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सुख-दुख

जिस रात मेरी अरुण जी से बात हुई वो रोने लगे, अपने साथ हुए असम्मान को लेकर!

यशोवर्धन-

अलविदा आखिरी पत्रकार का… आकस्मिक मौत, आकस्मिकता की मौत नहीं होती।

एक मुखिया की मौत पूरे परिवार को आकस्मिकताओं के अंधेरे भंवर में धकेल देती है। पांच साल की अबोध उम्र से ही मैं खुद अपने पिता की आकस्मिक मौत के असर का गवाह रहा हूं।

मैं नहीं जानता पिता क्या होता है? उसका प्रेम कैसा होता है? मैं नहीं जानता उसकी कठोरता क्या होती होगी? उनके साथ मेरी कुछ शब्दों के आदान प्रदान की थोड़ी सी मेमरी के अलावा… अब उनका जो कुछ भी होगा तो वो सिर्फ मेरी जीन (अनुवांशिकता) में मौजूद होगा. मेरे जीवन से तो वो बहुत पहले चले गए फिर धीरे धीरे जेहन से भी विलग हो गए। अब तो सपनों से भी दूर।

इतने ही दूर जा चुके अरुण नौटियाल जी भी सपने में तो किसी के नहीं आएंगे… लेकिन दोबारा रन डाउन चेंज करने का आखिरी स्टेशन और उसका एडिटोरियल पीसीआर में ही मौजूद हो… ऐसा अगर कोई आइडिया आपके जेहन में आ जाए तो समझिए कि स्वयं अरुण जी आपके जीवन में मौजूद हैं।

क्योंकि जब वो ऊपर गए और अवलोकितेश्वर से मिले तो उन्होंने अपनी इस अचानक मौत की वजह पूछी? मुझे इतनी जल्दी क्यों बुला लिया महाराज?

तो अरुण जी जैसी ही सहृदयता रखने वाले – उन्हीं कै जैसे दिख रहे, उन्हीं की तरह बातें कर रहे स्वर्ग के मौजूदा शासक महात्मा बुद्ध के प्रतिरूप अवलोकितेश्वर ने कहा- “आपके आकस्मिक मौत की वजह की लिस्ट बहुत लंबी है, लेकिन जो बड़ी बातें हैं वो मैं आपको बता देता हूं.. अरुण जी के ‘सम्मान शरीर’ बाहर आओ, आदेश देते हैं अवलोकितेश्वर!

स्वर्ग के उस प्रभाष में प्रकट होता है अरुण जी जैसी ही सहजता लिए उनका स्व-सम्मान भाव, वो अवलोकितेश्वर को अपना दर्द बताता है – मुझे सबसे गहरा आघात पहुंचा पिछले साल जून में जब मुझे ठेस पहुंचाया गया… मुझे फोन कर देते मैं नहीं आता… मुझे बुलाकर मेरे केबिन तक जाने से रोका गया… लोगों से मिलने तक नहीं दिया गया – 20 साल से ज्यादा वफा का ऐसा सिला?

सम्मान शरीर की बात सुन कर अवलोकितेश्वर ने पूछा – और कुछ जानना चाहते हो?

सिर्फ सम्मान के लिए तो किसी की मृत्यु नहीं होती… सुनते ही अवलोकितेश्वर ने सिर हिलाया बिल्कुल नहीं होती और आपकी भी सिर्फ उसी वजह से नहीं हुई।

अवलोकितेश्वर ने दोबारा ईशारा किया- अब कर्मशरीर बाहर निकलिए… सुनाइए अपना

कर्मशरीर- सर, ये नहीं मेरा बहुत ओवर यूज किए हैं. मैं कर्म भाव में रहता हूं तो व्याकरण पढ़ कर नहीं रहता हूं। कभी मन हो तो काम करो कभी नहीं हो तो होगा भी नहीं. और एक भाषा में एक तरीके से एक ही काम करने की आदी हूं… ये आदमी रोज नया करता… अपना कर्म ही नहीं बड़े बड़े ओहदेदारों के जो काम होते हैं वो भी ये हम्हीं से करवाते हैं। ये लोगों को जोड़ने का माध्यम ही कर्म को बना देते हैं। मैं पूर्व जन्मों में भी इनका कर्मभाव रही हूं लेकिन इस अवतार में तो तेजी, एक्यूरेसी, ऑर्गेनाइजेशन, आइडिएशन, एक्जीक्यूशन, डेमोक्रैटिक व्यूज, एकॉमोडेशन, कॉम्पैशन… तर्कसंगती, तथ्य शोधन- तथ्य विग्रहन- ये सब करवा के इन्होंने कई जन्मों का काम एक ही जन्म में करवा लिया है।

