लखनऊ/अयोध्या। अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावा गबन कांड में जांच की दिशा को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। हिंदी दैनिक अमर उजाला ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि इस मामले में असली जिम्मेदारों को बचाने और निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई का ठीकरा फोड़ने की तैयारी की जा रही है। अखबार की रिपोर्ट ने पूरे प्रकरण को नया राजनीतिक और प्रशासनिक आयाम दे दिया है।
अमर उजाला ने अपनी रिपोर्ट में सवाल उठाया है कि आखिर जिन ट्रस्ट पदाधिकारियों के पास दानपात्रों की निगरानी और पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी थी, उनसे अब तक सख्ती से पूछताछ क्यों नहीं हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, जांच का फोकस फिलहाल कर्मचारियों तक सीमित नजर आ रहा है, जबकि वास्तविक जवाबदेही तय किए बिना मामले की तह तक पहुंचना मुश्किल होगा।
कर्मचारियों पर कार्रवाई, बड़े नामों पर खामोशी?
रिपोर्ट में कहा गया है कि जांच एजेंसियां अब तक जिन तथ्यों तक पहुंची हैं, उनसे यह संकेत मिलता है कि दानपात्रों से रकम निकालने का काम लंबे समय से सुनियोजित तरीके से चल रहा था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि करोड़ों रुपये के चढ़ावे की निगरानी की जिम्मेदारी संभाल रहे वरिष्ठ पदाधिकारियों को इसकी भनक कैसे नहीं लगी।
अखबार ने यह भी लिखा है कि यदि कुछ कर्मचारियों ने अपने स्तर पर इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता को अंजाम दिया, तो फिर निगरानी तंत्र की विफलता की जवाबदेही किसकी तय होगी।
“1250 श्रीराम शिलाओं” का मुद्दा भी फिर चर्चा में
अमर उजाला की रिपोर्ट में राम मंदिर आंदोलन के दौरान देश-विदेश से आई करीब 1250 श्रीराम शिलाओं का मुद्दा भी उठाया गया है। दावा किया गया है कि इनमें सोने-चांदी और बहुमूल्य धातुओं से जुड़ी शिलाएं भी शामिल थीं, जिनका स्पष्ट हिसाब सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। हालांकि इन दावों पर संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने आनी बाकी है।
संतों ने भी उठाए सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कुछ संतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी जांच के दायरे को व्यापक बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच करनी है तो केवल कर्मचारियों को आरोपी बनाकर मामले को बंद नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन लोगों की भूमिका भी जांची जानी चाहिए जो व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे थे।
जांच की दिशा पर उठे सवाल
राम मंदिर निर्माण से जुड़े इस कथित गबन प्रकरण में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रहेगी या फिर जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला की पड़ताल होगी। अमर उजाला की रिपोर्ट ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि आखिर “राम की दौलत” की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी और जवाबदेही किससे तय की जाएगी।
फिलहाल, विशेष जांच दल (SIT) मामले की जांच में जुटा है। ट्रस्ट की ओर से समय-समय पर यह कहा गया है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं, अमर उजाला की इस रिपोर्ट के बाद यह मांग और तेज हो गई है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावशाली लोगों के दायरे तक भी पहुंचे।

अमर उजाला ने एकदम सही लिखा है। राम मंदिर मामले में खेल ही यही है।
असल जिम्मेदारों को बचाया जाएगा। और छोटी मछलियों पर ठीकरा फोड़ा जाएगा।
पहली बार कैमरे पर आए टिन्नू यादव ने कल टॉप सीक्रेट के इंटरव्यू में साफ कह दिया कि कैश तो अनिल मिश्रा हैंडल करते थे।
उनकी एसआईटी जांच करे। मगर सवाल है कि मिश्रा जी कहां हैं? केरल में या फिर कलकत्ता में?
वे खुद से गए हैं या उन्हें बड़ी समझदारी के साथ मौके से गायब कर दिया गया है?
एसआईटी उनकी जांच करेगी या फिर वे खुद एसआईटी की प्रगति का कैरेक्टर सर्टिफिकेट जारी करेंगे?
राम के नाम पर हुए पाप को छिपाने का आखिर कितना महापाप होगा?
राम के कथित उपासक क्या अपनी अपनी खाल बचाने के लिए चेहरों की प्लास्टिक सर्जरी करा लेंगे? मगरमच्छ जेलर बनेंगे? मछलियों को जेल भिजवा देंगे?
-अभिषेक उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार


