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बुद्ध को समझना है तो रजनीश की लफ्फाजियों के जरिये न समझें

सत्येंद्र पी एस-

हिंदी में बुद्धिज्म पर किताबें नहीं मिलतीं। यह कहने पर एक साथी ने सुझाव दिया कि रजनीश के कुछ लेक्चर्स हैं, उसे सुनिए सर। एक सुझाव यह आया कि डॉ बीआर अम्बेडकर की लिखी हुई किताब पढ़िए।

सबसे पहले रजनीश पर बात कर लेते है। रजनीश ने अपने धर्म/दर्शन में पूरी दुनिया के धर्मों की खिचड़ी बनाई है। और यह खिचड़ी बहुत भयानक टेस्ट की बन गई, न तहरी रह गई, न खिचड़ी, न माँसोदन रह गई, न बिरियानी पक पाई। अगर आप रजनीश को बहुत ज्यादा पढ़ेंगे/सुनेंगे और आपका दिमाग ठीक ठाक काम कर रहा है, पहले सुना हुआ याद रहता है तो बौरा जाएंगे कि यह बन्दा कहना क्या चाहता है?

ऐसा इसलिए नहीं कि रजनीश ने बड़ी महान बात कही है जिसे तुच्छ मानव के लिए समझना मुश्किल है। रजनीश मुँह देखी बोलते गए हैं कि अपनी सुविधानुसार समर्थक तैयार कर लें। कांग्रेस की सरकार ने उन्हें लिफ्ट नहीं दिया। वह महात्मा गांधी, नेहरू, इंदिरा गांधी के खिलाफ खूब बोले। मूर्खतापूर्ण और अतार्किक तरीके से विरोध किया है जैसे अभी के नेता करते हैं। गांधी पर हमले के लिए उन्होंने अम्बेडकर से लेकर छुआछूत का सहारा लिया। कई लेक्चर्स में तो सीधे अम्बेडकर के भाषण बोल गए।

उनकी अष्टावक्र गीता की व्याख्या सुनिए और ठाकुर जालिम सिंह वाली अष्टावक्र गीता को पढ़कर सुनिए। जान पाएंगे कि उसमें कुछ लफ्फाजियाँ जोड़कर लच्छेदार शब्दों में कह दिया गया है। उनकी उपनिषदों की व्याख्या भी डॉ सत्यव्रत सिद्धान्तालँकार की एकोपनिषद पढ़ने के बाद ही सुनिए। बहुत आनन्द आएगा।

खैर.. रजनीश ने बुद्ध के हिंदूकरण की जो प्रक्रिया पुराणों ने शुरू की थी, उसी को आगे बढाया है। तमाम उल जुलूल व्याख्याएं कीं। अर्थ का अनर्थ निकाला। और ऐसा करने के पीछे वजह यही रही होगी कि बुद्धिज्म के खरीदार बहुत हैं दुनिया में। बुद्ध की बातें तार्किक होती हैं। मजे की बात है कि रजनीश के फ्रॉड बुद्धिज्म के लिवाल कोई बुद्धिस्ट देश नहीं बन पाए।

इसी तरह से मुस्लिमों के खिलाफ रजनीश की नफ़रत जग जाहिर है। वह अचानक इतिहासकार बन जाते हैं और बड़े तार्किक तरीके से बताते हैं कि ताजमहल पहले एक हिन्दू महल था जिसे कब्र में कन्वर्ट कर दिया गया। वह बताते हैं कि यहूदियों को इजरायल में बसाकर किस तरह भेड़ियों झुंड में डाल दिया गया।

अगर कोई बाल कम्युनिस्ट लगातार रजनीश को सुन ले और वह मुस्लिमों के खिलाफ हिंसक हो जाए, गांधी के खिलाफ हिंसक हो जाए, शाकाहारियों के खिलाफ हिंसक हो जाए, आपको अचानक संघी दिखने लगे तो उसमें आपको आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

यह बुद्धिज्म नहीं है। बुद्ध का राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए सिद्धांतों को विकृत करना है।

अम्बेडकर के बारे में फिर कभी। उधर गालियां पड़ने के चांस ज्यादा हैं। रजनीश के भक्त मेरे सम्पर्क में कम हैं इसलिए गालियां पड़ने का चांस थोड़ा कम है। रजनीश अपने को तार्किक भी मानते हैं ज्ञानी भी। इसलिए वह गाली देने के बजाय इतना ही कहेंगे कि आपने रजनीश को पढ़ा नहीं है। और अगर जान जाएं कि रजनीश को कुछ छोड़ा नहीं है तो कहेंगे कि रजनीश को आपने समझा नहीं मित्र।

लेकिन रजनीश के कॉमन लक्षण जानना चाहें तो यह है कि वो मुस्लिमों को लेकर नफरती होगा। गांधी नेहरू को लेकर नफरती होगा। शाकाहारी है तो वह बकरी के बड़े मनुष्य को मार डालने को तैयार बैठा होगा। गरीबों का विरोधी होगा कि वह अपने कर्म से गरीब हैं।

तो अगर आपको बुद्ध को समझना है तो अम्बेडकर और रजनीश के जरिये न समझें। वरना ड्रग्स से पगला सकते हैं, नफरती हो सकते हैं, या किसी जाति के खिलाफ नफरती हो सकते हैं। कोई भी साइड इफेक्ट पड़ जाएगा, जिसमें आपका चित्त पवित्र होने के बजाय और भी भयानक दुःख से घिर जाएंगे। अगर आपको बुद्ध को समझना है तो किसी लीनेज को पकड़ सकते हैं, जो हजारों साल से बुद्धिज्म पढ़ और पढ़ा रहे हैं। बुद्धिज्म उनका धंधा नहीं है, इसलिए आपको ही उन्हें खोजना पड़ेगा।

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1 Comment

1 Comment

  1. Uday

    July 16, 2024 at 3:23 pm

    क्या गजब लिखा है आपने . रजनीश को
    नफरती साबित करने के चक्कर में आपके पूरे लेख में नफरत की बू आ रही है. बुद्ध को बेहतर समझने के उद्देश्य से लिखे गए इस लेख में आपने यह बताया ही नहीं कि बुद्ध को समझने के लिए कौन सी किताबे पढ़े . लेकिन रजनीश को गलत साबित कर ने में आपने अपनी विद्वता का कमाल प्रदर्शन किया है . लगता है रजनीश ने आपकी किसी दुखती नस को पकड लिया है . आपके लेख में प्रमुख भूल के बारे में रेखांकित कर रहा हूं . बाकी रजनीश ने क्या कहा और क्या नहीं कहा, सही या गलत कहा ? या अलग चर्चा का विषय है. उसमे आप न कुदो तो बेहतर है .

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