ठीक है जाइए- अब निकलिए स्वास्थ्य शरीर… स्वास्थ्य शरीर सामने आते हैं, अरुण जी जैसे ही दिखते हैं – योग करना, खेलना वगैरह तो ठीक है लेकिन कम सोना, लगातार काम करना। दिमाग पर ज्यादा वर्क लोड देना. मुझे शरीर के हर तरफ से जानकारी मिलती रहती थी लेकिन पिछले कुछ दिनों से दिमाग कुछ ज्यादा परेशान दिख रहा था। समस्या जाहिर थी. जिंदगी का मुकाम बड़ा था. वो एक संकल्प को सिद्ध कर रहे थे. बेटी के सपनों को हकीकत का आसमान दे रहे थे. लेकिन कुछ था जो इन्हें कचोट रहा था. और यही वजह है मैं थकने लगी थी. एक साथ इतना कुछ करके।

अवलोकितेश्वर अब अंतर्ध्यान हो जाते हैं. स्वर्ग प्रभाष अंतिम सत्य नहीं है. आपका शरीरों में आना-जाना डमरू की तरह है पूरा आना. एक दम बीच में शून्य हो जाना और फिर बढ़ते बढ़ते पूरा हो जाना. ये ब्रह्मांड भी कुछ डमरू जैसा ही है. ये भी उतना ही नश्वर है जितना शरीर. कुछ निरंतर है तो वो है सिर्फ चित. अगर आपने अपने चित को सत रखा तो आनंद में रहेंगे- सत चित आनंद- सच्चिदानंद… ये ईश्वर भी होते हैं और सिद्ध लोग भी। अरुण जी योग करते थे. उनका अपना विजन रहा. उनकी फिलॉसॉफी रही. उनके कई कमांडमेंट्स हैं जिनकी पढ़ाई होनी चाहिए। उनके काम करने के कई गुण हैं जो न सिर्फ पत्रकारिता बल्कि प्रबंधन के भी शिक्षार्थियों – शिक्षकों को पढ़ाई जानी चाहिए। किताब का तो नहीं कह सकता है लेकिन चैप्टर्स लिखे जा सकते हैं उन्हें कॉरपोरेट तरीके से इंस्टीट्यूट्स में इंट्रोड्यूस किया जा सकता है।

अरुण जी के आदर्शों और तरीकों पर गहरा विश्लेषण किया जा सकता है और पत्रकारों के साथ साथ प्रबंधकों की एक नई जेनरेशन उन चीजों को जाने समझे और जीवन में आत्मसात करे।

अरुण जी के घर तक सड़क बननी है और उसका ध्यान उत्तराखंड सरकार को दिलाया जा चुका है… कुछ स्तर पर अप्रूवल हो भी चुका है… बरसात के बाद शायद वो काम भी होने लगे।

अरुण जी जिम्मेदारियां पूरी करके ही दम लेने के लिए जाने जाते रहे और ये उनकी मौत के दिन, वक्त और मौके ने भी साबित किया- अपनी तरफ से वो कर्म पूरा कर चुके थे… लीला ऊपर वाले ने रची।

एक रुकावट पैदा हुई है… जल्द ही दूर हो जाएगी बाधा… जब आकस्मात कुछ होता है तो ईश्वर भी आकस्मात आपके प्रति जागृत भी हो जाते हैं। घर को सुरक्षा और सद्भाव का माहौल ईश्वर की कृपा का ही रूप होता है। ऊपर जो स्वर्ग की कल्पना और ईश्वर के साथ सवाल जवाब किए गए हैं वो दरअसल बुद्ध धर्म की तांत्रिक प्रक्रिया में मर चुके लोगों को लेकर मंडल बना कर ऐसे ही पेश करके उनका गुण चरित्र बखान किया जाता है… मुझे इसकी जानकारी मिली और देखने का मौका मिला हाल ही की मेरी धर्मशाला-मैक्लियोडगंज यात्रा में।

