राम धनी द्विवेदी-
‘आइ सी यू में ताओ’ — पुस्तक का यह नाम चौंकाता है। आइ सी यू तो सबकी समझ में आ जाएगा लेकिन यह ‘ताओ’। वास्तव में यह चीनी दार्शनिक भाषा का शब्द है। ताओवाद चीन के प्रमुख दर्शन में एक है। ताओ का शाब्दिक अर्थ है- मार्ग, रास्ता।

दार्शनिक भाषा में इसे ब्रह्मांड का अंतर्निहित प्राकृतिक क्रम कहा जा सकता है जिसे परिभाषित करना कठिन है। रति सक्सेना ने अपनी कैंसर डायरी का यह नाम रखते हुए जो कुछ भी सोचा हो, यह उनके आइसीयू से सुरक्षित निकल आने की कथा है।
रति वैदिक साहित्य की अध्येता हैं तो उनकी पुस्तक का नाम अलग होना ही चाहिए। यही नहीं अपनी इस कैंसर डायरी में वह सिर्फ अपनी बीमारी का विवरण ही नहीं देतीं, वह जीवन, शरीर, पीड़ा, मुक्ति आदि की दार्शनिक व्याख्या भी करती हैं। कवि हैं तो बीच-बीच में कविताएं भी हैं, शरीर के दर्द से मुक्ति पाने की अभिलाषा में लिखी गई।
जीवन के उत्तरार्ध में इस तरह की पीड़ादायक बीमारी और उससे भी अधिक पीड़ादायक चिकित्सा से गुजरने का अनुभव सबसे कठिन होता है। और सबसे अधिक सब कुछ लगभग अकेले सहने और साथ में पति की भी चिकित्सा कराने और उनकी देख-रेख करने की जिम्मेवारी निभाना। रति जी ने जुलाई 2021 से अपनी बीमारी के पता चलने और मई 2023 तक उसके इलाज की पूरी प्रक्रिया को डायरी के रूप में लिखा है। यह नियमित नहीं है, बस जब- जब इलाज के लिए अस्पताल गईं या उन्हें कोई तकलीफ हुई, उस दर्द की अभिव्यक्ति इसमें है। इलाज में अंतर्मुखी और बीमार पति के अपेक्षित सहयोग न मिलने, केरल जैसे अनजाने प्रांत में जहां परिचित नहीं के बराबर हों, भाषा की समस्या हो, बेटियां बाहर रहती हों और सहायता के लिए सहायक रखने की जरूरत पड़े या मित्रों और अस्पताल में दूसरे मरीजों के परिजनों की मदद लेना पड़े,यह सब स्थितियां किसी बीमार को अलग तरह का शरीरिक और मानसिक कष्ट देती हैं।
देखा जाय तो किसी भी मरीज के कष्ट को उसके अलावा कोई अनुभव कर ही नहीं सकता। जैसा रति जी लिखती हैं कि डाक्टर भी कहते हैं कि उनके किसी भी मरीज ने इस तरह के पीड़ा की शिकायत नहीं की। वह कहते हैं- यू इमेजिन पेन। यह एक तरह से मरीज के दर्द को नकारना, उपहास करना है। अब मरीज इसका क्या जवाब दे। वह कवि हैं, संवेदनशील हैं, इसलिए हो सकता हो कि उन्हें पीड़ा की सहज अनुभूति अधिक होती हो,लेकिन यह इमेजिन करना तो नहीं है। दरअसल डाक्टर कभी अपने को मरीज से संवदेना के स्तर पर नहीं जोड़ पाते। वे व्यावहारिक होते हैं।
रति अपनी आखिरी दिन (मई 2023) की डायरी में लिखती हैं- ‘करीब दो बरस बीतने को हैं—-। दो बरस से क्या हो रहा है मेरे साथ। जो डाक्टर कहे, वही न। कीमो चढ़ना है, चढ़ा, रडियो थेरेपी होनी है, वह भी हुई, मेहन को छेदा गया, उसमें वह दवा डाली गई जो तपेदिक के मरीज के टीके में लगाई जाती है, संभवत: इसलिए कि वह इतना घायल हो जाए कि आगे कोशिकाओं को पैदा करना भूल जाए,लेकिन किसी ने क्या रुक कर सोच कर दवा दी। नहीं न।
दवा वे दी गईं जो दी जाती हैं, अधिकांश बिना समझे कि मेरी देह उसे लेना चाहती है कि नहीं। क्या मेडिकल देह की विविधता को नहीं समझता।
फिर दूसरे मरीज का उदाहरण देकर मेरी मानसिकता पर सवाल उठाना, मुझमें क्रोध भर रहा है लेकिन सुनने समझने वाला कौन है।‘
क्या कोई कैंसर विशेषज्ञ इन बातों को समझता है। क्या वह उनकी इस डायरी को पढ़ेगा और मरीज के मन को समझने का प्रयास करेगा।
इस पुस्तक के आखिरी पन्ने का लिखे एक साल से अधिक हो गया है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह स्वस्थ हों।
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित यह डायरी कैंसर मरीज के मन को समझने का मार्ग देती है। सौ पेज की पुस्तक का मूल्य 225 रुपये है। छपाई अच्छी है। दो एक जगह प्रूफ के दोष मिले।


