
संजय कुमार सिंह-
आज के ज्यादातर अखबारों में कठुआ में सेना के गश्ती दल पर हमले में पांच जवानों के बलिदान की खबर लीड है। कुछ अखबारों में नीट मामले में कल सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई की खबर लीड है। अकेले इंडियन एक्सप्रेस में प्रधानमंत्री के रूस दौरे की खबर लीड है। चार कॉलम की इस खबर का शीर्षक, 22वें वार्षिक सम्मेलन के लिए लाल कालीन के साथ मोदी का मास्को संदेश है। इसके अनुसार उन्होंने कहा है, संबंध गहरे कीजिये, युद्ध के मैदान में कोई समाधान नहीं है। अखबार ने 2019 के चुनावी नारे और सफलता के मंत्र, घुस कर मारूंगा और अनुच्छेद 370 हटाने की महान उपलब्धि के बावजूद कश्मीर में तीन-चार दिनों से जो रहा है उसे एक तरफ दो कॉलम में और दूसरी ओर, मेडिकल दाखिले के लिए “एक देश एक परीक्षा जैसे नारे” के तहत एनटीए की कारगुजारी और नीट के विवाद को प्रमुखता से छापा है। द हिन्दू ने मोदी के रूस में होने की खबर अंदर के पन्ने पर होने की सूचना के साथ बताया है कि पुतिन से वार्ता में शांति की वकालत करेंगे। राहुल गांधी कल मणिपुर में थे तो मीडिया और गोदी पत्रकारों का एक वर्ग उसमें राजनीति तलाश रहा था।
द हिन्दू में उनके दौरे की यह खबर सिंगल कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर या उसके पहले के अधपन्ने पर नहीं है, अंदर पेज 8 पर होने की सूचना है, हिन्दुस्तान टाइम्स में दो कॉलम में है। इंडियन एक्सप्रेस में भी राहुल गांधी के मणिपुर दौरे की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर होने की सूचना है। इसके अनुसार विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी ने पहली बार मणिपुर का दौरा किया और प्रधानमंत्री को संदेश दिया : राज्य का दौरा कीजिये। द टेलीग्राफ में यह खबर चार कॉलम में टॉप पर है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री जी, मणिपुर के लिए एक दिन निकालिये। अमर उजाला में प्रधानमंत्री के दौरे की खबर तीन कॉलम में है। इसका शीर्षक है, रात्रिभोज पर पुतिन से मिले पीएम मोदी कहा – दोस्त के घर आना हमेशा अच्छा। उपशीर्षक है, पुतिन ने पीएम की ऊर्जा की तारीफ के साथ तीसरी जीत पर बधाई दी। राहुल गांधी के मणिपुर दौरे की खबर वैसे ही गायब है जैसे गधे के सिर से सींग। नवोदय टाइम्स में मास्को में मोदी, पुतिन संग डिनर चार कॉलम में छपा है। लेकिन राहुल गांधी की खबर भी है। दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, मणिपुर जाकर लोगों को सांत्वना दें मोदी :राहुल।
इंडियन एक्सप्रेस में प्रधानमंत्री के रूस दौरे की खबर नई दिल्ली डेटलाइन से लीड छपी है। इसलिए पाठकों को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिये कि इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता को प्रधानमंत्री साथ ले गये हैं या इंडियन एक्सप्रेस ने वहां भेजा है या खबर वहां के संवाददाता की है इसलिए महत्व दिया गया है। पहले ऐसी खबरें प्रमुखता से छपती थीं तो हम जैसे लोग कारण समझने की कोशिश करते थे। बाद में नियम बना कि रिपार्टर अगर प्रायोजित दौरे पर होगा तो यह घोषित किया जायेगा। प्रधानमंत्री के साथ ऐसी बात नहीं है। सरकार के खर्चे पर पूरा विमान जाता है और खाली सीटों पर पत्रकारों को बैठा लिया जाये तो उनका विदेश घूमना हो जायेगा और उनके रहने-ठहरने का खर्चा बचाना हो तो वह उनकी कंपनी दे सकती है। पहले प्रधानमंत्री लौटते समय विमान में ही प्रेस कांफ्रेंस करते थे तो देश को दौरे की खबर भी लग जाती थी। अब यानी जब से देश में विकास हो रहा है टेलीविजन देखकर रिपोर्टिंग की जा सकती है। पर वह अलग मुद्दा है। हालांकि यही सब चलता रहा तो कुछ दिन में अखबारों की पठनीयता खत्म हो जायेगी और फिर यह धंधा भी बंद होने लगेगा और रोजगार का नया संकट खड़ा होगा। इसलिये या मुद्दा परेशान करने वाला भी है।
