आप कभी जॉर्डन की राजधानी अम्मान जायेंगे, शहर के केंद्र में एक दीवार पर महमूद दरवेश की आंखें आपका ध्यान आकृष्ट करेंगी। फ़िलस्तीन के राष्ट्र कवि दरवेश जबतक ज़िंदा थे, मोशे दयान तक दहलते थे. तत्कालीन इज़रायली रक्षा मंत्री मोशे दयान कहा करते थे, “हम दिन में गाज़ा पर शासन करते हैं, रात होते महमूद दरवेश का यहाँ राज हो जाता है।” फिलस्तीन में कवि-लेखकों का ज़बरदस्त क्रेज़ है. वो जो लिखते हैं, आंदोलन की आग में पेट्रोल का काम करता है. फिलस्तीनी कवि, साहित्यकारों का इतना ख़ौफ़!

पुष्परंजन-
बेंजामिन नेतन्याहू का कवि, साहित्यकारों, पत्रकारों से किस बात का बैर? 7 अक्टूबर 2023 के बाद इज़राइल ने 40 हज़ार से अधिक लोगों के मारने का जो विश्व रिकार्ड बनाया है, उनमें 113 पत्रकार, 68 साहित्यकार-कवि शामिल हैं. इस समय इज़राइली सेना को कवि-साहित्यकारों को चुन-चुन कर मारने का अघोषित आदेश मिला हुआ है. पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गठित समिति (सीपीजे) ऐसे मृतकों का दस्तावेज़ीकरण कर रही है, जिनका लेखन से नाता रहा है. इज़राइली डिफेन्स फ़ोर्स (आईडीएफ) का दशकों पुराना पैटर्न है, “आतंकवादी और कवि साथ-साथ दिखें, तो सबसे पहले कवि को गोली से उड़ा दो.” जायोनी शासन अब भी कहानीकार, कवि, लेखक, कलाकार, शिक्षक, पत्रकार को ख़तरनाक हथियार से कमतर नहीं मानता।
7 अक्टूबर 2023 को कवि, क़िस्सागो और कम्युनिटी कार्यकर्ता उमर फ़ारिस अबू शावीश की गाज़ा में नुसेरात शरणार्थी शिविर पर गोलाबारी के दौरान हत्या कर दी गई थी। 2016 में प्रकाशित, ‘अल क़ायदा अल-मौत’ के लेखक अबू शावीश कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़े गए थे, जिनमें जॉर्डन में अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय गीत और विरासत महोत्सव में “वर्ष 2007 का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय गीत” पुरस्कार शामिल है. उन्हें 2013 में अरब लीग के एकीकृत विकास के लिए अरब युवा परिषद द्वारा “मीडिया, पत्रकारिता और संस्कृति के क्षेत्र में प्रतिष्ठित अरब युवा” पुरस्कार भी दिया गया था। टीवी जर्नलिस्ट अल-घोल की रिपोर्टें अरब दर्शकों के बीच लोकप्रिय थीं, जब उनकी हत्या की गई, उस समय उन्होंने अल जज़ीरा की प्रेस जैकेट पहन रखी थी।
32 साल की हरदिल अज़ीज कवयित्री व लेखिका हेबा अबू नादा, 20 अक्टूबर को दक्षिणी गाज़ा में इजरायली हवाई हमले में मारी गईं। 8 अक्टूबर को प्रकाशित अपनी अंतिम फेसबुक पोस्ट में हेबा अबू नादा ने लिखा था, “ रॉकेट की चमक से इतर गाज़ा की रात अंधेरी है. बमों की आवाज़ भयानक है. गुड़ नाईट गाज़ा।“ 2017 में, हेबाअबू नादा ने ‘ऑक्सीजन इज़ नॉट फॉर द डेड’ के लिए शारजाह पुरस्कार जीता था। 6 दिसंबर 2023 को इजरायली हवाई हमले में मारे जाने से कुछ सप्ताह पहले, फिलिस्तीनी कवि रेफात अलारीर ने 2011 में छपी अपनी कविता, ‘इफ आई मस्ट डाई’, साझा की थी। कविता में लिखा है, “अगर मुझे मरना ही है/ तो तुम्हें जीना है/ मेरी कहानी सुनाने के लिए।”
