मनोज अभिज्ञान-
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इस्तीफ़ा दे दिया है।

ब्रिटेन कभी इटली की राजनीतिक अस्थिरता पर चुटकुले बनाया करता था। आज स्थिति यह है कि महज़ 10 साल में ही में छठा प्रधानमंत्री विदा हो रहा है। चेहरे बदलने की गति इतनी तेज हो गई है कि समस्या का समाधान खोजने के बजाय व्यवस्था लगातार नए प्रबंधक नियुक्त करती दिखाई देती है।
यह उस व्यापक संकट का हिस्सा है जिसमें ब्रिटेन की लगभग सभी मुख्यधारा की पार्टियां फंस चुकी हैं। पिछले दस वर्षों में ब्रिटेन छह प्रधानमंत्रियों को बदल चुका है, लेकिन आम लोगों की मूल समस्याएं बनी हुई हैं। 2024 में भारी बहुमत से सत्ता में आने के बाद भी लेबर सरकार उन नीतियों से बहुत दूर नहीं जा सकी जिनकी आलोचना वह विपक्ष में रहते हुए करती थी। परिणाम यह हुआ कि जिन मतदाताओं ने बदलाव की उम्मीद की थी, उन्हें व्यवस्था का ही नया प्रबंधन दिखाई दिया। ब्रिटेन में हाल के स्थानीय चुनावों में लेबर को भारी नुकसान हुआ, जबकि वैकल्पिक दलों को बढ़त मिली।
1945 के बाद के ब्रिटेन में जब भी बड़े सामाजिक सुधार हुए, जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) का निर्माण या व्यापक सार्वजनिक कल्याण कार्यक्रम, तब सरकारों पर नीचे से बहुत मजबूत दबाव था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक दलों और आम लोगों के बीच की दूरी बढ़ी है। परिणाम यह है कि चुनावी घोषणापत्र बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन नीति का मूल ढांचा लगभग वैसा ही रहता है।
असल में कई देशों में मतदाता मुख्यधारा के दलों पर अपना भरोसा खो रहे हैं और ऐसे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं जो खुद को व्यवस्था के बाहर या पुराने राजनीतिक वर्ग के खिलाफ प्रस्तुत करते हैं। 2025 और 2026 के स्थानीय चुनावों में लेबर और कंज़र्वेटिव दोनों को भारी नुकसान हुआ, जबकि Reform UK, Green Party और Liberal Democrats जैसे दलों ने उल्लेखनीय बढ़त हासिल की। 2026 के स्थानीय चुनावों में Reform UK ने 1,400 से अधिक सीटें जीतीं और 14 काउंसिल पर नियंत्रण प्राप्त किया, जबकि ग्रीन पार्टी भी कई क्षेत्रों में मजबूत हुई।
पूरे यूरोप में यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। Alternative for Germany, National Rally, Brothers of Italy और अन्य दलों का उभार इस बात का संकेत है कि बड़ी संख्या में मतदाता पारंपरिक दलों से संतुष्ट नहीं हैं।
भारत में भी धीरे-धीरे वही प्रवृत्ति दिखाई दे रही है जो दुनिया के कई लोकतंत्रों में देखी जा रही है। कांग्रेस और भाजपा अभी भी राजनीति के केंद्र में हैं, लेकिन मतदाताओं का एक हिस्सा अब क्षेत्रीय दलों, नए राजनीतिक प्रयोगों और स्थानीय नेतृत्व की ओर भी देखने लगा है। दिलचस्प यह है कि भारत में छोटे दलों का उभार जातीय, क्षेत्रीय, भाषाई या स्थानीय असंतोष के आधार पर हुआ है। इसलिए चुनौती केवल यह नहीं है कि लोग बड़े दलों से दूर जा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि क्या नए विकल्प सत्ता में आने के बाद वास्तव में नीतियों की दिशा बदलेंगे, या फिर वे भी उसी व्यवस्था के नए प्रबंधक बनकर रह जाएंगे।
विडंबना तो यह है कि जो दल खुद को व्यवस्था विरोधी बताते हैं, वे भी जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उन्हें धन, मीडिया, चुनावी मशीनरी और प्रभावशाली दानदाताओं पर निर्भर होना पड़ता है। उदाहरण के लिए Reform UK के पास हाल के वर्षों में करोड़ों पाउंड का चंदा आया और वह अब पेशेवर चुनावी सिस्टम की तरह काम कर रहा है। तो जब समस्या सिस्टम में है तो क्यों न इस सिस्टम को ही बदलने पर विचार हो? कम से कम चुनाव प्रणाली में तो बदलाव किया ही जा सकता है।
अभी कुछ लोग आएंगे और बड़ी गंभीरता से बताएंगे कि कोई भी व्यवस्था तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसे लागू करने वाले लोग ईमानदार न हों। यह तर्क सुनने में जितना समझदार लगता है, उतना ही खतरनाक भी है। क्योंकि इसका सीधा मतलब यह हुआ कि समस्या कभी व्यवस्था में नहीं होती, हमेशा इंसानों में होती है। फिर सवाल है कि यदि पूरी व्यवस्था कुछ असाधारण ईमानदार लोगों के भरोसे ही चल सकती है, तो ऐसी व्यवस्था की उपयोगिता क्या है?
एक अच्छी व्यवस्था की पहचान यह नहीं कि उसमें संत बैठे हों, बल्कि यह है कि वह साधारण लोगों की कमजोरियों, स्वार्थों और गलतियों के बावजूद काम करे। लोकतंत्र, संविधान, न्यायपालिका, लेखा-परीक्षण और जवाबदेही की संस्थाएँ इसी सोच से बनाई जाती हैं कि इंसान देवता नहीं होते। जो लोग हर विफलता का दोष केवल व्यक्तियों की ईमानदारी पर डाल देते हैं, वे अक्सर व्यवस्था की खामियों पर चर्चा से बच रहे होते हैं। आखिर अगर हर बार हमें केवल अच्छे राजा, अच्छे नेता, अच्छे अफसर और अच्छे पूंजीपति का इंतजार ही करना है, तो फिर संस्थाओं और व्यवस्थाओं की जरूरत ही क्या है?


