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भड़ास से मौन घर तक, यशवंत को समझना है तो पहले औघड़ स्वभाव को समझिए!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

स्वभाव से औघड़ यशवंत सिंह ने लगभग दो दशक पहले भौतिक जगत में लोगों की आवाज बनकर पहले भड़ास ब्लॉग फिर मीडिया पर केंद्रित भड़ास4मीडिया बनाया था, जहां अपने भीतर या ताकतवर लोगों के अन्याय से दबी हर आवाज को बाहर निकालने के लिए मंच दिया जाता है. वही यशवंत अब न सिर्फ मौन रहने का आनंद तलाश रहे हैं बल्कि अपने जैसे तमाम सत्य साधक लोगों को मौन रहकर अंतर से निकले चुनिंदा शब्दों को एक दूसरे से बांटने का मंच तैयार करने के प्रयास में लगे हैं.

गौर करने वाली बात यह है कि खुलकर बोलना, भीतर कुछ भी हो तो उसे उगल देना यानी अपनी भड़ास बाहर निकालना… यह जो प्रयास था, इसके ठीक उलट का प्रयास है मौन रहना.

इसके बावजूद, उनका प्रयास पहले भी अद्भुत था और आज भी यह नया प्रयास अद्भुत ही माना जाएगा. पहले प्रयास में उन्हें जो सफलता मिली, वह इसलिए क्योंकि वह स्वभाव से औघड़ हैं. औघड़ स्वभाव क्या होता है, यह समझना है तो औघड़ परम्परा और स्वभाव के जनक माने जाने वाले शिव को समझना होगा. जो शिव के चरित्र को जानने समझने का प्रयास कर चुका होगा, वह जरूर जान जाएगा कि औघड़ स्वभाव किसे कहते हैं.

और जिस तरह के काम यशवंत ने अपने जीवन में कर दिए हैं, वह कोई निपट सांसारिक व्यक्ति नहीं कर सकता, केवल औघड़ ही कर सकता है.

कुछ अरसा पहले तक मैं अपने एक दो मित्रों से संन्यास को लेकर चर्चाएं किया करता था. फिर वक्त ने एहसास करा दिया कि संन्यास लेने वाला व्यक्ति किसी तरह के सांसारिक अथवा भावनात्मक सपोर्ट के साथ संन्यास भला कैसे ले सकता है? संन्यास तो अंतर्यात्रा है. सब कुछ छोड़कर संसार में निपट अकेले रहकर इस यात्रा पर निकला जाता है. इसमें मित्र, सगे संबंधी अथवा परिजन साथ नहीं होते. उनका साथ तो अमूमन सुख के दिनों का साथ ही होता है.

जिस तरह जन्म और मृत्यु के क्षण में इंसान अकेला ही होता है, उसी तरह संन्यास वही ले सकता है, जिसमें सब छोड़ने का माद्दा हो. पकड़ कर यानी मित्रों का साथ लेकर, आश्रम, जमीन, आमदनी आदि व्यवस्था करके संन्यास नहीं लिए जाते बल्कि मठाधीशी की जाती है. संन्यास लेने और मठाधीशी करने में वही फर्क है, जो जन्म लेने व मृत्यु के क्षण में तथा आनंद के दिनों में फर्क है.

गौतम बुद्ध ने पिता से मिले राजपाट और परिवार की जिम्मेदारियों को त्याग करके संन्यास लिया था. उसके बाद फिर वह कभी राजपाट या परिवार के मोह में नहीं पड़े. मगर मित्रता या संग के मोह से वह भी अक्सर बंधे रहे. जिन्होंने बुद्ध के बारे में विस्तार से पढ़ा होगा, उन्हें पता होगा कि बुद्ध ने भी संन्यास के लिए कुछ संगियों के साथ शुरुआती साधना के बरस बिताए.

