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कविता में कूद रहे जिस-तिस जुमले पर सुपर बॉस शरमा जाते थे!

चंद्र भूषण-

हे शब्दस्वामी…..दसेक साल पहले की बात है। मेरे सुपरबॉस के जीवन में कोई यादगार मौका आया। मौके को थोड़ा और यादगार बनाने के लिए मेरे एक शीर्ष सहकर्मी ने। बहुत लंबी कविता लिख डाली।

नए-नए आए एक ऐप के जरिये। किसी और ही शहर से। हाई रिजोल्यूशन टीवी पर भरी सभा में इसको पढ़ा। तो आधी आने तक लगने लगा कि नवनीत का तत्व। कविता में कुछ ज्यादा है।

इतना ज्यादा कि सुपरबॉस भी। कविता में कूद रहे जिस-तिस जुमले पर शरमा जाते थे। बीच में एक पॉज आया तो बोल बैठे। अभी और बची है क्या?

हालांकि खुशामद बॉस के लिए ऑक्सीजन जैसी थी। दफ्तर में लोग सालोंसाल। बाहर बेंच पर बैठे हुए। इस मौके के लिए अपनी बारी अगोरते थे।

झेंप शायद उनको इस बात से आ रही थी। कि मक्खन का लेपन तभी जमता है। जब औरों को लगे कि मक्खी उड़ाई जा रही है। या यूं ही धूल झाड़ी जा रही है।

क्या यह अफसोस की बात नहीं। कि इतने नफीस काम में देश की नई पीढ़ी। इतनी ज्यादा ‘रूड, क्रूड एंड रस्टिक’ है। कि सजी महफिल चापलूसी करते हुए भी। किसी पॉर्न स्टार जैसी बेबाकी दिखाती है!

मेरा दूसरा साथी इस मामले में अधिक कलावंत था। तो उसने कलम के बजाय कैमरा उठाया। लोकलाज छोड़कर सुपरबॉस के घर पहुंचा। वश चलता तो रिश्तेदारियों में भी जाता। लेकिन बजट से हलकान था।

दफ्तर में कई लोगों के इंटरव्यू किए। सबने बताया कि सुपरबॉस ने कैसे उनका जीवन संवार दिया। किस तरह उनकी सुरुचि ने इस धंधे को धर्म में बदल डाला। मैंने भी यही सब कहा। सबसे बाहर मुझे न माना जाए।

अच्छे संपादन के बाद उसी उत्सव-सभा में आखिरी आइटम की तरह यह फिल्म भी प्रदर्शित हुई। सुपरबॉस इस बार भी कुछ सकुचाते से नजर आए। लेकिन खीझ में नहीं, किसी नवोढ़ा वधू के ब्लश की तरह।

फिर दफ्तर के कई सारे लोगों ने इस युवा फिल्मकार को घेर लिया। इसरार करते हुए कि कान या ऑस्कर में न सही। राष्ट्रीय स्तर की डॉक्यूमेंट्री प्रतियोगिताओं में यह फिल्म जरूर भेजी जाए।

जो लोग इस उत्साही भीड़ में नहीं घुस पाए थे। वे जरा दूर गुट बांधकर कुढ़न में इतना ही कह-कह-रह जाते थे। कि कवि और फिल्मकार, दोनों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।

उनका दुर्भाग्य कि समय ने उन्हें शत प्रतिशत सही साबित किया। नाम नहीं बताऊंगा, लेकिन आज का हिंदी परिवेश मेरे इन दोनों ही मित्रों का ऋणी है। कला का सार्थक होना काफी है। उद्देश्य यहां खुद में कोई मायने नहीं रखता। जैसे, हमारे वे साझा बॉस अभी कहां हैं कहीं हैं भी या नहीं। ऐसे प्रश्नों का ध्वन्यार्थ दोनों कलाकार हवा की सांय-सांय से लेते होंगे।

दोनों ही फिलहाल मेरी पहुंच से बाहर हैं। लेकिन जब भी उनका जिक्र उठता है, मन हुमकता है कि यह हुनर मुझको भी क्यों नहीं दिया ऐ मेरे मौला कि कलाकारिता का पासा फेंकूं तो हर बार सीधा ही पड़े। पैसों की चाकरी की, बंदों की चाकरी की, शब्दों की चाकरी की, कि कहीं थोड़ी सी जगह ऐसी बचा ले जाऊं जहां किसी की भी चाकरी न करनी पड़े।

पैसा और इंसान अब मेरे मालिक नहीं रहे। अकेले मलिकार बस शब्द ही बचे हैं। जिनकी चंपी करते, पांव पखारते। यह मामूली जीवन खर्च होना है।

ऐश-मौज कौन नहीं करना चाहता। लेकिन मेरे पास यह सब करने का कलेजा नहीं था। सिर्फ अपनी लाइलाज उदासी के लिए। एक छोटा सा कोना सुरक्षित रखने में दुनिया का सारा वक्त निकल गया।

मुझे उम्मीद थी कि शब्द इस काम में मेरी कुछ मदद जरूर करेंगे, लेकिन पहले वे मेरे लिए जितने खराब नौकर थे अभी उतने ही खतरनाक मालिक साबित हो रहे हैं। मेरे सुपरबॉस हमेशा तुम थे, तुम ही रहोगे, हे शब्दस्वामी। किसी से कोई जलन मुझे नहीं है। लेकिन अ से अनार और आ से आम लेकर मैं क्या करूंगा?

जीवन भर की रगड़ के बदले मुझे कुछ देने का मन हो। तो एक सचमुच का अनार देना। जिसका गिलास भर रस कोई घट-घट पिए और पीकर अपना मिजाज तर कर ले। और मेरा आम वह काटकर खाए या चूसकर, मगर खाने के बाद कहे कि ऐसा ही एक और आम खाने के लिए मैं इस कलमघिस्सू का खून कर डालूंगा!

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