अभिनव सिंह-
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व अध्यक्ष व पूर्व महामंत्री और 90 के दशक के क्रांतिकारी छात्र नेता रहे इन्दु प्रकाश सिंह कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी से लड़ रहे हैं। इंदु प्रकाश सिंह उस छात्र राजनीति से आते हैं जिसने कभी अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया, ठेकेदारी और दलाली में ना पड़े, इसलिए वे आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं बन पाये। कैंसर जैसी ख़तरनाक और महँगी बीमारी ने उनकी हालत ख़राब कर दी है।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुछ लोगों को पता चला कि उनके नेता रहे इन्दु सिंह बीमार हैं और उनको मदद की ज़रूरत है, तो उन लोगों ने अपनी तरफ से मदद किया ही, आगे और लोगों को बताकर मदद दिलाई।
इसके बाद फिर फ़ेसबुक-व्हॉट्सएप्प ग्रुप पर इन्दु सिंह के सहयोग की ऐसी आँधी चली कि मात्र दस दिन में 50 लाख रुपये का इंतज़ाम हो गया।
सौ रुपये से लेकर पाँच लाख तक, लोगों ने दिल खोलकर मदद की। इस क्रम में सबसे बड़ी मदद पाँच लाख रुपये यूपी की पूर्व मंत्री स्वाति सिंह जी ने दी, जो कि पूर्व में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की MNIT की छात्रा भी रही हैं, और छात्र जीवन से इंदु सिंह से जुड़ी हुई हैं।


स्वाति सिंह “इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जुटान समूह लखनऊ” की सदस्य भी हैं। इस संगठन के माध्यम से स्वाति सिंह को पता चला कि इंदु प्रकाश सिंह को मदद की ज़रूरत है तो उन्होंने बिना सोचे विचारे तत्काल 5 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जुटान समूह लखनऊ के साथ हर क्षेत्र के लोग जुड़े हुए हैं। इस संगठन की नेक मुहिम से इंदु प्रकाश सिंह की न सिर्फ़ मदद हुई बल्कि उनके भीतर जिजीविषा मजबूत हो गई। वे लड़ाई में अब अकेले नहीं हैं बल्कि हज़ारों लोग किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं।
रितेश रजवाणा-
जिस दिन इस जंग का ऐलान हुआ और दुंदुभी बजने के साथ ही अपने अपने ख़ेमे से योद्धाओं ने बाज़ुएँ कसकर यादगार बोलना शुरू किया जीत तो उसी रोज़ सामने लहलहाने लगी थी।
इंदुप्रकाश सिंह सर ने जिस आत्मीयता और मनोभाव से समाज को जोड़ने और जातिवाद को तोड़ने का नारा दिया था उसी का प्रतिफल था कि देश के कोने-कोने में बैठे हज़ारों पूर्व, भूत पूर्व, और मौजूदा छात्र नौजवानों ने क्रांति की गिरहें खोल दी और एक मुहिम को आंदोलन बना दिया।
अभिनव सिंह भइया के प्रयास और छात्र संघर्षों से निकले तमाम बड़े लोगों की मदद के बाद हमारे जुटान परिवार से आदरणीय स्वाति सिंह जी ने इन्दु सर के इलाज में पाँच लाख रुपये कि मदद की है। यह अब तक की सबसे बड़ी मदद है।
सम्मानित धनंजय सिंह जी, राणा अजीत प्रताप सिंह जी, यशभद्र सिंह मोनू जी जैसे नेताओं समेत देश के तमाम ब्यूरोक्रेट्स, कर्मचारी जो अलग-अलग विश्वविद्यालय परिवार से होने के बावजूद भी उसी आग और उसी ऊर्जा से मुहिम में लगे जैसे उनके अपने घर की बात हो।
तमाम दल जाति विचार से ऊपर उठकर छात्र बंधुत्व को रोशन रखने वाले उन हज़ारों लोगों को तो आभार भी नहीं कहा जा सकता। क्यों कि ऐसी मिसालें शुक्रिया और आभार के खाँचे से कोसों बड़ी होती हैं।
हाँ आभार इस बात के लिए ज़रूर है कि इस मुहिम ने आने वाली नस्लों में भी छात्र एकता की लपक फूँक दी है.. और बता दिया है कि लड़ाई कैसी भी हो “हम एक हैं।”


