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सियासत

जब मैं पीएमओ बीट पर रिपोर्टिंग करता था…

Indian leader in white kurta and orange scarf raises a gilded ceremonial staff during a celebration with orange flowers in the background.

प्रशांत टंडन-

एक पत्रकार के तौर पर कई प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में पीएमओ बीट पर रिपोर्टिंग की है. पिछले प्रधानमंत्रियों के सामान्य दिनों की दिनचर्या की जानकारी है.

रिपोर्टिंग के दिनों में रोज़ सुबह 8 से 9 के बीच में पीएमओ और पीएम के मीडिया सलाहकार से बात होती थी. प्रधानमंत्रियों की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा ऑफिस में मीटिंग्स, फाइलें पढ़ना – निबटना, अधिकारियों से ब्रीफिंग लेना रहता था. दो काम हर प्रधानमंत्री दिन में कम से कम दो बार रोज़ करता था आर्थिक स्थिति पर नज़र और राष्ट्रीय सुरक्षा की मॉनिटरिंग.

ये दो काम हर प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उतना रुटीन हुआ करता था जितना आप सुबह उठ कर चाय पीते हैं या अखबार पढ़ते हैं.

बाकी काम इसके अलावा होते थे. कई बार सुनने में आता कि पीएम संसद के किसी सवाल पर एक घंटे से अधिकारियों के साथ बैठे हैं.

NSA और इंटेलिजेंस ब्रीफिंग दिन में दो बार (सुबह – शाम) रूटीन लेवल पर होती थी, कुछ विशेष दिनों में जायदा बार भी.

सुबह 8 बजे से रात के 9 बजे तक इतनी व्यस्त दिनचर्या होती कि हम लोगों को लगता था प्रधानमंत्री का काम आसान नहीं है.

मुझे नहीं लगता कि मोदी पीएम ऑफिस में एक घंटा भी बिताते हैं.


विष्णु नागर-
कुछ करना आता हो, देश की चिंता हो, पद की गरिमा का ख्याल हो तो आफिस में समय बिताएं! सारा समय तो आत्मप्रचार में बीतता है।

श्याम सिंह रावत-
इस आदमी का दिमाग हर वक्त अपनी छवि चमकाने की चिंता, योजना बनाने और उसे कार्यान्वित करने में व्यस्त रहता है। तभी तो बिला नागा प्रतिदिन कुछ न कुछ नई खुराफात सामने आती रहती है।

Iska ek hi kaam he andh bhakto ko naya naya sasta nashaa dena naya jhuth nayi makkari nayi sazish..
Behad shatir manorogi he yeh. -अमित कुमार

विष्णु राजगडिया-
इसमें मन की बकवास वाला शिड्यूल नहीं दिख रहा। हर दिन थोड़ा वक्त इस पर भी लगता होगा। कुछ मेलोडी टाइप हाहा-हिहि के लिए भी टाइम रखना होगा।

सुभाष ख़ुडानिया-
होता अब भी वही है बस वैन्यू बदले हैं प्राथमिकता नहीं। राष्ट्रीय सुरक्षा का तो मसला ही ख़त्म है टोटल कंट्रोल में है। जब चाहें ख़तरा आ जाता है और काम पूरा होते ही पतली गली पकड़ लेता है। जिनसे युद्ध हुआ करता उनसे अद्भुत संधि की हुई है लेन देन (मुगलिया सिस्टम), अर्थ व्यवस्था बेहद मज़बूत और संतोष जनक हैं शाहखर्ची के बावजूद लबालब भरे हैं ख़ज़ाने और संसाधन अनंत हैं। कर्ज़ का ऑप्शन तो खुला ही है आख़िरी स्टेज़। हमें लगता है कुछ बदला है तो वो सिर्फ़ इतना कि जो दायरा हुआ करता वो अब लिमिटेड हो गया है राजदरबार तक सीमित।

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