कुलगाम में दो मुठभेड़ में दो जवानों के शहीद होने और चार आतंकवादियों को मार गिराने की खबर के बाद के फॉलोअप में दो अन्य आतंकियों के मारे जाने की खबर कल के अखबारों में लीड थी। कहने की जरूरत नहीं है कि वह अपनी पीठ खुद ठोंकने और आतंकवादियों को चिढ़ाने की तरह था। अखबारों ने इसे सैनिकों, सरकार या देश की प्रशंसा के रूप में प्रस्तुत किया। मुझे लगता है कि उसका असर हुआ और घात लगाकर किये गये हमले में फिर पांच जवान शहीद हो गये। वैसे इसका मतलब यह नहीं है कि खबरें न छपें या जीत का श्रेय नहीं लिया जाये पर हो ये रहा है कि श्रेय कोई ले रहा है, अपनी पीठ कोई थपथपा रहा है और जान किसी की जा रही है। कोई अनाथ हो रहा है, कोई विधवा हो रही है और किसी के बच्चे मारे जा रहे हैं। सैनिकों की शहादत बहुत बड़ी बात है पर जब मुआवजा देने के लिए बीमा कराया जायेगा और कुछ लाख या कुछ करोड़ की राशि को मुआवजा बताया और माना जायेगा तो जान की कीमत रुपये में ही आंकी और चुकाई जायेगी।
मुझे लगता है कि वह स्थिति आने से पहले सोचने समझने और संभलने की जरूरत है। सरकार सब कुछ स्वयं नहीं करती है उससे कुछ करवाना भी पड़ता है। खासकर तब जब घोषित रूप से सरकार की मानसिकता खून में व्यापार की हो। यहां मामला हेडलाइन मैनेजमेंट का भी है और कल की बहादुरी के प्रदर्शन का क्या लाभ हुआ अगर आज दो आतंकियों के बदले पांच सैनिकों के शहीद होने की खबर उतनी ही प्रमुखता से छापनी पड़ी। 10 साल के मोदी राज को न सिर्फ मीडिया का समर्थन है बल्कि वह विपक्ष का विरोध भी कर रहा है। यह अब कोई नई या छिपी हुई बात नहीं है। इसका उदाहरण यह है कि नीट रद्द करने की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है इसका पता मुझे नहीं चला क्योंकि खबर मेरे सात अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं छपी। सोशल मीडिया पर नीट रद्द करने की मांग तो पूरी थी, पप्पू यादव रीनीट लिखा टी शर्ट पहन कर शपथ लेने आये थे। यह सब था और मैंने देखा, मुझे पता था पर यह पता नहीं चला कि सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा हुआ है क्योंकि मैंने पता करने की कोशिश नहीं की कि नीट रद्द करने की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई है या नहीं। पर दायर हुई थी तो वह खबर थी और उससे बड़ी थी जो नीट रद्द नहीं हो इसके लिए दायर की गई। मुझे नीट रद्द नहीं की जाये – के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका की खबर तो दिखी पर पहले वाली नहीं दिखी।
यह अखबारों की हालत है और वे ऐसे माहौल बनाते हैं या कहिये कि बनाते रहे हैं। आप जानते हैं कि सरकार शुरू से कह रही है कि प्रश्नपत्र लीक नहीं हुए हैं (दायरा सीमित है) और परीक्षा रद्द करने की जरूरत नहीं है। इसलिए संबंधित खबर को प्राथमिकता नहीं दी गई। जो मांग सरकार के रुख के अनुकूल थी उसकी खबर दी गई। आज की खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नीट का प्रश्नपत्र लीक हुआ है यह स्पष्ट है और इनकार की कोई गुंजाइश नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक लगभग यही है। इसके बावजूद नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, परीक्षा रद्द करना आखिरी विकल्प है (प्रश्नपत्र लीक होने के बावजूद)। जाहिर है, इसे भी सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है पर कोर्ट के लिए ऐसा कहना वाजिब है। उसे सभी पक्षों को देखना है, सबकी सुननी है और न्यायोचित फैसला देना है।
