गीता श्री-
मैं सालों से इस आयोजन में भाग लेती रही हूँ. पहले पत्रिका की तरफ़ से रिपोर्टिंग करने के लिए आती थी. सबके भाषण सुनती और रिपोर्ट लिखती थी. प्रति वर्ष राजेन्द्र जी आमंत्रण पत्र भेजते और उस पर वे कलम से लिखते थे कुछ मज़ेदार पंक्तियाँ. वो आज तक गूंजती हैं. उसे पढ़ कर समारोह में जाए बिना नहीं रहा जाता.
हर साल जाती रही… एक से एक टॉपिक, वक्ता और बहसें. बाद में खूब चर्चाएँ. तस्वीरें. इस बार उस शाम से इंतज़ार कर रही हूँ… न कोई पोस्ट, न कोई प्रतिक्रिया न तस्वीरें. न बहस न विवाद न कुछ नयी बात.
हंस का सालाना जलसा इतना फीका तो कभी नहीं रहा. मैं जब हॉल में बैठी तो एक लेखिका ने मंच पर वक्ताओं को देखा और फिर हॉल में नज़र दौड़ाते हुए पहले ही कह दिया- बस इतने ही लोग! ऐसा तो पहले कभी नहीं. हॉल खचाखच भरा रहता था और वक्ता और विषय दोनों ज़ोरदार होते थे. क्या घिसा-पिटा विषय लेकर आए हैं. कुछ न निकलेगा…!”
वही हुआ. समारोह की सफलता भीड़ से नहीं मानी जाती, वक्ताओं से, जो क्या बोलते हैं, नया क्या बोलते हैं?
यहाँ तो जाति और धर्म को लेकर किसी की अवधारणा स्पष्ट नहीं थी. हंस के संपादक संजय सहाय ने एक सूत्र दिया और बात वहाँ से शुरु होकर कुछ का कुछ हो गई.
मैं संजय सहाय का वक्तव्य जुटाने की कोशिश में हूँ. मैंने नोट किया है. जल्दी साझा करुंगी.

कुछ युवा वक्ताओं में एकाध चेहरे को देख कर ख़फ़ा हो उठे थे. किसी के पास कोई फैक्ट नहीं. सही जानकारी नहीं. ग़लत उदाहरण देकर भरमाने की कोशिश. मैं डिटेल नहीं लिख सकती. लंबा हो जाएगा.
फ़िलहाल तो अचरज हो रहा कि किसी ने मंच की न सही, आपसी मेलजोल की तस्वीरें भी न डाली हैं. जबकि आपसी मोहब्बते तो ख़ूब छलक रही थीं और पकड़-पकड़ कर तस्वीरें भी हुईं. कहाँ गईं वे तस्वीरें? किसी ने कुछ लिखा क्यों नहीं?
विचारोत्तेजक बहस न हो तो कोई क्या लिखे? बहुत फीका रहा … वजह आयोजकों को तलाशना चाहिए. विषय और वक्ता का चयन जरुर ध्यान रखने लायक.


