विमल कुमार-
नई दिल्ली। प्रख्यात अंग्रेजी पत्रकार नीरजा चौधरी ने आज कहा कि जेपी के नेतृत्व में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने बोध गया में जो आंदोलन किया था वैसा आंदोलन मैंने अपने 50 साल की पत्रकारिता के करियर में नहीं देखा लेकिन अफसोस की बात है कि उस आंदोलन पर जो रिपोर्ट मैंने विश्व युवक केंद्र के लिए की थी वह आज तक नहीं छपी।
श्रीमती नीरजा चौधरी ने बोध गया आंदोलन के प्रखर एवम संघर्ष शील नेता प्रभात की उस आंदोलन पर 25 साल पहले छपी पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद का लोकार्पण करते हुए यह बात कही।

इस अवसर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशान्त सिटीजेन्स फ़ॉर डेमोक्रेसी के एन डी पंचोली जानी मानी पत्रकार मणिमाला भी मौजूद थीं जो खुद उस आंदोलन से गहरे स्तर पर जुड़ी हुई थीं। श्री प्रभात कुमार भी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े थे और इस आंदोलन में कई बार जेल भी गए। उन्होंने 25 साल पहले इस आंदोलन पर किताब लिखी थी। इस आंदोलन में दलित बड़ी संख्या में जुड़े थे जिनमें करींब 70 प्रतिशत महिलाएं थीं। इस आंदोलन का नतीजा हुआ कि एक हज़ार एकड़ जमीन पर ग़रीबों को अधिकार मिला। पहली बार इतनी महिलाओं के नाम जमीन मिली।
श्रीमती चौधरी ने विश्व युवक केंद्र की ओर से मिले प्रोजेक्ट का जिक्र करते हुए इस आंदोलन के लिए अपने पुराने दिनों के अनुभवों का स्मरण करते हुए कहा कि यह आंदोलन एक मिसाल है। इस आंदोलन से जुड़े लोग बहुत समर्पित थे जमीनी स्तर पर जुड़े थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी झोंक दी। पुलिस की लाठियां खाई जेल गए ।ऐसा आंदोलन मैंने नहीं देखा। वह मुसहर जाति के लोगों का आंदोलन थी। आज जीतन राम मांझी जैसे मुसहर लोग केंद्र में मंत्री बनेंगे कोई सोच नहीं सकता था। तब दलितों का राजनीति में उभार नहीं हुआ था।
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन का जितना असर पड़ना चाहिए था उतना नहीं पड़ा और गया में बोध गया में जब चुनाव हुए तो आंदोलन से जुड़े लोग हार क्यों गए यह बात मुझे समझ मे नहीं आयी।
उन्होंने कहा कि जब उन्होंने जब अपनी रिपोर्ट तैयार की तब इंदिरा गांधी की सत्ता में दोबारा वापसी हो चुकी थी।
उनके डर से उसे विश्व युवक केंद्र ने नहीं छापा। फिर वह कभी छपी ही नहीं। मैंने घर में उसे खोजा कोई कॉपी मेरे पास जरूर होगी अगर वह मिली तो उसे प्रकाशित करने का प्रयास करूंगी पर आज प्रभात जी की किताब का विमोचन करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है और यह मेरे लिए आज का दिन विशेष दिन है एक विशेष घटना है।

उन्होंने यह भी बताया कि उन दिनों जब उनक़ा विवाह हुआ तो उन्होंने शादी के रस्म में कन्यादान का विरोध किया था और बिना कन्यादान की शादी हुई। शायद यह सब उन दिनों के जेपी आंदोलन का असर था।
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता मणिमाला ने अपने पुराने दिनों की याद करते हुए कहा कि इस आंदोलन में 15-सोलह साथी जुड़े थे। कई ने तो प्राण भी त्याग दिए। हम लोग दलितों की झुग्गी में रहते थे, जहाँ सुअर भी थे। खाने को सत्तू मिलता था लेकिन मेरा पेट खराब हो जाता था जब बाहर से कोई आता था तो कुछ खाने को मिलता था। किशन पटनायक कुछ ब्रेड लाते थे। कुलदीप नैयर कुछ फल लेकर आते थे।
उन्होंने बताया कि किस तरह पुलिस ने उन्हें लाठियों से मारा जिसके कारण वे बेहोश भी हो गईं पर तब इलाज के पैसे भी नहीं थे। दलित मुसहर भी बहुत गरीब थे। उनके पास कुछ नहीं था। आज भी पीठ में उसकी दर्द उभरती है। लेकिन हमलोगों की रीढ़ की हड्डी नहीं झुकी।
उन्होंने कहा कि जेपी ने उन्हें कहा था कि अंतिम जन के साथ रहना है। इसलिए हम लोग उन मुशहारों के साथ रहे। उन्होंने बताया कि शान्ति पूर्ण संघर्ष की बात उन्हें रामबृक्ष बेनीपुरी की रोजा लक्समबर्ग की जीवनी पढ़कर समझ में आई।
उन्होंने कहा कि उस आंदोलन में ही हमने खेती बाड़ी करना सीखा। हम महिलाओं ने हल भी चलाये क्योंकि पहले महिलाओं को हल चलाने की अनुमति नहीं थी क्योंकि यह अप् शकुन माना जाता था। यह अंधविश्वास था कि महिलाओं के हल चलाने से अकाल पड़ता है।
बोध गया आन्दोलन से जुड़ी राधा धर्मकीर्ति ने अपने बचपन में उस आंदोलन के प्रभाव का जिक्र किया और जेपी ने उनके जीवन के द्वार खोले। उस आंदोलन ने मेरे व्यक्तिव और जीवन मे बदलाव तो आया ही कई महिलाओं का जीवन बदल गया।