परीक्षा कराने (और देने) वालों के लिए भी, प्रश्नपत्र लीक होने का मतलब है परीक्षा की पवित्रता नष्ट होना। परीक्षा के नतीजों पर विश्वास करने का कारण खत्म हो जाना। इसलिए पहली ही सूचना पर परीक्षा रद्द कर दी जानी चाहिये थी ताकि उसपर भरोसा रहता। अभी सरकार के रुख से लग रहा है कि उसके लिए ना तो लीक होना बड़ी बात है और ना ही उसकी विश्वसनीयता की रक्षा। मैं पहले लिख चुका हूं कि आगे कोई ऐसा प्रयास नहीं करे इसलिए भी तुरंत पहली ही सूचना पर परीक्षा रद्द कर दी जानी चाहिये थी। अब जो सब हो रहा है उससे लीक के बावजूद परीक्षा रद्द न हो उसके उपाय सामने आ रहे हैं जो आगे उपयोग किये जा सकते हैं और लीक से कमाने, कुछ लोगों को उपकृत करने की अगर कोई योजना चल रही है तो उसे संरक्षण दिया जा रहा है और संरक्षण मिलता रहे उसकी व्यवस्था कितनी अच्छी और मजबूत है यह सब दिख रहा है।
शायद इसीलिए सभी शीर्षक हिन्दुस्तान टाइम्स की तरह स्पष्ट नहीं हैं क्योंकि प्रश्नपत्र लीक हुए हैं तो किसी अगर मगर के बिना परीक्षा रद्द होनी चाहिये। अब अगर-मगर पर चर्चा सुप्रीम कोर्ट के लिए जरूरी है तो उसे एनटीए (और सरकार के लिए) भी जरूरी बनाये और बताये जाने की कोशिश चल रही है। इससे सरकार न्यायप्रिय दिखेगी। पर सख्त प्रशासक नहीं। और सख्त प्रशासन की आवश्यकता किसे है? कम से कम इलेक्टोरल बांड के प्रशंसकों को तो नहीं ही होगी। कायदे से सरकार को सख्त प्रशासक होना चाहिये। न्याय का काम अदालतों पर छोड़ दिया जाना चाहिये। सरकार ने लीक होने की सूचना पर परीक्षा रद्द कर दी होती तो भी लोग उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट आ सकते थे और तब सुप्रीम कोर्ट न्याय करता। जो उसका फैसला होता उसका पालन किया जाता। अब सुप्रीम कोर्ट में परीक्षा रद्द करने की मांग करने वाली और रद्द नहीं करने की मांग करने वाली याचिकायें हैं जो जाहिर है वह न्याय करके भी किसी एक को ही खुश कर सकता है। यह राजनीति में होता है और राजनीति करने वालों को इसका नफा नुकसान होता है। वहां बहुमत ही सब कुछ होता है। बहुमत के लिए सरकार अपने किये पर सुप्रीम कोर्ट का ठप्पा लगवाने के प्रयास में है। इस फेर में उसकी अपनी साख दांव पर है।
मीडिया सरकार का साथ दे रहा है। अमर उजाला का शीर्षक देखिये, नीट की पवित्रता प्रभावित… पेपर लीक का दायरा तय करेगा फिर परीक्षा हो या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व एनटीए से अनियमितता का ब्यौरा मांगा है और दोबारा परीक्षा के लिए तीन मापदंड तय किये हैं। जैसा मैंने पहले कहा, सुप्रीम कोर्ट को न्याय करना है और वह कुछ भी करे एक वर्ग को लगेगा कि उसकी नहीं सुनी गई जबकि सरकार और एनटीए को परीक्षा की पवित्रता बनाये रखने के लिए तुरंत परीक्षा रद्द करने की घोषणा करनी चाहिये। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबारों की खबरों से महौल बनता है और उसका दबाव भी होता है। चुनाव के समय केजरीवाल को जमानत मिलने पर की गई टिप्पणी का ऐसा असर हुआ कि उन्हें इलाज के लिए विस्तार नहीं मिला जबकि उससे कुछ अन्याय नहीं होना था। मुख्यमंत्री तो वो थे और हैं ही। निचली अदालत से जमानत मिलने के बाद भी स्टे हो गया औऱ जमानत पर फैसला अभी तक लटका है। एक निर्वाचित मुख्यमंत्री जेल में है। यह व्यवस्था है कि शिक्षा के क्षेत्र में जो सबसे अच्छा काम कर रहा था वह इमरजेंसी से ज्यादा समय जेल में रह चुकने का रिकार्ड बनाने जा रहा है। ऐसे में परीक्षा और परीक्षार्थी की क्या पूछ होगी।
