बैठे बनवाए जाते हैं, कोई 500 में बनाता है तो कोई एक हजार में कोई तो 200/300 में ही बना देता है?

अब सोचिए, दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर के NGO पंजीयन का सरकारी शुल्क मात्र 50 रु है, और किसी ने पूरे देश में, (जिनके आमंत्रण भी सदस्य बनने हेतु ID कार्ड लेने हेतु हजारों संदेश, वाट्सएप्प ग्रुप सहित सोशल मीडिया मंचों पर वायरल होते रहते हैं) मात्र 500 रु जैसी मामूली कीमत पर एक हजार सदस्य भी बना लिए तो 5 लाख रु प्रतिवर्ष का घर बेठे काम हो गया न?

ID कार्ड बनाने का खर्च मात्र 50 रु, साढ़े चार लाख रु प्रतिवर्ष बैठे बिठाए शुद्ध इनकम है की नहीं? ओर अगले साल फिर इनसे नवीनीकरण हेतु भी इतनी रकम आनी है, इसके बाद अगले साल जो नए सदस्य बनेंगे… वो अलग?

राष्ट्रीय मानव अधिकार कई साल पहले एक विज्ञापन भी इस संबंध में जारी कर चुका है, जिसमें मानव अधिकार आयोग के नाम से मिलता जुलता नाम रखने को अपराध करार दिया था, तथा जनता को आगाह भी किया था, इस प्रकार के आयोग किसी भी सरकारी आयोग से संबंधित नहीं है, जनता भ्रमित ना हो? फिर भी लोगों का धंधा जारी है!

इसी तरह SAME MANNER में लोगों ने सरकारी ACB के तुल्य मिलते जुलते नामों से भी NGO बना रखे हैं जिनका काम भी वो ही है जो हम बता चुके है? सरकार को इस पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए!

हैरत का विषय यह है कि कई पुलिस अधिकारी इन NGO के पदाधिकारियों, बैनर के साथ फोटो खिंचवाते है? तो ऐसी संस्थाएं इन फोटो का उपयोग अपने प्रचार में करते है?

इसी तरह का धंधा कई साप्ताहिक पेपर का रजिस्ट्रेशन कराकर RNI प्रेस का ID कार्ड बेचते है, छत्तीसगढ़ को छोड़कर शेष राज्य में RNI नंबर वाले पेपर के रिपोर्टर को ही पत्रकार मानते हैं? कुल मिलाकर धंधा चोखा है माल मोटा है?

डिस्क्लेमर : यह खुलासा व्यापक जनहित में किया गया है किसी NGO विशेष को टारगेट करके नहीं! प्रेस ID, मानव अधिकार आयोगों (NGO) की ID कार्ड बेचने का धंधा विगत कई वर्षों से बेरोकटोक जारी है!

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