
संजय कुमार सिंह
आज के हिन्दी अखबारों में (पहले पन्ने पर) गोरक्षकों की करतूत पर कुछ नहीं है। हिन्दी अखबारों में मूल खबर ही पहले पन्ने पर नहीं थी। अब ऐसा फॉलोअप होता ही नहीं है जो पहले पन्ने पर लिया जाये। मुझे लगता है कि लिन्चिंग और गोरक्षकों की मनमानी के तमाम मामलों के बाद जब ‘गलती से’ आर्यन मिश्रा नाम के स्कूली छात्र की हत्या हो गई तो हमारा समाज जागेगा। बहुत पहले मैंने लिखा था कि सांप्रदायिक मामलों में हिन्दी अखबार हिन्दू हो जाते हैं। अब लग रहा है कि हिन्दी भाषी समाज हिन्दू ही है। जो भी हो, आयर्न मिश्रा हत्याकांड का फॉलोअप आज मेरे सात अखबारों में सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है। एक खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। गुरुग्राम डेटलाइन से लीना धनखड़ की बाईलाइन वाली इस खबर के अनुसार, 19 साल के छात्र की मौत के बाद पुलिस गोरक्षकों की सूची बना रही है। यहां बताया गया है कि विवरण पृष्ठ संख्या छह पर है। शीर्षक समेत 20 लाइन की यह खबर हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में आज, कल की खबर का फॉलो अप सेकेंड लीड है। कल मैंने लिखा था, “टाइम्स ऑफ इंडिया को छोड़कर सभी अंग्रेजी अखबारों में गोरक्षकों द्वारा स्कूली छात्र आयर्न मिश्र की हत्या की खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि कोलकाता के द टेलीग्राफ में भी पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है।” टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने पाठकों के लिए कल की कमी की भरपाई कर दी लेकिन हिन्दी अखबारों के लिए यह अभी भी मुद्दा नहीं है। संभवतः इसलिए कि हिन्दी समाज ऐसा नहीं है। वह मौके-बमौके हिन्दू हो जाता है के अलावा न्याय, बराबरी, स्त्री-पुरुष भेद आदि के मामलों में बहुत जागरूक और सक्रिय नहीं है। इसका पता कोलकाता के बलात्कार और हत्या मामले में वहां के समाज की प्रतिक्रिया से भी लगता है। आज भी द टेलीग्राफ के पहले पन्ने पर विज्ञापन के रूप में एक खुला पत्र छपा है। ऐसा हिन्दी समाज नहीं करता है। आप कह सकते हैं कि बहुसंख्यक है इसलिए नहीं करता है पर बंगाल का समाज कोलकाता के मामले के लिए ही कर रहा है जहां वह बहुसंख्यक है।

(पाठकों की सुविधा के लिए इसका संपादित मशीनी अनुवाद पेश है, एक खुला पत्र। हम पश्चिम बंगाल में अपने सहयोगियों के साथ एकजुटता में हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए जघन्य अपराध से हम स्तब्ध हैं। हम चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में लगे भ्रष्टाचार और जबरन वसूली के आरोपों से नाराज हैं। हम मांग करते हैं कि अपराधियों को तुरंत न्याय के घेरे में लाया जाए। हम सभी स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों के लिए एक सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करने के लिए त्वरित उपाय करने का अनुरोध करते हैं। दुनिया देख रही है। कोलकाता मेडिकल कॉलेज के दुनिया भर में फैले पूर्व छात्रों की ओर से।)
टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की खबर में यह आशंका जताई गई है कि गोरक्षकों द्वारा युवक को गोली मारने का यह मामला संदिग्ध झूठी सूचना का भी नतीजा हो सकता है। इस खबर की जानकारी मिलते ही मुझे एक पुराने मामले की याद आई जब एसएस राठी नाम के एक पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में इंजीनियर्स अपार्टमेंट, पटपड़गंज में रहने वाले प्रदीप गोयल और उनके साथी जगजीत सिंह का 31 मार्च 1997 को पटपडगंज से पीछा किया था और कनाट प्लेस में फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। तब तो अपराधी पुलिस वाले थे और इस अपराध के लिए उन्हें भी सजा हुई, जेल जाना पड़ा। तब गोरक्षकों को गोली मारने की हिम्मत (या बुद्धि) कहां से आई समझना मुश्किल नहीं है। पर यह तो पुरानी बात है। अभी भी उसकी चर्चा हो तो युवक गोरक्षक होने से पहले सोचेंगे। लेकिन बेरोजगारी के इस जमाने में जब सत्तारूढ़ पार्टी को इसका चुनावी लाभ मिलता हो तो वह क्यों यह सब करने जाये। काम तो यह अखबारों और मीडिया का है। और इनकी हालत ऐसी हो गई है कि समाज को जागरूक करने की कोशिश करे तो सत्तारूढ़ दल या सरकार इसे अपना विरोध मान लेगी और विज्ञापनों के लिए लार टपकाता मीडिया यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकता है। इक्का-दुक्का कोई व्यक्ति या संस्थान जनहित के ऐसे काम करे तो उसके मुकाबले के लिए सरकार समर्थक वैसे ही लोग तो हैं ही, 10 साल में कई संस्थान उग आये हैं, फल फूल रहे हैं, संरक्षण पा रहे हैं पर वह अलग मुद्दा है।
