विवेक शुक्ला-
कल प्रभा खेतान फाउंडेशन की तरफ से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक कार्यकम में लेखिका नीलिमा डालमिया अधर से मुलाकात हुई तो बातचीत का रुख उनकी मां श्रीमती दिनेश नंदनी डालमिया की तरफ मुड़ना लाजिमी था। हम दोनों उनकी बातें करते रहे, उन्हें याद करते रहे। यह होना ही था क्योंकि श्रीमती दिनेश जी का मुझे पुत्रवत स्नेह और आशीर्वाद मिला। इस बात की तस्दीक नीलिमा जी ने भी प्यारे दोस्त और बेहतरीन फोटो जर्नलिस्ट कमलजीत सिंह के सामने की।

श्रीमती डालमिया गुजरे दौर के शिखर उद्योगपति राम कृष्ण डालमिया की पत्नी थीं। पर यह उनका अधूरा परिचय है। वो कहानियां, कविताएं और उपन्यास लिखती थीं। खूब पढ़ती थीं। उससे भी बढ़कर बात यह है कि वह अरबपति अद्योगपति की पत्नी होने के बाद भी वह बेहद मानवीय महिला थीं। उनकी मिडिल क्लास नैतिकताएं बची हुई थीं। वो अपने सिकंदरा रोड के बंगले के एक हिस्से में मेहनतकश परिवारों के बच्चों के लिए ट्यूशन की क्लासेज चलवाती थीं।
यह बात होगी 1989 की जब उनके सिकंदरा रोड वाले बंगले में आयोजित एक गोष्ठी में उनसे पहली बार परिचय हुआ। उस दिन वहां पर बहुत सारे मशहूर पत्रकार-साहित्यकार मौजूद थे। गोष्ठी के बाद स्वादिष्ट मारवाड़ी भोजन का लुत्फ लेकर हम सब निकले। फिर उनसे मिलना-जुलना लगातार रहा। मेरी शादी हुई तो उन्होंने मुझे एक दिन घर बुलाकर पूछा- विवेक, अब बहू आ गई है। क्या तेरे पास रहने को घर है? अगर नहीं है तो यहां ही आ जा। उनका इशारा अपने बंगले से था। मैंने उन्हें बताया कि मैं अपने पेरेन्ट्स के राजौरी गार्डन वाले घर में रहता हूं। इसलिए कोई दिक्कत नहीं है। यह सुनकर उन्हें सुकून हुआ। बताइये कौन इतनी फिक्र करता है किसी के लिए। फिर वो मेरे वेस्ट दिल्ली घर में भी आईं।
मैं तब नौकरी के साथ-साथ Sunday Observer (अंग्रेजी और हिन्दी) और TOI के शनिवार को आने वाले Saturday Times के लिए भी लिखता था। अगर मेरी याददाश्त मुझे धोखा नहीं दे रही है तो तब Delhi Times ने दस्तक नहीं दी थी। Saturday Times की एडिटर प्रभा चंद्रन थीं। कमाल की जर्नलिस्ट थीं वो। यह 1993 की बात होगी जब पाकिस्तान सरकार भारत से बार-बार मांग कर रही थी कि मुंबई का जिन्ना हाऊस उसे सौंपा जाए। उस खबर को मीडिया खास अहमियत दे रहा था।
मैंने तब दिल्ली के जिन्ना हाउस के इतिहास और वर्तमान पर Sunday Times और Saturday Times में लंबे लेख लिखे। जिन्ना अपना औरंगजेब रोड का बंगला राम कृष्ण डालमिया को बेचकर 7 अगस्त, 1947 को कराची चले गए थे। जाहिर है, मैंने उस डील के बारे में दिनेश जी से बात की। उन्होंने सारी कहानी सुनाई। उन्होंने 10 औरंगजेब रोड के बंगले की सेल डीड के ओरिजिनल पेपर भी दिखाए। वो तो जिन्ना से मिलीं भी थीं। उन दोनों स्टोरीज को बेहतरीन डिस्पले मिला था। प्रभा चंद्रन ने मेरी स्टोरी को लीड बनाया था। दोनों स्टोरीज को देख-पढ़कर दिनेश जी बहुत खुश थीं। उन्होंने मुझे एक-दो बार कहा भी था कि विवेक कभी मौका मिले तो सेठ जी पर लिखना। मैं भी सही वक्त का इंतजार कर रहा था।
दिनेश जी का 2007 में निधन हो गया था। उनसे अंतिम समय तक मिलना-जुलना रहा। हैरान होता था कि वो मुझे और बाकी तमाम लेखकों, पत्रकारों, कवियों, बच्चों को इतना प्रेम क्यों करती हैं।
हालांकि, पैसे वाले तो आदमी को आदमी नहीं समझते। वो तो अपने को खुदा से कम समझना छोड़ देते हैं। इस सवाल का जवाब एक बार नीलिमा जी ने ही बातों-बातों में दिया। उन्होंने बताया कि उनकी मम्मी नागपुर के एक प्रोफेसर की बेटी थीं। यह सुनकर मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया। समझ आ गया कि वो क्यों पढ़ने-लिखने की दुनिया से दूर नहीं हुईं और उनके मिडिल क्लास परिवारों के संस्कार अंत तक उनके साथ रहे।


