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यूपी संवाददाता समिति चुनाव- 3 साल बाद प्रत्याशियों के पास मठाधीशी के अलावा एजेंडा कोई नहीं है!

आशीष वशिष्ठ-

त्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति के चुनाव की इन दिनों लखनऊ में गहमागहमी है। दो साल की बजाय तीन या शायद साढ़े तीन साल बाद हो रहे इस चुनाव में करीब 900 मतदाता नयी समिति का चुनाव करेंगे। नयी समिति में 1 अध्यक्ष, 3 उपाध्यक्ष, 1 सचिव, 3 संयुक्त सचिव, 1 कोषाध्यक्ष और 12 कार्यकारिणी सदस्य निर्वाचित होंगे।

सभी प्रत्याशी अपने अपने तरीके से चुनाव प्रचार में लगे हैं। व्यक्तिगत सम्पर्क, फोन/मोबाइल सम्पर्क और सोशल मीडिया पर प्रचार हो रहा है। प्रत्याशियों में अधिकतर पुराने और चंद नये चेहरे अपनी किस्मत आजमा रहे है। लेकिन नये और पुराने प्रत्याशियों में एक बात ‘कॉमन’ है। और वो यह है कि किसी के पास कोई एजेंडा नहीं है। वैसे इस समिति का पूर्व इतिहास ही ऐसा रहा है कि प्रत्याशी बिना एजेण्डा के ही चुनाव मैदान में उतरते हैं। व्यक्तिगत संपर्क, जान पहचान, तय—तोड़ से गले में फूलों का हार पहनकर वो वोट देने वाले को भूल जाते हैं। जब वोट देने वाले को भूलना ही है तो फिर एजेंडा बनाने का क्या मतलब? वादे और संकल्प पत्र तो तब बनाये जाते हैं, जब उन्हें पूरा करना हो, जब पद प्राप्ति और व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्व करने के अलावा किसी के हित में कुछ करने का कोई इच्छा या भावना ही नहीं है तो फिर एजेंडा, संकल्प पत्र और वादे बेमानी हो ही जाते हैं?

निवर्तमान समिति हो या इससे पूर्व की समितियां​ किसी ने व्यापक हित में कोई ऐसा काम नहीं किया जिसे याद रखा जाए, या वो काम आपको एकदम याद आ जाए। हां, जीतने वालों में से अधिकांश ने निजी स्वार्थ साधने और संपर्क विस्तार में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ अपवाद भी हैं।

फील्ड में पसीना बहाने और लिखने—पढ़ने वाले पत्रकार अपने व्यक्तिगत संपर्कों और जान पहचान के ही भरोसे रहते हैं। स​मिति आड़े समय में किसी के काम आई हो तो वो स्वयं को भाग्यशाली समझे। पर अधिकांश को समिति के कार्यकलाप, रीति नीति से निराशा ही हाथ लगी है।

पिछले डेढ़ दशक में राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या बढ़ी है। नये पत्रकार साथियों के सामने आवास, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे तमाम मसले और मुद्दे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों के लिए भी पेंशन और सामाजिक सुरक्षा अहम मुद्दा है। लेकिन इन मुद्दों पर कोई बात नहीं होती।

बात युवा मीडियाकर्मियों की की जाए तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या आवास की है। ​दो दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है, लखनऊ में पत्रकारों के लिए कोई आवासीय योजना सरकार लेकर नहीं आई है। अखिलेश यादव की सरकार के दौरान वर्ष 2016 में ‘समाजवादी आवास योजना’ के तहत मान्यता प्राप्त पत्रकारों/मीडिया फोटोग्राफरों के लिये फ्लैट देने की योजना की घोषणा हुई थी। बाकायदा इस योजना के विज्ञापन समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए। उस योजना का हश्र भी समाजवादी सरकार के चुनाव नतीजों जैसा ही हुआ।

मीडिया​कर्मियों को सरकारी मकान किराये पर मिलने की सुविधा से अधिकतर पत्रकार वंचित ही हैं। नये मीडिया​कर्मियों के सामने आवासीय सुविधा जुटाना सबसे बड़ी समस्या है। किराये पर सरकारी मकान मान्यता के बावजूद हासिल करना रेत में से तेल निकालने जितना ही मुश्किल है। इस समस्या के समाधान के लिये कोई पत्रकार नेता, समिति का निर्वाचित पदाधिकारी और यूनियन के नेतागण ध्यान नहीं देते। किराये के मकान की नियमावली होने के बावजूद बिना जुगाड़ और जान पहचान के किराये पर मकान नहीं मिल सकता, ऐसे में जिन पत्रकार साथी जुगाड़बाजी में कमजोर हैं या जिनकी पहुंच ऊपर तक नहीं है वो बरसों बरस किराये के मकान के लिए एक से दूसरे दफ्तर के चक्कर काटते रहते हैं। जब दो—ढाई सौ मकान के आवेदन एकत्र हो जाते हैं तो तब जिम्मेदार चुप्पे से मीटिंग कर उस फाइल पर ”आवास देने का कोई औचित्य नहीं पाया गया” जैसी टिप्पणी कर उसे कूड़े के हवाले कर देते हैं। और तब समिति का कोई पदाधिकारी या नेता सरकार के फैसले पर चूं भी नहीं करता। किसी जरूरतमंद पत्रकार के साथ खड़ा नहीं होता।

