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साहित्य

अशोक भौमिक की इस किताब में इलाहाबाद तो है ही आजमगढ़, कानपुर और लखनऊ भी झांकता है!

दया शंकर राय-

मकालीन चित्रकला की दुनिया में अशोक भौमिक एक ऐसा नाम है जिसने चित्रकला की बिलकुल समझ न रखने वाले किसी व्यक्ति के अंदर भी चित्रकला के प्रति एक जिज्ञासा जगा दी है। आधुनिक चित्रकला में एक जो अमूर्तन की धारा विकसित हुई उसको लेकर कला समीक्षकों ने उसकी गांठें खोलने के बजाय उसे और दुरूह बना दिया। लेकिन अशोक भौमिक उस दुरूह कर दी गई कला समीक्षकों की दुनिया और समझ पर ही चोट करते हुए चित्र को देखने का बिलकुल सहज और नया व्याकरण विकसित करते हैं। और इसकी वजह यह है कि अशोक भौमिक की कला की समझ इकहरी और एकांतिक दुनिया में ही खोई नहीं रहती बल्कि साहित्य की लगभग सभी विधाओं यानी कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और पोस्टर कविता जैसी विधाओं में भी उनकी गहन आवाजाही है इसीलिए वह चित्रकला को देखने परखने की बिलकुल नई दृष्टि के साथ चित्रकला को जटिलता से बाहर निकालने में सफल होते हैं।

चित्रकला पर तो भारतीय चित्रकला का सच, चित्त प्रसाद और उनकी कला, भारतीय चित्रकला हुसैन के बहाने, महामारी और चित्रकला, अकाल की कला और जैनुल आबेदीन जैसी कई महत्वपूर्ण किताबें हैं ही; जीवनपुरहाट जंक्शन, आइस-पाइस जैसे कहानी संग्रह, मोनालिसा हंस रही है और शिप्रा एक नदी का नाम है जैसे उपन्यास भी उनकी रचनात्मकता की बहुआयामी दुनिया का पता देते हैं। इस सब को गढ़ने में एक तरह से उस इलाहाबाद शहर की भूमिका बहुत अहम रही है और उसी महबूब शहर इलाहाबाद पर उनके संस्मरण की किताब अभी इसी साल सेतु प्रकाशन से आई है जिसमें अशोक भौमिक की सृजनात्मक शख्शियत के बनने के बीज तत्व मिल जाते हैं।

“खोये हुए लोगों का शहर”..! अशोक भौमिक की यह संस्मरणात्मक किताब सिर्फ अशोक भौमिक का निजी संस्मरण नहीं है बल्कि यह किताब अस्सी के दशक के इलाहाबाद की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करती है जिस दौर के इलाहाबाद ने हम जैसों बहुतों की भी पूरी जीवनधारा ही बदल दी। मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी के साथ अशोक भौमिक 1982 में इलाहाबाद आने से पहले आजमगढ़ में थे अपनी चित्रकला की प्रारंभिक सक्रियता के साथ। पर इलाहाबाद ने जिस तरह उनकी सांस्कृतिक अभिरुचियों को व्यापक फलक और नये संदर्भ दिये वह उनके लिये भी युगांतरकारी था।

इलाहाबाद पर रवींद्र कालिया के भी संस्मरण हैं पर उसमें बहुत कुछ साहित्य की दुनिया की उठापटक और छिद्रान्वेषण भी मिलेगा। लेकिन अशोक भौमिक की यह किताब इस मायने में भिन्न है कि इसमें “मैं” अशोक भौमिक नहीं “हम” अशोक भौमिक की सृजनात्मक निर्मिति होती है इसीलिए सिर्फ साहित्य और कला की दुनिया के सिर्फ नामचीन ही नहीं प्रगतिशील छात्र संगठन के तमाम कार्यकर्ता और इलाहाबाद के वे आम नागरिक भी अशोक भौमिक की यादों से बाबस्ता हैं जिनमें से बहुत तब भी अनाम थे और आज भी अनाम हैं। और भौमिक जी ऐसा इसलिए कर पाते हैं कि कला की उनकी वैयक्तिकता इलाहाबाद आने पर बिलकुल नई दिशा की ओर मुड़ जाती है और इसमें प्रगतिशील छात्र संगठन के छात्रों द्वारा बनाये जाने वाले कविता पोस्टर भी उन्हें एक नई राह की ओर ले जाते हैं और कविता पोस्टरों में उनकी तरह-तरह की प्रयोगधर्मिता उनकी चित्रकला की दुनिया पर भी असर डालती है..!

इस किताब में इलाहाबाद का अस्सी का वह दौर तो है ही बीच-बीच मे आजमगढ़, कानपुर और लखनऊ भी झांकता है और कुछ ऐसे पात्र जिन पर शायद ही किसी की नजर गई हो। काफी हाउस के एक कर्मचारी के रिश्तेदार माउथ ऑर्गन बजाने वाले जेम्स को उन्होंने जिस संवेदनशीलता से याद किया है उससे पता चलता है कि उनकी संवेदना का भीतरी तल कहाँ तक फैला हुआ है। लेकिन कहीं भी संस्मरणों में अशोक भौमिक का स्व प्रभुत्व नहीं पाता बल्कि उन्होंने सुल्तानपुर से आजमगढ़ की यात्रा के दौरान जाड़े की एक रात में बस में नौटंकी टीम की एक महिला सदस्य के साथ बस कंडक्टर और ड्राइवर के द्वारा की गई बदतमीजी के दौरान खुद के खामोश रह जाने का जिस तरह वर्णन किया है वह उनकी अपनी कमजोरी की स्वीकारोक्ति तो है ही ऐसे मामलों में समाज की मध्यवर्गीय मानसिकता से भी रूबरू कराती है।

अस्सी और नब्बे के दशक के शुरुआती समय की इलाहाबाद की पूरी सांस्कृतिक हलचलों को जिस व्यापक समय सन्दर्भों में याद करते हुए भौमिक जी ने इस किताब में उसे पिरोया है, उस दौर का इलाहाबाद पूरी रचनात्मकता के साथ जीवंत हो उठता है। किताब के बारे में ज्यादा कुछ बता देने पर पढ़ने का लुत्फ़ जाता रहता है..! इसलिए इतना ही..! आज अशोक भौमिक दा का जन्मदिन भी है। वे 71 साल के हुए। इसलिए इस किताब के बहाने उन्हें याद करते हुए खूब सारी बधाई और शुभकामनाएं कि चित्रकला जगत की अबूझ बना दी गई दुनिया की जटिल गांठे खोलने का अशोक दा अभियान नये-नये रंगों में सामने आए।

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