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‘बुद्धचरित’ और अश्वघोष की कविताई

चंद्र भूषण-

योध्या और साकेत एक ही शहर के दो नाम हैं, मगर इतिहास की कुछ गुत्थियां इन दोनों नामों को यूं लपेटे हुए हैं कि आज भी इनके लिए अलग-अलग स्रोत टटोलने पड़ते हैं। अयोध्या को हम महाकवि वाल्मीकि के काव्य चरित्र राम से जोड़कर देखते आए हैं, जबकि साकेत एक बौद्ध नगरी थी, जिसके ब्यौरे खोजे जाने अभी बाकी हैं। इसका सबसे चर्चित व्यक्तित्व भी कोई राजा या कथा-चरित्र नहीं, इतिहास में दर्ज एक कवि है। कुषाणवंशी नरेशों कनिष्क और हुविष्क के राजकवि की भूमिका निभाने वाले महाकवि अश्वघोष (80 ई.-150 ई.)।

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने कहा है कि यह संसार चार सूर्यों से प्रकाशित है- नागार्जुन, आर्यदेव, अश्वघोष और कुमारलब्ध। चीन, जापान, कोरिया, विएतनाम आदि मुल्कों में ये सूर्य आज भी धूमिल नहीं पड़े हैं लेकिन हमारे यहां ये जड़ से भुला दिए गए हैं। और तो और, उनकी भाषा में भी उनकी कोई स्मृति नहीं है। किसी से कहें कि संस्कृत पांच सौ साल तक मुख्यतः बौद्धों की ही भाषा थी तो वह इसे कोरी गप्प बताता है। भारत की पालि बौद्ध कृतियां तो श्रीलंका में लगभग मूल रूप में मिल जाती हैं लेकिन यहां की संस्कृत बौद्ध कृतियां अब मूल में नहीं, चीनी-जापानी अनुवादों में ही सुरक्षित हैं।

अभी जिस संस्कृत ग्रंथ को यहां हल्का सा छुआ जा रहा है, उस को भी पूरा पढ़ना हो तो चीनी या तिब्बती जुबान सीखनी होगी। अश्वघोष और उनके जैसे न जाने कितने बौद्ध कवियों, चिंतकों, गीतकारों की कृतियां ही नहीं, उनका सर्वस्व भारत से कैसे लुप्त हो गया, हम नहीं जानते। हमें ऋणी होना चाहिए नेपाल का कि ‘बुद्धचरित’ के कुल 28 सर्गों में से आधे को (पहला और चौदहवां सर्ग बुरी तरह अधूरे और बीच के बारह विकृत लेकिन लगभग पूरे) उसने बचा लिया। इस ग्रंथ के पहले सर्ग के दो श्लोकों- 68वां और 79वां- पर नीचे हम थोड़ी चर्चा करेंगे।

इन श्लोकों के पीछे का किस्सा यह है कि कपिल मुनि की नगरी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के यहां एक अद्भुत पुत्र पैदा हुआ तो तमाम ज्ञानी-गुणी जन उसके दर्शन करने और उसे आशीर्वाद देने आए। अंत में वहां पहुंचे असित मुनि नाम के एक बहुत बूढ़े सज्जन की गोद में राजा ने अपने नवजात शिशु को रखा तो वे उसे देखकर रोने लगे। कारण पूछने पर कहा कि इसकी आयु लंबी होगी लेकिन ‘दुख मुझे इस बात का है कि मेरे जाने का समय आ गया, तब यह दुनिया में आया है।’

नास्यान्यथात्वं प्रति विक्रिया मे स्वां वंचनां तु प्रति विक्लवोsस्मि |
कालो हि मे यातुमयं च जातो जातिक्षयस्यासुलभस्य बोधा।।1.68।।

‘इसका कोई अनिष्ट जानकर मुझे विकार नहीं हुआ है। मैं तो अपनी वंचना के बारे में सोचकर विकल हो रहा हूं। जन्म-मरण के बोध को यह सुलभ बना देगा, लेकिन मेरी चला-चली की बेला इसके पहले ही आ गई है।’ आगे असित मुनि ने बच्चे के लिए भविष्यवाणी की कि बड़ा होने पर दुख का कारण खोजने के लिए यह राज छोड़कर वन में चला जाएगा। इसपर राजा का द्वंद्व इस रूप में जाहिर हुआ।

आर्षेण मार्गेण तु यास्यतीति चिन्ताविधेयं हृदयं चकार।
न खल्वसौ नाप्रियधर्मपक्ष: संताननाशात्तु भयं ददर्श।।1.79।।

‘ऋषियों के मार्ग पर चला जाएगा’, यह सुनकर राजा का हृदय चिंता में डूब गया। धर्म का पक्ष उन्हें प्रिय न रहा हो, ऐसा बिल्कुल नहीं था, लेकिन अपने वंश-नाश का भय उन्हें सामने दिखाई पड़ने लगा।

देश में कम ही लोग होंगे, जिन्हें राम, कृष्ण और बुद्ध के किस्से न पता हों। बल्कि दस या सौ में से कोई एक ऐसा भी होता है जो दो-एक बातें इन किस्सों में अपनी तरफ से भी जोड़ देता है। लेकिन महाकवियों की ताकत सिर्फ किस्सा बनाने में नहीं दिखाई देती। उनकी कहन में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो किस्सों को चेतन और अवचेतन के किसी अलग धरातल पर पहुंचा देते हैं। हममें से कुछ लोग वाल्मीकि और व्यास की इस विशिष्टता से वाकिफ हैं। उम्मीद करता हूं कि आगे बुद्धचरित में हम और गहरे घुसेंगे तो अश्वघोष के भी ऐसे ही जादू से हमारा परिचय होगा।

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