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सियासत

सत्ता का उँट किसी भी करवट बैठे, राजीव शुक्ला पीठ पर ही रहते हैं!

रंगनाथ सिंह-

गुरु पूर्णिमा से दो दिन पूर्व प्रेस क्लब में आपके साक्षात दर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ। दूर से देखकर मन ही मन प्रणाम किया। इस बात का अफसोस हुआ कि सही समय पर आप सदृश गुरु से गण्डा बंधवा लिया होता तो अपने कई मित्रों की तरह आज अवार्ड और रिवार्ड की गंगा-युमना में दिनरात डुबकी मार रहा होता।

सच कहें तो आपको चन्द कदम दूर से भावानात्मक प्रणाम करने का अवसर मिलना भी सौभाग्य की बात है। आपके दर्शन उपरांत मेरे एक पत्रकार मित्र ने उचित टिप्पणी की कि अम्बानी जी के घर की शादी, संसद के ऊपरी सदन में नारेबाजी, टी-20 विजेता टीम के साथ बस की सवारी से लेकर कवि नीरज की जयंती पर रायसीना रोड पर स्थित भारतीय प्रेस क्लब में जावेद अख्तर को सम्मानित करने के कार्यक्रम में सदेह उपस्थिति तक आप जैसी रेंज दुर्लभ है।

भारत देश में सत्ता परिवर्तन का आप पर इतना ही असर होता है कि कभी आप सत्ताधारी के सपूत होते हैं तो कभी दामाद हो जाते हैं। सत्ता का ऊँट किसी करवट बैठे, आप वहीं उसकी पीठ पर रहते हैं।

आपकी जीवनी लिखी जाए तो वह सामाजिक सफलता प्राप्त करने के लिए श्रीमद भगवद गीता बन जाएगी। आजाद भारत के सफल पत्रकारों का इतिहास लिखा जाएगा तो आप का नाम स्वार्णक्षरों में लिखा जाएगा।

गुरुदेव, मैं हतभाग्य न आपका अर्जुन बन सका, न एकलव्य फिर भी गुरु पूर्णिमा पर आपको सादर प्रणाम।

और हाँ, जिसे ऐसी किताबें देखकर लगता हो कि लिखने पढ़ने से कुछ होता है, उन्हें जान लेना चाहिए, लेखक बनने के लिए जिन्हें खुद किताब लिखनी पड़ी उनके लिए राजीव शुक्ला बनना बहुत मुश्किल होता है।

रिम्मी शर्मा- हम भी चौंक गए थे इनको क्लब में देखकर… भगवान के बाद यही आदमी हैं जो सर्वव्यापी हैं। जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे राजीव।

(गुरु पूर्णिमा के दिन लिखी गई ये पोस्ट भड़ास तक देर से पहुँची)

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