सुशोभित-
विवेकचूड़ामणि… आचार्य शंकरकृत ‘विवेकचूड़ामणि’ वेदान्त-साहित्य का मुकुटमणि है। अद्वैत सम्प्रदाय में प्रस्थानत्रयी के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ यही है और प्रकरण-ग्रंथों में भी यह अग्रगण्य है। वेदान्त के सभी महत्त्वपूर्ण विचार इसमें आ गए हैं। अगर वेदान्त-साहित्य में किसी अन्य ग्रंथ का अध्ययन न करके अकेले इसी का अध्ययन करें तो भी सारतत्त्व आपको मिल जावेगा।
पुस्तक का आधार ‘विवेक’ है। किन्तु साधारण विवेक नहीं, बल्कि शिरोधार्य करने योग्य ‘चूड़ामणि’ विवेक। एक तो सांसारिक विवेक होता है- नीर-क्षीर विवेचन। खरे और खोटे का भेद करना। यह भी बहुतों में नहीं होता। फिर आध्यात्मिक विवेक तो और दुर्लभ है। यह ‘नित्यानित्यवस्तुविवेक’ है। ‘साधन चतुष्टय’ में विवेक को प्रथम माना गया है। दूसरा साधन वैराग्य है। विवेकचूड़ामणि में कहा गया है कि विवेक और वैराग्य साधक के लिए वैसे ही हैं, जैसे किसी विहग के लिए उसके दोनों पंख। दोनों पंखों के बिना पक्षी उड़ नहीं सकता। विवेक और वैराग्य के बिना भी साधना सम्भव नहीं। और वैराग्य की उत्पत्ति भी विवेक से ही होगी।
नित्यानित्यवस्तुविवेक का अर्थ यह है कि कौन-सी वस्तु नित्य है और कौन-सी अनित्य, इसका हम दर्शन करें। और यह जानना किसी देदीप्यमान प्रतीति की तरह मनुज के अंतस् में हो। उसके बाद अनित्य का मोह स्वत: ही छूट जाता है। पुस्तक में अनेक अवसरों पर ‘सर्परज्जुभ्रम’ का दृष्टान्त दिया गया है। इसे आचार्य शंकर ‘अध्यास’ कहते हैं। रज्जु में सर्प नहीं है, सर्प का अध्यास है। रज्जु को रज्जु की तरह देखते ही उसमें से सर्प का अध्यास भी विलीन हो जाता है। इसी से विवेक की उत्पत्ति होती है। क्या हो अगर संसार के समस्त अवयवों के प्रति एक प्रखर और सुतीक्ष्ण ‘नित्यानित्यवस्तुविवेक’ की उत्पत्ति मनुज के अंतस् में हो? नित्य किसे कहा जाएगा और अनित्य किसे- शार्दूलविक्रीड़ित छन्द में निबद्ध विवेकचूड़ामणि के 580 श्लोकों में अनेक रीतियों से इसकी विवेचना की गई है।
ग्रंथ के आरम्भ में ही (तीसरा श्लोक) वह वाक्य है, जिसने स्वामी विवेकानन्द को संन्यास लेने के लिए प्रेरित किया था। इसमें तीन दुर्लभ प्राप्तियों को बतलाया गया है- ‘मनुष्यत्वं, मुमुक्षुत्वं, महापुरुष-संश्रय:।’ वे विवेकानन्द के जीवन में फलीभूत हो गई थीं।

13वें श्लोक में आचार्य शंकर का उद्घोष है कि “तीर्थों में स्नान, दान या सैकड़ों प्राणायाम से भी ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति नहीं होती, वह तो सम्यक् रीति से विचार करने से ही होती है।” 20वें श्लोक में शंकर का प्रसिद्ध कथन ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ है। ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या जानने को ही शंकर ने ‘नित्यानित्यवस्तुविवेक’ कहा है। स्पष्ट है कि ब्रह्म नित्य है और जगत् अनित्य। और अनित्य होने भर से जगत् मिथ्या हो जाता है।
54वें श्लोक में फिर शंकर का उद्घोष सुनें : “जैसे चन्द्रमा का स्वरूप किसी अन्य की आँखों से नहीं, अपनी ही आँखों से देखकर समझा जा सकता है, वैसे ही आत्मा-रूपी वस्तु का स्वरूप अपनी ही ज्ञान-दृष्टि से जाना जायेगा।” 56वें श्लोक में कहते हैं : “मोक्ष की सिद्धि योग या सांख्य या कर्म से नहीं, अपितु ब्रह्म और आत्मा के एकत्त्व-बोध से ही होती है।” 58वें श्लोक में वाग्विलास पर प्रहार है : “भाषा का ज्ञान, शब्द-संयोजन की कुशलता, शास्त्रों की व्याख्या में निपुणता विद्वानों की मुक्ति नहीं भोग के साधन हैं!”