7 दिसंबर 2023 को उत्तरी गाज़ा में इज़राइल ने अंग्रेजी के प्रोफेसर, लेखक और संपादक रेफ़ात अल-अरीर को उनकी बहन और उनके बच्चों के साथ मार डाला। रेफात के छात्रों और मित्रों ने एक्स पर ‘पतंग’ शीर्षक से मशहूर उनकी एक कविता साझा की, जिसे उन्होंने कुछ सप्ताह पहले लिखा था. “पतंग को देखो/ मेरी पतंग जो तुमने बनाई थी/ ऊपर उड़ते हुए/ और एक पल के लिए सोचे कि कोई फरिश्ता है/ प्यार वापस ला रहा है।”
गाज़ा युद्ध में जो फिलस्तीनी साहित्यकार शहीद हुए, उनके मारे जाने की कहानी लगभग एक सी है. लक्षित हमला. आधुनिक फिलिस्तीनी साहित्य की क्यूरेटर के रूप में जानी-पहचानी शख्सियत सलमा खदरा अल-जयुसी लिखती हैं: “चाहे इज़राइल में हों, या वेस्ट बैंक में, और गाज़ा पट्टी में, या प्रवासी समुदाय में, फिलिस्तीनी अपनी पहचान, और जीवट जीवन के लिए प्रतिबद्ध हैं. फिलिस्तीनी साहित्य का दायरा दूसरे महाद्वीपों तक फैला हुआ है। उत्तरी अमेरिका, लैटिन अमेरिका, यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया में प्रवासी फिलिस्तीनी अपनी मातृभूमि को खोने के ज़ख़्म का टांका खोलते हैं, लेकिन वे ऐसा कई तरह की शैलियों, कई भाषाओं, और कई संस्कृतियों में रूपांतरित करते हैं।
आप कभी जॉर्डन की राजधानी अम्मान जायेंगे, शहर के केंद्र में एक दीवार पर उकेरे भित्ति चित्र में महमूद दरवेश की आंखें आपका ध्यान आकर्षित करेंगी। फिलिस्तीन के राष्ट्र कवि महमूद दरवेश जबतक ज़िंदा थे, मोशे दयान तक दहलते थे. महमूद दरवेश अल हुसैनी (1941-2008) के बारे में तत्कालीन इज़रायली रक्षा मंत्री मोशे दयान कहा करते थे, कि दिन में हम गाज़ा पर शासन करते हैं, महमूद दरवेश देर रात तक यहाँ शासन करते हैं।”
19 वर्ष की आयु में महमूद दरवेश की पहली कविता, ‘असफ़िर बिला अजनिहा’ (परकटा पक्षी) प्रकाशित हुई थी। उनकी कविताएँ अक्सर इज़राइली कम्युनिस्ट पार्टी की साहित्यिक पत्रिका ‘अल जदीद’ में छपती. कालांतर में वो इसके संपादक बन गए। नवंबर 2008 का वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन, जब अल-हुसैनी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. महमूद दरवेश, इज़राइली कम्युनिस्ट पार्टी, राकाह के सदस्य थे। बाद में इज़राइली वर्कर्स पार्टी द्वारा प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका अल फ़ज्र के सहायक संपादक भी बने।
1973 में पीएलओ (फिलिस्तीन मुक्ति संगठन) में जब वो शामिल हुए, तो उन्हें फ़िलिस्तीन में फिर से प्रवेश करने पर जायोनी शासन ने प्रतिबंध लगा दिया। 1973 में, उन्होंने बेरुत से प्रकाशित मासिक पत्रिका शू’उन फ़िलिस्तीनिया (फ़िलिस्तीनी मामले) का संपादन के साथ-साथ फ़िलिस्तीनी अनुसंधान केंद्र में निदेशक के रूप में काम किया। लेबनान युद्ध के हवाले से महमूद दरवेश की राजनीतिक कविताएँ 1982 में ‘कसीदात बेरूत’ और 1983 में ‘मदीहअल-ज़िल अल’अली’ में छपीं. दरवेश 1987 में पीएलओ कार्यकारी समिति के लिए सदस्य बने. 1988 में उन्होंने फ़िलिस्तीनी घोषणापत्र लिखा था।