आर्यन के पिता सिया नंद मिश्रा ने कहा है और टाइम्स ऑफ इंडिया ने उसे प्रमुखता से जगह दी है कि गौ रक्षा के नाम पर उन्हें हत्या करने की इजाजत कौन देता है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सवाल पुराना है और समाज को ठीक करने की कोशिश में यह पहले ही पूछा जाना चाहिये था। सरकार अगर ऐसा नहीं चाहती है तो सरकार के मुखिया, सरकारी पार्टी के प्रमुख या किसी को भी ऐसी अपील शुरू में ही करनी चाहिये थी और बार-बार करनी चाहिये। आपने कभी कोई अपील सुनी या की? अगर नहीं तो इस अपराध में आप भी समान रूप से भागीदार है। राहत इंदौरी ने बहुत पहले कहा था, लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में / यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है। सच्चाई यह है कि सरकार समर्थकों को राहत इंदौरी ही पसंद नहीं थे। दूसरी ओर, बुलडोजर न्याय ऐसा ही मामला है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद लोगों की समझ ठीक नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने सीधे-सीधे प्रतिबंधित करने की बजाय उसके लिए नियम बनाने की बात की है। लेकिन नियम तो यह है कि सक्षम न्यायालय के आदेश के बिना सरकार को ऐसी कार्रवाई (या सजा देने) का अधिकार नहीं है।
आज द टेलीग्राफ का कोट इसी से संबंधित है। अखिलेश यादव ने कहा है, बुलडोजर का दिमाग नहीं होता है। इसमें स्टीयरिंग व्हील भर होता है। भाजपा सरकार अहंकार से भरी हुई है। इससे संबंधित खबर मुझे नवोदय टाइम्स में अंदर के पन्ने पर मिली। इसके अनुसार, अखिलेश यादव ने कहा था, 2027 में सपा सरकार आई तो सारे बुलडोजर गोरखपुर की तरफ जायेंगे (फ्लैग शीर्षक है)। दूसरी लाइन में मुख्य शीर्षक है, योगी बोले – बुलडोजर चलाने के लिए दिल और दिमाग दोनों चाहिये। कहने की जरूरत नहीं है कि (अभी तो) बुलडोजर मनुष्य ही चलाता है और उसे दिल-दिमाग दोनों होता है। इसके बावजूद ऐसे घर तोड़े गये हैं जिन्हें देखकर किसी को भी अफसोस होगा पर चलाने वाले ने ऐसा आदेश पालन में किया और यह उसकी नौकरी का भाग रहा होगा। योगी जी का दिल दिमाग वैसे ही है जैसे प्रधानमंत्री का यह कहना कि अकेला सब पर भारी। असल में वे अकेले हैं कहां। उनके साथ पूरी सरकार और सेना है। सत्तारूढ़ दल और उसके समर्थक हैं। पर नेता लोग ऐसे बोलते हैं जो अखबारों में छपता। वह नहीं जो आपको अपने अधिकारों (और कर्तव्य) के प्रति जागरूक करने के लिए जरूरी हैं। मित्र और वरिष्ठ, प्रदीप सिंह ने इसपर वीडियो बनाया है, (हालांकि मैंने अभी देखा नहीं है) गलतफहमी दूर कर लीजिये बाबा का बुलडोजर नहीं रुकेगा।
हिन्दी समाज की हालत और जरूरत जब ऐसी है तब आज अमर उजाला की लीड है, “चीन पर तंज : भारत विस्तारवाद का नहीं, विकास की नीति का समर्थक”। कल मैंने लिखा था, नरेन्द्र मोदी विदेश यात्रा पर अपने साथ पत्रकारों को नहीं ले जाते हैं। समर्थकों के अनुसार उन्हें इसकी जरूरत नहीं है फिर भी दिल्ली में उनके पक्ष में ऐसी खबरें छपती हैं। मुझे नहीं लगता अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इसका कोई मतलब है और कोई इसे पसंद करेगा। फिर भी यह लीड है तो हिन्दी के पाठकों में नरेन्द्र मोदी की ब्रांडिग के लिए। इसके लिए वे खुद को अकेला सब पर भारी बताते हैं। सीधे मामले में तो कह चुके हैं, ना कोई घुसा है ना घुसा हुआ है। जब प्रधानमंत्री नहीं थे तो कहते थे कि लाल आंखें दिखानी चाहिये अब दारुस्सलाम में चीन पर तंज कस रहे हैं और भारत में खबर लीड बन रही है।