नवोदय टाइम्स के उपशीर्षक के अनुसार यह भी कहा गया है, कितनों को लाभ पहुंचा हमें बतायें। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, नीट की पुर्नपरीक्षा तभी होगी जब पूरी परीक्षा दूषित हो। इस खबर के साथ, यहीं एक और शीर्षक है, एनटीए ने डाटा का उल्लेख किया और दावा किया, कोई सिस्टेमैटिक लीक नहीं है। द हिन्दू का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नीट-यूजी की परीक्षा रद्द करना अंतिम उपाय होगा। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, लीक हुआ, पर यह मानना कि सभी 23 लाख छात्र शामिल हैं, दूर की कौड़ी होगी – सुप्रीम कोर्ट ने कहा और आगे, उपशीर्षक वही है जो सरकार कह रही है और कोई भी कहेगा, अगर लीक कुछ ही केंद्रों तक सीमित है तो रीटेस्ट का आदेश देना उपयुक्त नहीं है। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने लीक की रिपोर्ट मांगी लेकिन पुनर्परीक्षा के लिए शर्त है।
कहने की जरूरत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट का मामला बिल्कुल अलग है। हर मामला सुप्रीम कोर्ट में तय नहीं हो सकता है और न्याय व प्रशानिक निर्णय में अंतर होता है। प्रशासनिक निर्णय को न्याय के आधार पर चुनौती दी जा सकती है पर न्याय करने के लिए प्रशासकों को कैसे मजबूर किया जायेगा। मुझे नहीं लगता है कि लीक अगर हुआ है तो उसका विस्तार पता लगाना संभव है और जो स्थितियां हैं उनमें जरूरी नहीं है कि लीक का पता चल ही जाये। सरकार के पास अथाह शक्ति है और वह अपने पक्ष में फैसला करवा सकती है। इसमें घोषित और अघोषित दवाब के साथ प्रत्यक्ष और परोक्ष स्थितियां भी शामिल हैं।
व्हाट्सऐप्प पर घूम रहे छह मिनट के एक वीडियो के अनुसार लीक झारखंड के एक स्कूल से हुआ था। स्कूल के प्रिंसिपल और तीनों तथाकथित मास्टर माइंड मुसलमान हैं और इनमें एक पत्रकार भी है। इससे जुड़े लोगों का संबंध तेजस्वी यादव से बताया गया है पर यह नहीं बताया गया है कि गिरफ्तार पत्रकार के अखबार के संपादक रहे हरिवंश अब राज्यसभा के उपसभापति हैं और जाहिर हैं नरेन्द्र मोदी के करीबी भी। वीडियो के अनुसार नीट घोटाले के राजनीतक और सामाजिक निहितार्थ भी हैं। वह शायद इसलिए कि न सिर्फ लीक के लिए जिम्मेदार ठहराये गये मास्टर माइंड बल्कि अधिकतर नीट टॉपर मुसलमान हैं।
इसलिए क्या यह मोदी सरकार को बदनाम करने की साजिश है। इसमें यह भी कहा गया है कि केरल के एक कोचिंग इंस्टीट्यूट ने इसके ज्यादातर टॉपर को अपना छात्र बताया था और उनमें ज्यादातर मुसलमान हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार पुलिस ने पहले कहा था कि एनटीए सहयोग नहीं कर रहा है उसने तेजस्वी का नाम नहीं लिया था (ऐसी खबर नहीं दिखी)। बाद में तेजस्वी के करीबी का नाम आया फिर मुसलिम एंगल। ऐसे में एनटीए और सीबीआई सुप्रीम कोर्ट को कितनी जानकारी देंगे यह इसी पर निर्भर करेगा कि उनसे मांगा क्या गया है। लेकिन कोई कोचिंग इंस्टीट्यूट अपने छात्रों के चुने जाने का दावा कर रहा है और उसमें धर्म विशेष के लोग हैं और लीक करने वाले भी उसी धर्म के हैं – कहा जाये कि इसे मोदी को बदनाम करने के लिए अंजाम दिया गया था और धर्म विशेष के लोगों के चुने जाने पर भी परीक्षा रद्द नहीं की जाये और उसका बचाव किया जाये तो मामला परीक्षा का नहीं घटिया राजनीति और पत्रकारिता का भी लगता है। लेकिन आप वही जानेंगे जो मीडिया बतायेगा।
जब प्रधानसेवक मणिपुर न जाकर विदेश घूमें, विपक्ष के नेता के मणिपुर दौरे में मीडिया को राजनीति नजर आये तो सेवा प्रदाताओं के लिए ऐसी लापरवाही कोई बड़ी बात नहीं है। पीड़ित के लिए बीमा होगा, मुआवजा दे दिया जायेगा। माफी मांगने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी होते हैं। जब अग्निवीर की जान की कीमत 50 लाख से कम का बीमा और मुआवजा है तो 84 साल की महिला के लिए व्हील चेयर की क्या जल्दी? यह स्वार्थी राजनीति के कारण चल रही व्यवस्था का असर है जो चंदा दो-धंधा लो की मानसिकता से पोषित होती है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


