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आज के अखबार : मेरे सातो अखबारों की लीड अलग है – पढ़िये, समझिये क्या सब ‘भयभीत’ हैं?

संजय कुमार सिंह

आज मेरे सातों अखबारों की लीड अलग हैं। खबरें इतनी विविधतापूर्ण हैं कि मेरे लिये भी इनकी प्राथमिकता तय करना मुश्किल है। उदाहरण के लिये, कोलकाता के आरजी कार अस्पताल में चिकित्सकों की हड़ताल अभी भी चल रही है। कार्यस्थल पर महिला की सुरक्षा के नाम पर शुरू यह हड़ताल चिकित्सकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए घिसट रही है और अपने मकसद पर टिकी मानी जाये तो भी मौके पर चौका जैसा मामला हो गया है। डबल इंजन की सरकारों के ऐसे विरोध की स्थिति में ट्रोल सेना मोर्चा संभाल लेती है और जनता की परेशानी को मुद्दा बना दिया जाता है। पर हत्या के 20 दिन बाद भी हड़ताल जारी है और मुझे याद नहीं आता है कि अच्छे दिन आने के बाद किसी को ऐसी लंबी हड़ताल की जरूरत या हिम्मत हुई। किसानों के आंदोलन को याद कीजिये तो लगता ही नहीं है कि संभव हो सकता है। पर पश्चिम बंगाल की बात अलग है। वहां तृणमूल कांग्रेस की सरकार है और केंद्र सरकार उसका विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। ऐसे में आज द टेलीग्राफ की लीड हड़ताल से मरीजों को हो रही परेशानी बताती है। शीर्षक है, धैर्य रखिये हम हड़ताल पर हैं

इंडियन एक्सप्रेस की लीड बताती है कि महान सरकार, महानतम कार्य कर रही है और अभी चुनाव के समय कर रही है तो पाठकों को बताना, याद दिलाना और प्रचार करना जरूरी है। शीर्षक है, “वास्तविक नियंत्रण रेखा पर वार्ता : “भारत चीन ‘मतभेद कम करने के लिये’ एक दूसरे से ‘सघन संपर्क’ के पक्ष में”। इंडियन एक्सप्रेस में आज उत्तर प्रदेश में पेड़ पर लटकी मिली दो लड़कियों का मामला चार कॉलम में है। इसके अनुसार पुलिस कह रही है कि यह आत्महत्या का मामला है जबकि परिवार वाले नहीं मान रहे हैं। कल यही खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर थी। आज की खबर के अनुसार इस मामले में गांव के दो युवकों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर है उसमें पोस्टमार्टम की चर्चा नहीं है। अंदर, परिवारवालों से सवाल है कि एफआईआर क्यों नहीं कराई। जवाब है, हम अंतिम क्रिया में व्यस्त थे, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कनफूजिया गये। मामला दलित लड़कियों का है, पोस्टमार्टम रिपोर्ट भ्रमित करने वाली है, आगे क्या होगा आप समझ सकते हैं। इसके मुकाबले कोलकाता मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मीडिया के रुख और आरोपों को याद कीजिये, जो बाद में गलत पाये गये

अमर उजाला में भी सरकारी प्रचार की खबर लीड है। देखना है सरकार की बैसाखी पर्टियों के नेताओं का इसपर कैसा रुख रहता है। आप जानते हैं कि सरकार में रहने और मलाई मिलने की उम्मीद में ऐसी पार्टी और सरकार का समर्थन तो किया जा सकता है लेकिन भाजपा की सरकार चुनाव जीतने के लिए अपनी ईडी और सीबीआई शाखाओं का उपयोग करे तो उसका असर समर्थन करने वाली पार्ट की राजनीति पर पड़ सकता है। इस प्रभाव से बचने के लिए बैसाखी पार्टियां जो करें वह खबर है। लेकिन इस तरह की खबरें कमजोर सरकर के समर्थन में नहीं है बल्कि इससे कमजोर सरकार का समर्थन करने की मजबूरी और मिल रही कीमत के साथ राजनीति भी उघाड़ होती रहेगी। समर्थन करने वालों को अपनी छवि और राजनीति दोनों की रक्षा करनी होगी जो मुश्किल होती जायेगी। अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, चुनाव से पहले हुड्डा मामले में ई़डी का शिकंजा दो कंपनियों की 834 करो़ड़ की संपत्तियां अटैच। मुझे लगता है कि यह कार्रवाई चुनाव से पहले और बाद में भी हो सकती थी। अभी होना सामान्य तो नहीं ही है।