यह खबर अमर उजाला तब लीड है जब राहुल गांधी ने कहा है और आज इंडियन एक्सप्रेस में लीड है, हम (कश्मीर के लिए) राज्य का दर्जा बहाल करेंगे, आपको यह गारंटी देता हूं। फ्लैग शीर्षक है, अनुच्छेद 370 पर शांत। आप जानते हैं कि कश्मीर में चुनाव है। भाजपा ने अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पांच साल चुनाव नहीं कराये। लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार ही नहीं खड़े किये और अब हालत इतनी पतली है कि उम्मीदवारों की सूची वापस लेनी पड़ी वह भी तब जब आधे में चुनाव लड़ना ही नहीं है। उसके लिए उम्मीदवार ही नहीं हैं। पर यह खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है, जो है वह बता चुका हूं। कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दी के तमाम अखबारों में इन दो का चुनाव मैंने इसलिए किया है कि ये अपेक्षाकृत बेहतर है। जो असली हिन्दू रंग में हैं उन्हें तो मैं देखता भी नहीं।
इस लिहाज से खबर यह भी है कि द टेलीग्राफ में आरजी कर अस्पताल मामले में जांच से संबंधित सुराग पाने की उम्मीद में कल मोमबत्तियां जलाई गईं और वही खबर लीड है, फोटो के साथ। घटना के लगभग एक महीने बाद। हिन्दी पट्टी में अगर निर्भया मामले में जनता की नाराजगी दिखी थी तो उसके कारण समझना अब मुश्किल नहीं है और सबको पता है। आप जानते हैं कि इस मामल में सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद पता चला कि सीबीआई इस मामले के साथ भ्रष्टाचार के आरोपों की भी जांच कर रही थी और आरजी कार अस्पताल के उस समय के प्रिंसिपल को गिरफ्तार कर लिया गया है। पर बलात्कार और हत्या के मामले में सीबीआई की जांच क्या कहती है यह लोगों को पता नहीं है। उम्मीद थी कि आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में सीबीआई संबंधित तथ्य रखेगी पर मुख्य न्यायाधीश के छुट्टी पर होने के कारण संभव है इसपर सुनवाई न हो। दूसरी ओर, आज खबर है कि पीड़िता के पिता ने कहा कि उनपर अंतिम संस्कार के लिए दबाव था। हिन्दी पट्टी में ऐसे मामलो मे अंतिम संस्कार कैसे हुए हैं वह किसी से छिपा नहीं है।
जहां तक मेरी बात है, इन खबरों और तथ्यों के चक्कर में सेबी और उसकी प्रमुख तथा आईसीआईसीआई बैंक के स्पष्टीकरण जैसे मामले को छोड़ना पड़ रहा है। जहां तक भ्रष्टाचार दूर करने के प्रधानमंत्री के दावे और घोषणाओं की बात है, मामला सिर्फ नोटबंदी और अदाणी का नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने डबल इंजन वाले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को बताया है कि राजा का कहा ही अंतिम हो, ऐसा समय नहीं है। इसी के साथ खबर है कि सुनवाई से पहले चहेते अधिकारी का स्थानांतरण कर दिया गया था। इंडियन एक्सप्रेस की ऐसी ज्यादातर खबरें पहले जनसत्ता में भी छपती थीं। अब कम छपती हैं। हालांकि, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह जनसत्ता में लीड का शीर्षक है। सरकार प्रचार की एक खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर है। मुझे लगता है कि एक जागरूक पाठक की नजर से यह खबर ही नहीं है लेकिन सरकार का प्रचार है तो पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, जनवरी से देश की किसी भी बैंक शाखा से निकालें पेंशन। उपशीर्षक है, ईपीएफओ के 78 लाख से अधिक पेंशनभोगियों को लाभ। आप जानते हैं कि पेंशन बैंक खाते में आती है, बैंक खाते को कहीं से भी ऑपरेट किया जा सकता है। ऐसे में क्या पेंशन धारियों के लिए यह नियम होना चाहिये कि वे अपने मूल खाते से ही पेंशन निकालें? ना तो यह उचित है और ना ही तकनीकी रूप से ऐसा करना आसान। उसमें यह सुविधा कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। वह भी तब जब आधे पेज का विज्ञापन है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह तकनीक का मामला है और सरकार ने सिर्फ तकनीक के उपयोग की मंजूरी दी है। खबर से लगता है कि केंद्रीयकृत पेंशन भुगतान प्रणाली को मंजूरी दी गई है और उससे यह भी संभव होगा और पहले से भी रहा होगा क्योंकि खाते में आने के बाद तो पैसे कहीं से भी निकाले जाते रहे हैं।