अरुण जी मेरे जैसे कई लोगों के मेंटर रहे उनका चरित्र ही दूसरों के अंदर गुण देखने का रहा। वो गुण की पहचान भी जानते थे और उसे पुष्पित पल्लवित करने का तरीका भी। उन्हें पता था मेरा स्लग-टॉप देने में इंटरेस्ट है तो वो मुझे पहले ही साल से उस काम से जोड़ने लगे… कहते थे… सुपरफास्ट नाम बोलो… पैदल नहीं। सुपरफास्ट मतलब वो जो मैं सुनुं और शाजी के कमरे में चला जाऊं।

हमने अमल किया… और ऐसे मौके आने शुरू हो गए। वो कहते थे- जो देखा नहीं वो ऑन एयर गया तो इसका मतलब है कि आपने सिर्फ देखा ही नहीं बल्कि उसको फेंका भी। मेरी नजर में ये गुनाह बन गया… ये उनके ही चरित्र का असर था। जो आप खुद अपने परिवार के साथ नहीं देख पाएंगे वैसा कुछ आपको दिखाने, सुनाने, बताने या चलाने से पहले हर स्तर पर विचार कर लेना जरूरी है। कहां ब्लर करना है और कहां बीप लगानी है ये संस्कार शाजी सर ने स्टार और आज तक में भरा लेकिन अब मैं सोचता हूं कि अगर ये अनुशासन हम लेकर आए नहीं होते तो टीवी देखना कितना वीभत्स होता… कितना भयानक!

अरुण जी वो प्रहरी थे जो किसी प्रोजेक्ट के शुरुआत से अंत तक जुड़े रहते थे… और ऐसे कई सारे प्रकल्प वो साथ कई लोगों के लिए भी कर रहे होते थे। एक सेतु की तरह अरुण जी एडिटोरियल के सबसे फॉरवर्ड प्लेस्ड कॉमन लिंक थे। इतना प्रेशर ले लेने की सोच भी आपकी विश्वास सीमा को तोड़ने का अहसास करा देगी… अगर आप कंपनी कॉर्पोरेट कनेक्शन भर के डिपार्टमेंट देखेंगे तो एवरेज कंपनी में भी 6-7 लोग होते हैं. यहां अरुण जी अकेले उतना कुछ सहज भाव में कर लेते थे. कभी बच्चों की टेस्ट कॉपी देना. 500 कॉपी जांच लो. बच्चों को नौकरी देनी है. खुद भी जांचना. लिस्ट बनवाना. चेक करना. रिजल्ट देना दिन भर न्यूज चलाना, सारे स्पेशल चलाना फ्यूचर प्लानिंग करना. वीकेंड फिक्स करना, शिफ्ट लगाना. सब करते हुए. अचानक एक दिन ऐसा हो जाना कि अपने केबिन तक में दाखिल होने से रोक दिया जाना. वो असम्मान. वो पीड़ा… वो वेदना. वो दर्द… आज उनकी मौत के बाद संवेदना मैसेज करने वाले कई लोग शामिल रहे होंगे उस पूरे दिन की साजिश में कि कब उन्हें कहाँ बुलाना है. उनके साथ क्या बात करनी है… उनसे किस लिखी हुई गैरकानूनी चीज पर दस्तखत करवानी है. किस तरह उनका सामान छीनने की कोशिश की जानी है… सिक्योरिटी गार्ड्स को इंवॉल्व किया जाना. या उन्हें किसी भी तरह रोकना? किसने दिया किसी को किसी का अपमान करने का अधिकार।