1993 में महमूद दरवेश ने ओस्लो समझौते के विरोध में पीएलओ की कार्यकारी समिति से इस्तीफ़ा दे दिया। 1995 में पीएलओ छोड़ने के कारण, उन्हें वेस्ट बैंक में रहने की अनुमति दी गई और वे रामल्ला चले गए। दरवेश ने दो बार शादी की। उनकी पहली पत्नी लेखिका राना कब्बानी थीं। तलाक के बाद 80 के दशक में उन्होंने मिस्र की अनुवादक, हयात हीनी से शादी की। उनसे भी नहीं बनी. महमूद दरवेश की कविताओं में “रीता” नामक एक यहूदी महिला अक्सर नमूदार होती थी, जिसे वे हाइफ़ा प्रवास के दौरान प्यार करने लगे थे. 15 जुलाई 2007 को हाइफ़ा में माउंट कार्मेल ऑडिटोरियम में एक कविता पाठ में भाग लेने के लिए उनकी इज़राइल की अंतिम यात्रा थी। वहाँ, उन्होंने फ़तह और हमास के बीच गुटीय हिंसा और मानव बमों के इस्तेमाल की आलोचना की. दरवेश जैसे कवि का दबदबा था, कि उनसे असहमत लोग भी उनकी आलोचना और डाँट बर्दाश्त करते।
लंदन के वेस्टमिंस्टर विश्वविद्यालय में अरबी भाषा और संस्कृति के वरिष्ठ व्याख्याता अतेफ अलशायर कहते हैं कि 1930 के दशक से ही फिलिस्तीनी कविता औपनिवेशिक शक्तियों को ललकारती रही है। 1948 के नकबा के समय फिलस्तीनी निर्वासन पर बहुत कुछ लिखा गया था. बक़ौल अलशायर,” विस्थापित फिलिस्तीनियों के लिए कविता मातृभूमि का पुनर्निर्माण करने की शक्ति देती है. महमूद दरवेश, फदवा तुकान, और नजवान दरवेश जैसी हस्तियों की रचनाएँ इसकी मिसाल हैं।”
1948 में फिलिस्तीनी निष्कासन तथा 1967 के छह दिवसीय युद्ध के बीच के कालखंड को प्रतिरोध साहित्य का बुनियाद माना जाता है. 1967 के बाद से, अधिकांश आलोचकों ने फिलिस्तीनी साहित्य को भौगोलिक आधार पर तीन फलकों में विभाजित किया है. पहला, इज़राइल के अंदर हुई रचना. दूसरा, कब्जे वाले क्षेत्रों से. और तीसरा, पूरे मध्य-पूर्व में फिलिस्तीनी प्रवासियों द्वारा जो कुछ रची गई, उसका विश्वभर में हुआ विस्तार।
कुछ दिन पहले दिल्ली स्थित फिलिस्तीनी राजदूत अदनान अबू अल हाइजा का मैं इंटरव्यू कर रहा था. उस काम से फ़ारिग़ होने के बाद, निजी बातचीत में अम्बेस्डर अदनान अबू अल हाइजा ने बताया कि आये दिन गोलाबारी, अशांति के बावजूद फिलस्तीन में साक्षरता दर 99.4 प्रतिशत है. इसके उलट नेशनल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, “ 2023 में भारत की साक्षरता दर 77.7 प्रतिशत रही है।“
भारत के मुक़ाबिल, फिलस्तीनी अदबी दुनिया कितनी मज़बूत है, उनके इलाक़े में जाने पर समझ में आती है. ग़स्सान कानफानी, अहद तमीमी, अदानिया शिब्ली, हाला अलयान, इसाबेल्ला हम्माद को पढ़िए, तो महसूस होता है कि ये सभी शब्दों के बड़े कीमियागर रहे हैं। इन्होंने अपने समय के साहित्य को लगभग बदल कर रख दिया।