नवोदय टाइम्स की लीड इन सबसे नई और अलग है। शीर्षक है, रिलायंस का जोर किफायती एआई पर। उपशीर्षक है, जियो ब्रेन के जरिये सुविधा पेश करने की तैयारी बोनस शेयर का तोहफा, 1:1 आवंटन का प्रस्ताव। इसके साथ शेयरों में तेजी का रुझान भी है। अखबार में आज सबसे नीचे विज्ञापन के साथ भी शेयर बाजार की खबर पांच कॉलम में है। शीर्षक है, “गोलगप्पे वाले आईपीओ से जरा हटके, जरा बच के”। सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच की तस्वीर के साथ ऐसी खबरों का मकसद उन्हें काम करते हुए दिखाना हो सकता है। आप जानते हैं हिन्डनबर्ग की हालिया रिपोर्ट के बाद यह चर्चा चल पड़ी थी कि श्रीमती बुच को वहां काम नहीं करने या सरकारी सेठ की सुरक्षा में बैठाया गया है। ऐसे में यह दिखाने-बताने का मतलब है कि सरकारी सेठ भले सुरक्षित हैं बाकी काम अच्छा हो रहा है। अनिल अंबानी के खिलाफ हाल की कार्रवाई को मैं कदुआ पर सितुहा चोख की तरह देखता हूं। पर वह अलग मामला है। फिलहाल, इस खबर के एक हाईलाइट के अनुसार, सेबी ने एसएमई के आईपीओ में निवेश को लेकर निवेशकों को आगाह किया। आप जानते हैं कि चुनाव परिणाम से पहले गलत सर्वेक्षण नतीजों के प्रसारण से निवेशकों को ठगने और लूटने का आरोप लगा था। उसपर कुछ हुआ नहीं और अब ‘जागते रहियो’ की यह चौकीदारी व्यवस्था के काम पर होने की सूचना भर है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में अधपन्ने की लीड भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसके अनुसार, विपक्ष  के साथ राजग के सहयोगी ने संसद के ओबीसी पैनल से जातिवार जनगणना पर चर्चा करने की मांग की है। जातिवार जनगणना विपक्ष की मांग है और राजग के सहयोगी भी इसकी मांग करें तो मतलब समझना मुश्किल नहीं है। फिर भी दूसरे अखबारों में यह खबर इतनी प्रमुखता से नहीं है तो मतलब समझ सकते है। पहले पन्ने पर लीड का शीर्षक है, सिर्फ आठ महीने में दिल्ली ने बारिश का अपना कोटा पूरा कर लिया। इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, असामान्य रूप से सक्रिय मानसून के सितंबर में पहले हफ्ते तक बने रहने की खबर है। आज हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड भी महत्वपूर्ण है। अगर किसी को समझ न आये तो शीर्षक समझाने वाला है, चुनावी राज्य जम्मू और कश्मीर में एक दिन में तीन टकराव। इसके साथ की खबर ऐसी है जैसे कश्मीर का बदला बस्तर के माओवादियों से निकला जा रहा हो। शीर्षक है, बस्तर में तीन माओवादी मारे गये।

टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक है, डीडीए ने कहा, यमुना की बाढ़ से प्रभावित होने वाला 75% क्षेत्र अतिक्रमित है। आज की कुछ दूसरी खबरें भी दूसरी खबरें भी टाइम्स ऑफ इंडिया में हैं और इनमें वो भी हैं जो दूसरे अखबारों में लीड हैं। जो खबर दूसरे अखबारों में लीड नहीं है पर टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है तो दोनों अमर उजला की खबरें हैं। इंडियन एक्सप्रेस की लीड जैसी खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में। अमर उजाला में सुप्रीम कोर्ट की जो खबर टॉप पर है वह यहां दो कॉलम में है। इसके अनुसार, के कविथा को जमानत मिलने पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है और टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी दी है। अमर उजाला में तीन कॉलम के विज्ञापन के साथ पांच कॉलम का बॉटम है। शीर्षक, देश में हर पांचवें दिन बना एक अरबपति से मैं समझ रहा था कि यह सरकार के सम्मान में लिख गई खबर है। पर साथ में एक खबर है, अभिनेता शाहरुख को पहली बार जगह। मैं नहीं मानता कि अरबपतियों की सूची में शाहरुख खान के होने में सरकार का कोई योगदान है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर है। शीर्षक बदला हुआ है और शायद मुंबई के लिए बना होगा लेकिन दिल्ली में है तो शीर्षक बता दूं, एशिया के अरबपतियों की राजधानी है मुंबई। इस तरह, टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज मुंबई और मनोरंजन की खबर दी है तो इंडियन एक्सप्रेस ने बहुत दिनों बाद उत्तराखंड के एक मंत्री को पहले जैसी अपनी पत्रकारिता से चित्त कर दिया है। कल छपी एक खबर का मंत्री जी ने खंडन किया तो अखबार ने सबूत छाप दिया। अब मंत्री जी जो कहें, मामला स्पष्ट हो गया है। अच्छे दिन में अव्वल तो ऐसी खबरें छपती नहीं, छप जायें तो चुप्पी साध लेने का अचूक इलाज है और उससे काम नहीं चले तो मन की बात की जाती रही है। पहले पन्ने पर ऐसी खबर बहुत दिनों बाद दिखी है। मैं जानना चाहता हूं कि शाहरुख खान के बेटे की गिरफ्तारी और फिर वसूली की कोशिश के आरोपों का क्या हुआ? ना खाउंगा, ना खाने दूंगा के मद्देनजर निचले स्तर पर ऐसा करने वाले को क्या इतने वर्षों में पकड़ा नहीं जाना चाहिये था और नहीं पकड़ा गया तो मतलब समझने में किसी को दिक्कत है? मीडिया क्यों डरता है और डरता है तो राष्ट्रपति की तरह बताता क्यों नहीं है कि भयभीत है?

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