
दिनेश पाठक-
पत्रकारिता में कॅरियर बनाने की सोच रहे हैं तो डिग्री के साथ ही भाषा पर पकड़ जरूरी है। यह बात अखबार, टीवी, डिजिटल, रेडियो और विज्ञापन, हर जगह लागू होगी।
नयी पीढ़ी होशियार है पर बहुत जल्दी में है। यह समझना जरूरी है कि हर चीज का समय तय है। वक्त के पहले कुछ नहीं होने वाला। मैंने 32 वर्ष पत्रकारिता को जिया है। आज भी जी रहा हूँ। बड़े अखबार में कई केंद्रों पर एडिटर रहा। टीवी, डिजिटल का अच्छा स्टूडेंट हूँ। जो कुछ समझ आया वह यही है कि पढ़ाई के दौरान ही खुद को इतना रगड़ दो कि किसी के सामने जाओ तो दाहिने-बाएँ न झाँकना पड़े।
विश्वास करिये उच्च पदों पर बैठे ज्यादातर लोगों को अच्छे युवाओं की तलाश है। पर, वे मददगार तभी होंगे जब आप को आधारभूत चीजों की समझ होगी। अन्यथा, बैठे-बैठे कोसते रहिये खुद को और पत्रकारिता को। आपकी कुढ़न को बढ़ाने वाले भी समाज में उपलब्ध हैं, जो मदद तो नहीं करते, हतोत्साहित जरूर करते देखे जाते हैं।
यहाँ अपनी लड़ाई आपको खुद लड़नी है। इस समय बाजार में डिजिटल का जोर है। कॉपी लिखना आता है। हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद कर लेते हैं। मोबाइल कैमरे पर कुछ बक-बक कर लेते हैं। उसे आसान से सॉफ्टवेयर से वीडियो एडिट कर सकते हैं। थोड़ी समझ सोशल मीडिया की है, SEO जानते हैं तो संभावनाएं और बढ़ जाती हैं। यह जानकारी सामान्य समझ से संभव है लेकिन आपको ऐसे लोग मिलेंगे जो कहेंगे कि एक ही आदमी से सारे काम करवाने लगे हैं संस्थान। पर, वे यह नहीं बताते कि इससे फायदा सबसे ज्यादा उसी युवा का है।
अगर रिसर्च में रुचि है और लंबी कॉपी लिख सकते हैं तो यह एक और खिड़की खोलता है।
किसी के कहे-सुने में न फँसे। पढ़ते रहें। अनुवाद करते रहें। नई चीजों को सीखते रहें। समय भले लगे लेकिन काम मिलेगा। अगर आप स्टूडेंट हैं तो भी और नये-नवेले हैं तो भी। मल्टी-टास्किंग का जमाना है। यह समझ हमें सुनिश्चित करनी होगी।
मीडिया के तीनों प्रारूपों की गहरी समझ रखने वाले दिनेश पाठक कई बड़े अखबारों में संपादक रहे हैं।