इसके ठीक उलट, भारतीय रचना संसार के लेखकों-कवियों को जब आप प्रकाशकों के आगे रिरियाते, पुरस्कार माफियाओं और तथाकथित मठाधीशों की मुहर अपनी कृतियों पर लगने का इंतज़ार करते देखेंगे, तो शर्म ज़रूर आती है. “आलू ले लो…टमाटर ले लो” की शैली में जब हिंदी का कोई कवि-लेखक पाठकों से पढ़ने का निवेदन करता फिरता है, तब फिलस्तीन की याद आती है।
फिलस्तीनी लेखन अपनी विरासत को बनाये रखने के लिए जोश देता है. जायोनी शासन के ख़िलाफ़ जुगुप्सा, और ऊर्जा पैदा करता है. शायद, यही वजह है कि इज़राइल ने गाज़ा हमले में स्कूलों-पुस्तकालयों को सबसे अधिक निशाना बनाया है. ज़्यादातर अभिलेख-पांडुलिपियों को बर्बाद करने के पीछे मंशा यही थी, कि नई पीढ़ी अपनी विरासत को विस्मृत कर दे. हमले के बाद कई ठिकानों पर इज़राइली डिफेन्स फ़ोर्स के सैनिक, लेखकों-कवियों के लेपटॉप, और दूसरे दस्तावेज़ों को खोजते दिखे थे. गाज़ा में 16 यूनिवर्सिटी कैम्पस हैं. इनमें से आधे तो बिलकुल धराशायी हैं।
गार्ज़ियन की रिपोर्ट है कि 7अक्टूबर, 2023 से अप्रैल 2024 तक गाज़ा हमले में 5469 छात्र, 261 शिक्षक, 95 यूनिवर्सिटी प्रोफेसर मारे जा चुके थे. एजुकेशन क्लस्टर का अनुमान है कि अप्रैल 2024 तक गाज़ा में सभी स्कूल भवनों में से 212 स्कूल (87.7 प्रतिशत) नष्ट हो चुके हैं। बचे 282 स्कूलों को मध्यम, मामूली क्षति हुई है। 7 अक्टूबर 2023 से पहले, 503,500 बच्चे पढ़ते थे, और 18,900 शिक्षक उन स्कूल भवनों में पढ़ाते थे, जिन पर अब सीधा हमला हुआ है. बावजूद इसके, साहित्य यदि फिलस्तीनियों के बीच ज़िंदा है, तो उन्हें सलाम करना बनता है।
“द मेकिंग ऑफ़ द मॉडर्न रिफ्यूजी” में पीटर गैट्रेल ने इसका ज़िक्र किया है, कि कैसे फिलिस्तीनी शरणार्थी अपने भूगोल और साहित्य से और भी मजबूती से चिपके रहते थे. फिलिस्तीनी संस्कृति में मानचित्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जहाँ अनगिनत साज-सामान, हार, टी-शर्ट, और इसी तरह की अन्य वस्तुओं पर फिलिस्तीन का मानचित्र दिखाया जाता है. यह ख़ुसूसन, निर्वासन में जी रहे फिलिस्तीनी लोगों के बीच लोकप्रिय है।
गाज़ा युद्ध से मिले सबक़ ने फिलिस्तीनी साहित्य को डिज़िटाइज़ेशन की तरफ तेज़ी से धकेला है. महमूद दरवेश ने फिलिस्तीन को “शब्दों के देश” के रूप में प्रस्तुत किया था. फिलिस्तीनी साहित्य को संरक्षित करने की प्रक्रिया में डीएच की दुनिया में बहुत कुछ है। डिजिटल तकनीक की मदद से, बड़ी संख्या में डेटा एकत्र, संसाधित, विश्लेषण, और विज़ुअलाइज़ किए जा सकते हैं। डिजिटल क्षेत्र की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए हाल के वर्षों में कई फिलिस्तीनी डिजिटल परियोजनाएँ प्रकाश में आई हैं। साइबर स्पेस में फिलस्तीनी साहित्य को जिस तरह से मज़बूत करने के प्रयास चल रहे हैं, उससे उनका रचना संसार अमर्त्य होने की तरफ़ अग्रसर है. क्या हमें भी उनसे कुछ सीखने की ज़रूरत है?
लेखक जाने-माने खोजी पत्रकार हैं उनसे संपर्क- 09971749139 के जरिए किया जा सकता है।