जिस रात मेरी अरुण जी से बात हुई… वो रोने लगे अपने साथ हुए असम्मान को लेकर। मैंने संकल्प लिया उसी रात अगले दिन रघुवीर रिछारिया जी के नेतृत्व में हमने रिट्रेंच्ड लोगों के लिए आपसी ग्रुप बनाया- Give & Take Help उसका मकसद रहा लेकिन प्लानिंग ऐसी थी हम कोर्ट के जरिए सबकुछ ध्वस्त कर देते, रिट्रेंचमेंट का पूरा अप्रोच बदल जाता केस इतना धाकड़ बन रहा था इसे खुद सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने केस स्ट्रक्चर को ऐतिहासिक माना था।

कानून ये है – लास्ट कम फर्स्ट गो। रिट्रेंचमेंट के मामले में पहले वो बाहर जाएगा जो सबसे बाद में आया है। मतलब केस चलता तो कौन बाहर जाते आप खुद सोच लीजिए। इसके लिए अरुण जी ने फाइनली मना किया इसलिए हम आगे नहीं बढ़े।

अरुण जी बिल्कुल आज ही थे… आपको उनका सबसे ताजा काम देखना चाहिए- आप जी न्यूज का टिकर देखिए – जहां उन्होंने टिकर हेडर का कॉन्सेप्ट लॉन्च किया – ये फॉर्मेट न्यूज से लेकर विज्ञापन तक के लिए एक कारगर स्पॉट तैयार करता है। आप देखेंगे अरुण जी का ये प्रयोग बहुत तेजी से हर चैनल में फैल रहा है- क्योंकि यहां इंफॉर्मेशन भी है और बिजनेस भी। इससे पहले – जब एबीपी न्यूज का रूप रंग बदला- दर्शक बिदक गए हमारे नंबर्स गिरने लगे। स्टोरी को एक दूसरे से अलग कैसे दिखाएं तो बड़ी चुनौती बन गई- तब अरुण जी ही जैकेट का कॉन्सेप्ट लेकर आए तब की हमारी वो मजबूरी आज ना सिर्फ एबीपी न्यूज बल्कि हर चैनल का गहना है।

अरुण जी जागृत थे.. एक दिव्य रोशनी ब्रह्मांड के असीम आनंद से ओतप्रोत इश्वर के करीब, उनके सानिध्य में… शास्त्रों में लिखा है पूजा करने बैठो तो ऐसे जैसे तुम खुद देवता हो – स्नान करो… टीका लगाओ… देवता तुल्य दिखो… तब दर्शन करो भगवान के।

ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जब मृत्यु हो तो तुमने अपना भगवान अब तक जैसा देखा है वहां वो तुमको वैसा ही दिखे… तुम्हारी ही भाषा बोले… तुम ही तुम से तुम्हारा दामन भर दे। भगवान भय देता नहीं – दूर करता है। इसीलिए भगवान से डरिए मत- उसपर विश्वास रखिए और खुद के साथ प्यार रखिए। अरुण जी का मौजूदा मौलिक स्वभाव बदलने लगा था वो असुरक्षा की बात करने लगे थे। लेकिन अरुण जी कभी सोए नहीं। अरुण जी का नाम जिसके नाम पर है वो भी अहर्निश जगा ही रहता है- धरती तो उसके यानी अरुण मतलब सूर्य के साथ अपने पहलू बदल कर दिन और रात कर लेती है… लेकिन स्वयं सूर्य तो अहर्निश ही जलता रहता है… धौंकनी की तरह फूलता पिचकता रहता है… दौड़ते रहते हैं उसके तापी रेशे (प्लाज्मा) अपने ही दायरे में ईधर-ऊधर… हर बात की जिम्मेदारी… हर भरोसे की निगहबानी… हर दायरे को तोड़ खुद से ही खुद को हर दिन मात करने की तैयारी।

