
गुरदीप सिंह सप्पल-
लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि कॉंग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लीकार्जुन खरगे जी में ऐसा क्या ख़ास है कि वो जीवन में इतनी ऊँचाइयों तक पहुँच सके।
पिछले कुछ वर्षों में उनके साथ नज़दीकी से काम करने का जब मौक़ा मिला, तो इस सवाल का जवाब परत दर परत खुलता गया। किसी बेहतरीन इत्र की माफ़िक़, जिसकी ख़ुशबू की अलग अलग लेयर अलग अलग एहसास महकाती जाती है। किसी गहरे सागर की माफ़िक़, जिसमें जितना गहरा पैठते जाएँगे, उतने ही नायाब अनुभव पाते जाएँगे।

खरगे जी एक बेहद सहज, सरल व्यक्ति हैं, जिनसे मिल कर किसी को एहसास भी नहीं होता है कि वो पिछले 55 वर्षों से लगातार सत्ता में हैं। हमेशा कभी मंत्री रहे, या फिर नेता विपक्ष के रूप में उन्हें मंत्री का दर्जा मिला रहा। क़रीब पचास साल तक लगातार चुनाव जीतते रहे। लेकिन मिलो तो यही लगता है कि बिलकुल अपनों जैसे हैं। कोई अहंकार नहीं, सत्ता का कोई गर्व नहीं। पर वचन के पक्के। सवाल ही नहीं कि कभी झूठ बोल दें। जो कर सकेंगे, वही कमिट करेंगे, वरना साफ़ मना कर देंगे। अपने भाषणों तक में कुछ कहना है तो ठोक-बजा कर, जाँच-परख कर ही कहेंगे। जिस दौर में झूठ को एक बेहतरीन राजनीतिक टूल के रूप में स्थापित किया जा रहा हो, उस दौर में भी खरगे जी सत्य की पताका थामे, नैतिक मूल्यों की ज़रूरत का ऐलान करते नज़र आते हैं।
खरगे जी आधुनिक भारत के संवैधानिक ख़्वाब का मूर्त रूप हैं। संविधान ने इतिहास में पहली बार जो बराबरी का अधिकार दिया था, उसकी पहली पौध हैं, जो ज़मीन से जुड़े रह कर वट वृक्ष बन गई है।
ग़रीबी, तिरस्कार, सांप्रदायिक नफ़रत और अभावों को झेलते हुए जो बचपन बीता, वो संविधान और शिक्षा की उँगली पकड़ कर बड़ा हुआ, फिर लोकतांत्रिक रास्ते से बेहद ताकतवर बन गया। लेकिन जब ताक़त मिली तो मन में बदले की भावना नहीं थी, किसी व्यक्ति या समाज से हिसाब चुकता करने का उद्देश्य नहीं था, इतिहास से प्रतिशोध लेने का भाव कभी नहीं था। कोशिश थी तो बस सिर्फ़ एक खूबसूरत, बराबरी का भारतीय समाज रचने की, जो घृणा से, नफ़रत से दूर हो, जहां इंसान की गरिमा सुनिश्चित हो।
जब खरगे जी का ये सपना समझ आ जाता है, तो फिर कोई हैरानी नहीं होती है कि उन्होंने क्रोध पर कैसे विजय पायी होगी! क्यों उनके मन में किसी के भी प्रति वैमनस्य का कोई भाव नहीं दिखायी देता है! कैसे वो क्रांतिकारी स्वभाव के होते हुए भी बेहद शांत हो सकते हैं! कैसे क्षमा और करुणा उनका स्वाभाविक गुण है! बुद्ध को मानने वाले खरगे जी में बुद्ध की शिक्षाओं को मैं रोज़ सजीव देखता हूँ।
आज उनके जीवन के 83 वर्ष पूर्ण हुए हैं। लेकिन उम्र का कोई बंधन उन्हें जकड़ पाने में अभी तक असफल हुआ है। दिन रात लोगों से मिल कर; चुनावों में, भीषण गर्मी में रोज़ कैंपेन कर; संगठन की अंथक चुनौतियों से जूझते हुए भी उनकी ऊर्जा मानो असीम है। न उनके सपने थके हैं, न उनके प्रयास।
उम्र के इस पड़ाव पर भी पूरे जोश के साथ संवैधानिक मूल्यों के पुनर्स्थापन में जुटे हैं, क्योंकि खरगे जी का दृढ़ विश्वास है कि अगर संविधान कमज़ोर हुआ तो ग़रीबों- शोषितों के उद्धार का सफ़र फिर से रिवर्स गियर में चला जाएगा। जवाहरलाल नेहरू- बाबा साहेब अंबेडकर का ऐतिहासिक प्रोजेक्ट फेल हो जाएगा, जिसके चलते हज़ारों साल में पहली बार दबे-कुचले समुदाय के भारतीयों ने सिर उठा कर सम्मान से चलना शुरू किया, उनका मिडल क्लास में प्रवेश शुरू हुआ, सत्ता प्रतिष्ठानों के दरवाज़ों पर उनकी दस्तक शुरू हुई। मैंने देखा है कि उनकी ऊर्जा का स्रोत राजनीतिक नहीं है, सामाजिक परिवर्तन की भीषण चाह से जुड़ा है। इसी चाहत को पूरा करने के लिए उन्होंने धर्मों का, दर्शन का गहन अध्ययन किया है, किसी भी विषय के तह तक जाने की कोशिश करते हैं, और अपनी राजनीति का सामाजिक समझ और नये आईडिया के साथ सम्मिश्रण करते हैं। इसीलिये आज खरगे जी उस मुक़ाम पर पहुँचे हैं कि लोग उन्हें सहज ही अजातशत्रु और सोलीलादा सरदार (कभी न हारने वाला) कहते हैं।
आपको जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ, सर!
वरिष्ठ पत्रकार गुरदीप सिंह सप्पल कांग्रेस प्रवक्ता और राज्यसभा टीवी के पूर्व सीईओ हैं।