वो अलग बात है कि तमाम बड़े पत्रकार सब्सिडी का मकान लेने के बाद भी किराये के सरकारी मकान में ठाठ से रहते हैं। और वहीं मठाधीश पत्रकार नये पत्रकार साथियों को नैतिकता की कहानियां सुनाते हैं। अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते हैं, कि उनकी एक खबर से सरकार, शासन और प्रशासन कांप जाया करता था। अफसर घुटने के बल आ जाते थे आदि आदि। इन बयानवीरों को इस बात की चिंता नहीं है कि उनके साथी किसी हाल में हैं। उसकी नौकरी कैसे चल रही है। वेतन समय पर मिल रहा है या नहीं। वो घर का खर्चा, मकान का किराया कैसे जुटा रहा है। अपवाद स्वरूप कई वरिष्ठ पत्रकार अपने साथियों के लिये फ्रिकमंद भी रहते हैं। चूंकि मान्यता से लेकर आवास आंवटन तक कोई साफ नीति नहीं है, ऐसे में वो ज्यादा मदद करने की हैसियत में नहीं होते।

मीडियाकर्मियों की समस्या को जब उनके प्रतिनिधि अपने फोरम से उठाते हैं तो सरकार और प्रशासन इस विषय में कुछ कदम आगे बढ़ने को तैयार होता है। लेकिन जब कोई मुद्दा उठाएगा ही नहीं, एजेंडा बनाएगा ही नहीं तो सरकार को क्या पड़ी है, आपकी समस्याएं हल करने की।

वर्तमान में उप्र राज्य मुख्यालय पर 895 मान्यता प्राप्त पत्रकार/फोटोग्राफरर/स्वतंत्र पत्रकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं। मान्यता सूची की क्रं.सं. 825 से 895 तक वरिष्ठ पत्रकारों के नाम अंकित हैं। वरिष्ठ पत्रकारों के लिये पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का कोई पुरसाहाल नहीं है। पिछले कई वर्षों पेंशन की बात हो रही है। शासन स्तर पर इस दिशा में काम आगे भी बढ़ा है, चूंकि निर्वाचित समिति के अधिकांश पदाधिकारियों को आम पत्रकारों की बजाय अपने कल्याण की ज्यादा चिंता है, इसलिए पेंशन का मुद्दा भी ठंडे बस्ते में है। समिति प्रभावी और सक्रिय होती तो शासन से लगातार बातचीत करती और वरिष्ठ पत्रकारों का पेंशन का लाभ मिल पाता। वर्तमान में देश के 15 से ज्यादा राज्यों में वरिष्ठ पत्रकारों को पेंशन का लाभ मिल रहा है। जबकि देश के सबसे बड़े राज्य उप्र में अभी पत्रकारों की पेंशन सरकारी पत्रों और फाइलों के बीच में झूल रही है।

कई प्रत्याशी और मतदाता ऐसे हैं, जिन्हें पत्रकारिता का ‘प’ भी पता नहीं है। पत्रकारिता और मान्यता तो उनके लिए अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने—बचाने और निजी हित साधने का जरिया मात्र है। सोशल स्टेटस का प्रतीक है। जब ऐसे प्रत्याशी चुनकर आते हैं तो उन्हें एक आम मीडिया​कर्मी की परेशानी और जरूरतों का पता ही नहीं होता। पता तो तब होता, जब वो खुद उस रास्ते से गुजरे होते। परेशानियां झेली होती। धूप, गर्मी, ठंड और बरसात सही होती। ऐसे में पत्रकारिता की ‘प’ न जानने वाले प्रतिनिधि आम मीडियाकर्मी की क्या भला कर पाएंगे या उनकी आवाज उठा पाएंगे, ये विचारणीय है। कहा भी गया है कि, “जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई!

फील्ड के पत्रकारों के लिए सुरक्षा हमेशा अहम मुद्दा रहा है। प्रदेश में पत्रकारों के साथ मारपीट की कई घटनाएं घट चुकी हैं। प्रदेश भर में कई पत्रकारों पर दुर्भावनावश और व्यक्तिगत खुन्नस में पुलिस—प्रशासन ने पिछले दो तीन सालों में कानूनी कार्रवाई की है। विधानभवन में पत्रकारों को बैठने और कैंटीन तक की सुविधा के लिए हाथ जोड़ने पड़ रहे हैं। इन तमाम मुद्दों पर मान्यता प्राप्त समिति की निष्क्रियता सार्वजनिक है।

मुद्दे और समस्याएं बहुत सी हैं। लेकिन आवास, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों को उठाना समिति का ही तो काम है। लेकिन जब समिति के चुनाव में शामिल किसी प्रत्याशी का कोई एजेण्डा ही नहीं है तो इस बात की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए कि विजयी प्रत्याशी आपका कुछ भला करेंगे या सोचेंगे। मैंने पहले भी लिखा है कि अपवाद हर स्थान पर हैं। लेकिन जब बात व्यापक हितों और कल्याण की हो तो चंद आवाजें और प्रयास ज्यादा असरदार नहीं रहते। हां, इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि कुछ ऊर्जावान और सकारात्मक विचार वाले प्रत्याशी जीतें तो शायद कुछ आम पत्रकारों का भला हो सके।

वैसे भी लोकतंत्र में चुनाव को पर्व और उत्सव की तरह मनाने की परंपरा है। आप भी इस उत्सव का आनंद लीजिए। अपने मनपसंद प्रत्याशी को वोट दीजिए। पसंद न हो तो भी वोट दीजिए, क्योंकि ‘नोटा’ का कोई प्रावधान यहां नही है। और नेता से उम्मीद करना नासमझी के अतिरिक्त कुछ और नहीं। अपने व्यक्तिगत संपर्क बनाये रखिये, इसी में लोकतंत्र और आपकी भलाई निहित है। बाकी तो सब खैर है……

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