हालांकि कुछ समय के लिए फिर धीमे धीमे वह अकेले पड़ते गए और उसी अकेलेपन में उन्होंने बुद्धत्व यानी उस ज्ञान को पाया, जिसमें उन्हें दुनिया में रहने के लिए वीणा के तार की तरह का जीवन जीने का रास्ता सबसे मुफीद लगा. इसे उन्होंने मध्यम मार्ग का रास्ता यानी बौद्ध धर्म कहा. वीणा के तारों से मधुर स्वर तभी निकलता है, जब उसे न बहुत कसा जाए और न ही उसे ढीला रखा जाए. यानी संन्यास के नाम पर खुद को अकेला कर लेना कठोर तप साधना करना बुद्ध की नजर में व्यर्थ था.

बौद्ध संघ में संगति में रहकर या गृहस्थ आश्रम में रहकर ही योग ध्यान आदि करना मध्यम मार्ग था.

भारत ने बुद्ध के इस मार्ग को हाथोंहाथ लिया क्योंकि बुद्ध से पहले और उनके दौर का भारत आजीवक श्रमनों, जैन मुनियों और आर्य ऋषियों, तपस्वियों, साधुओं से भरा पड़ा था, जो कपड़े और केश आदि तक त्यागकर जंगल बियाबान में रहकर कठोर साधना किया करते थे. मध्य मार्ग हमेशा लोगों को भाता है, जैसे कि गांधी ने भगत, सुभाष, आजाद आदि के अति मार्ग यानी हिंसा की बजाय लड़ने का मध्य मार्ग दिखाया. इसमें अहिंसा के नाम पर सहना नहीं था बल्कि लड़ना था मगर तरीके भूख हड़ताल, हड़ताल, सविनय अवज्ञा आदि के थे. तब भी भारत ने उन्हें हाथों हाथ लिया.

बहरहाल, मुद्दा संन्यास है इसलिए उसी पर वापस आते हैं. संन्यास में मध्य मार्ग ने मठाधीशी को जन्म दिया. बुद्ध के बाद ही संन्यासियों के भी संगी होने लगे और इससे संघ तथा मठ आदि अस्तित्व में आए. बौद्ध भिक्षु संघ से पहले श्रमण, जैन मुनि आदि भी कई बार एक जगह ही इकठ्ठा होकर तप साधना किया करते थे मगर रहते समाज से दूर जंगल बियाबान में थे.

संन्यास के नाम पर हजारों बरसों से चल रहा वह अन्तर्द्वन्द हमें आज भी दिखता है, जब हम कभी संन्यास के नाम पर संगी जुटाकर या आश्रम मठ आदि बनाने का लक्ष्य निर्धारित करते हैं या फिर अकेले ही इस यात्रा पर निकल पड़ते हैं.

औघड़ स्वभाव के लोग दोनों के ही मिले जुले व्यक्तित्व में पाए जाते हैं. उन्हें कभी निपट अकेलापन भाता है तो कभी मठाधीशी में मन रमता है. मैं भी खुद को इसी स्वभाव के करीब पाता हूं, भले ही यशवंत की तरह का जबरदस्त औघड़पन मुझमें न हो.

संन्यास के नाम पर निपट अकेलेपन का चयन और बियाबान में वास विरले ही कर पाते हैं. बुद्ध के मध्यम मार्ग में दुनिया शांति और संग, दोनों का एहसास जीवन में एक साथ महसूस करके प्रसन्न है, इससे यही साबित होता है कि मध्यम मार्ग ही लोकप्रिय मार्ग है.

संदीप कुमार-
यशवंत भाई के बारे में आपकी बातों से पूरा इत्तेफाक है। एक दो ही मुलाकातें हैं किसी सभा संगोष्ठी में लेकिन सोशल मीडिया से उनके व्यक्तित्व को देखते हुए लगता है जाने कब से जानते हैं। बाकी हम जैसे ज्यादातर लोग तो दोहरी उलझनों से ही जूझ रहे हैं। मिर्जापुर सटीक है हम पर : दो नावों पर चढ़ना…..

वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से

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