108वें श्लोक में शंकर की वह प्रसिद्ध उक्ति है, जिसमें माया को परमेश्वर की शक्ति और अनिर्वचनीय बतलाया है। तत्त्वबोध की तरह यहाँ भी शंकर- किंचित विस्तार से- तीन शरीरों और पाँच कोशों का वर्णन करके उन्हें अनात्मा (अनित्य) सिद्ध करते हैं। आगे कहते हैं कि “जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति- तीनों अवस्थाओं में बुद्धि की क्रिया- उसकी वृत्तियों की विद्यमानता तथा अभाव को, ‘मैं’ के रूप में जानता है, वही चैतन्य-स्वरूप आत्मा है।” 135वें श्लोक का महत्त्वपूर्ण कथन है कि “यह ज्ञान-स्वरूप आत्मा, बुद्धि के साक्षी के रूप में, इस अनंत सत्-असत् को प्रकाशित करता हुआ, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाओं में, अहम्-अहम् के रूप में लीला कर रहा है!”
देहादि में आत्मबुद्धि को शंकर ने अविद्या कहा है। 163वें श्लोक की व्यंजना देखें : “जैसे शरीर की छाया में, प्रतिबिम्ब में, स्वप्न में देखे शरीर में, कल्पित देह में तुम्हारी तनिक भी आत्मबुद्धि नहीं आती, वैसे ही जीवित शरीर में भी आत्मबुद्धि नहीं आनी चाहिए।”
श्लोक क्रमांक 390 की व्यंजना सुनें : “जैसे तरंग, फेन, भँवर, बुलबुले आदि सभी स्वरूप से जल मात्र हैं, वैसे ही देह से लेकर अहंकार तक सबकुछ चैतन्य मात्र है।” आगे जोड़ा है : “क्या कलश, घट, कुम्भ आदि मिट्टी से पृथक हैं?”
संचित कर्मों की क्षणभंगुरता पर यह उक्ति है : “स्वप्न में यदि कोई जघन्य पाप हो जाता है तो निद्रा से जागने पर क्या उसके लिए व्यक्ति को नरक ले जाया जायेगा?” (श्लोक 448)
वेदान्त में ‘घटाकाश’ का रूपक बहुधा प्रयुक्त होता है, सो वह यहाँ भी है : “जैसे आकाश घट में स्थित सुरा की गंध से लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा स्थूल शरीर और सूक्ष्म अंत:करण की उपाधियों से सम्बद्ध होकर भी उनके गुणों से लिप्त नहीं होती।” (श्लोक 450)
श्लोक क्रमांक 505 की यह प्रसिद्ध काव्योक्ति देखें : “जैसे घर में जल रहे दीपक को वहाँ होने वाली घटनाएँ स्पर्श नहीं कर पातीं, वैसे ही विषयों के गुणधर्म उनसे पृथक् अविकारी, उदासीन, साक्षी-स्वरूप आत्मा का स्पर्श नहीं कर पाते हैं।”
यह विवेकचूड़ामणि ग्रंथ ऐसे अगणित विवेक-रत्नों से भरा है। बोध के लिए इकलौता यही ग्रंथ पर्याप्त है। इससे न हो, तो फिर किसी अन्य ग्रंथ से भी मनुज को बोध नहीं हो सकेगा!
इस ग्रंथ में इतने सुभाषित हैं कि जब रेखांकित करने बैठा तो पन्ने दर पन्ने रंग गए। 212 पृष्ठों में विवेक का महासमुद्र समा गया है। आजीवन नित्य पाठ के योग्य है यह पुस्तक।