रात को दो बजे घर को निकले… लेकिन सुबह साढ़े चार बजे से पीसीआर से लेकर ग्राफिक्स तक की चेकिंग कर चुके अरुण जी से मैं साढ़े छह बजे पहुंचने के बाद मिला… ये एक काउंटिंग का दिन था- मैं उनके केबिन गया – मलीन, निश्तेज चेहरा… दवा खाकर पानी पीते हुए अरुण जी ने बैठने का ईशारा किया। अचानक छींक के साथ पानी फव्वारे की तरह मुंह से निकल गया… सॉरी सॉरी बोलते हुए.. छींकते गए… खांसते गए। मैं सोच रहा हूं अब रुका. अब रुका… चेहरा लाल. सांस में रुकावट जैसी स्थिति समझ में आते हैं कुर्सी पर बैठ चुका मैं खड़ा हो गया उनके पीछे गया… और पीठ सहलाने लगा. कुछ सेकेंड्स में नार्मल जैसे हुए कि संगीता जी और विजय जी अंदर आते दिखे. दोनों ने पूछा क्या हुआ. अरुण जी ने अपनी सरलता में जवाब दिया… हिचकी होने लगी थी बहुत- अब ठीक है। मैं नीचे गिरा उनका टैबलेट एक कागज पर उठाया और बाहर निकल आया केबिन से डस्टबिन की ओर। फिर अपने काम में लग गया… चैनल मॉनिटरिंग टीम में एक सदस्य के तौर पर।

बाद में पता चला उस सुबह से लेकर रात तक अरुण जी का ब्लड प्रेशर 200 पार कर चुका था. उन्होंने मुझे करीब 10 दिन बाद बताया कि डॉक्टर ने तब कहा था कि तीन दिन तक वो अनरिजनेबल जोन में रहे थे. और मैं इसका मतलब जानता हूं कि उस दौरान क्या कुछ उनके साथ हो सकता था, और मैंने सर्च करके वो बात उन्हें पढ़ा भी दी समझा भी दिया।

मुझे नहीं मालूम कि अरुण जी किसी भी बीमारी से पीड़ित थे. वो कहते थे इंसान को कम से कम तीन स्नान करना चाहिए- पहला स्नान पसीने से- दूसरा स्नान सुबह में नॉर्मल पानी से और तीसरा स्नान रात को गर्म पानी से। उनके मुताबिक ये आपको हरदम फ्रेश रखता है. वो योग किया करते थे और अच्छे खिलाड़ी भी थे। मिलाजुला कर जितनी बात मेरी उनसे होती रही दो तीन दिन पहले तक उसके हिसाब से ना तो वो विचलित थे, ना बहुत व्यथित दिखे. किसी तनाव का जिक्र भी उन्होंने नहीं किया।

फिर वो क्या बात थी कि अरुण जी ने उस रात अपने प्राण त्याग दिए जिस रात उनकी बेटी सपनों की सच्ची उड़ान भरने के आखिरी मुहाने पर थी. बोर्डिंग कर रही थी ऑस्ट्रेलिया की फलाइट में। अरुण जी ने उसे रोक दिया. अपने ही सपने को अपनी ही मौत से तोड़ दिया. नींद से जगे तो लेकिन लौट कर इस वाले शरीर में वापस नहीं आ पाए। फिर ये अन्याय किस पर हुआ. बेटी पर. खुद पर. या पत्नी पर. परिवार पर. हम जैसे जानने वालों पर. ये अन्याय किसने किया. वक्त ने, हालात ने, या स्वयं उनकी अपनी प्रकृति ने या आला दर्जे की उनकी सहिष्णुता और सहनशीलता ने।

कितने दर्द दफ्न रहे सीने में, अपमान के कितने घूंट गले से नीचे उतारने पड़े, कितना मैनेजमेंट. कितनी बैलेंसिंग. कितने एक्जीक्यूशन. इतनी समझदारी, प्लानिंग और मैनेजमेंट से हर काम को पूरा करने वाले अरुण जी कभी ना बूढ़े हुए. ना आउटडेट हुए. ना ही उन्होंने किसी भी वक्त किसी भी व्यक्ति से खुद को खतरा महसूस होने दिया. अनिश्चितता आदर और अनादर का फर्क घटा देती है लेकिन ऐसा उन्होंने खुद के मामले में नहीं होने दिया जी न्यूज के अनादर से पहले ही उन्होंने उसको तिलांजली दे दिया। फैसला लेकर खुश भी हुए वो दिखते थे नम्र और भरे थे भीतर तक वो अक्षुन्न अद्भुत और अभय।

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