तेजपाल के खिलाफ डबल इंजन वाली गोवा सरकार की यह सक्रियता पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए है या बंगारू लक्ष्मण की पोल खोलने वाले स्टिंग के लिए। वैसे भी, न्यूज क्लिक और दूसरे मामलों से साबित हो चुका है कि सरकार अपना हिसाब बराबर कर रही है क्या सॉलिसीटर जनरल को यह बात समझ में नहीं आ रही होगी या उन्हें सरकार को इस बाबत सलाह नहीं देनी चाहिए। वे जनता के पैसे से वेतन भत्ते लेकर किसके लिए काम कर रहे हैं?
संजय कुमार सिंह
राम मंदिर विवाद ने भारतीय जनता पार्टी को मुश्किल में फंसा दिया है। आज यह खबर दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की है। कोने में नीचे की तरफ। नवोदय टाइम्स में पांच कॉलम से ज्यादा का बॉटम है, राम मंदिर से चढ़ावा चोरी को साठगांठ कहना जल्दबाजी : नृपेंद्र मिश्र। वैसे तो चंदा चोरी की खबर पुरानी है। भाजपा नेताओं के खिलाफ लगे तमाम आरोपों की तरह है। इसमें भी कार्रवाई टलती रही है। इस बार अखिलेश यादव ने लगाया तो उनकी बेटी को बदनाम कर उन्हें परेशान करने की कोशिश हुई। हालांकि, यूपी चुनाव करीब है इसलिए यह मामला तूल पकड़ गया है। होना-जाना कुछ नहीं है। वोट चोरी, चुनाव चोरी और सीट चोरी के बाद अब सांसद खरीदी चल रही है। ऐसे में चंदा चोरी का मामला उठाने की सजा यह भी हो सकती है कि समाजवादी पार्टी में भी तोड़फोड़ की खबर है। दि एशियन एज में यह दो कॉलम में छपी है। द टेलीग्राफ के अनुसार, शिवसेना (यूबीटी) ने अपने नौ में से छह सांसदों को गद्दार कहा है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के साथ जो होता रहा है वह भी नरेन्द्र मोदी के लाए अच्छे दिनों का सच है। इसे भाजपा की पूर्व सहयोगी ममता बनर्जी के साथ उनके पूर्व सहयोगी शुवेन्दू अधिकारी के जरिए अमली जामा पहनाया गया। अब एक नामालूम सी पार्टी को 20 सांसदों का उपहार देने की कोशिश चल रही है जो इन सांसदों की ओर से, ईडी-सीबीआई के डर से सुरक्षित गोद तलाशने की कोशिश भी हो सकती है। ऐसे में आज अमर उजाला और देशबन्धु की लीड तथा सेकेंड लीड एक ही खबर है। लीड स्पीकर से मिले उद्धव के बागी सांसद और शिवसेना शिंदे में विलय का पत्र सौंपा – जैसी खबरें हैं। दोनों की सेकेंड लीड राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवार की जीत है। अमर उजाला ने लिखा है विपक्षी एकता की फिर खुली पोल, क्रॉस वोटिंग से हारी कांग्रेस। देशबन्धु का शीर्षक है, झारखंड में कांग्रेस को झटका, प्रणव झा हारे। मुझे लगता है कि यह झटका कांग्रेस को नहीं देश और लोकतंत्र को है। कांग्रेस, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे हैं कि संघ परिवार और भाजपा की मनमानी का विरोध हो रहा है वरना देश तो ताली-थाली बजा ही चुका है। दुनिया भर में बजवाए ही जा रहे हैं। अखबार नहीं बताते हैं कि उसमें क्या खर्च हो रहा है या उससे किसे क्या लाभ हो रहा है। हालांकि, यह सब अलग मुद्दा है।
अंग्रेजी अखबारों में द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट से कहा कि टेलीग्राम ‘नए डार्क वेब’ में बदल गया है। सरकार का कहना है कि इस ऐप का इस्तेमाल साइबर अपराधी और परीक्षा के पेपर लीक करने वाले करते हैं; टेलीग्राम की चुनौती पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूरे प्लेटफॉर्म पर बैन लगाने पर सवाल उठाए। यह दिलचस्प है कि सरकार ने इसे भारत में काम करने की अनुमति दी है और उसे पता ही नहीं चला कि इसका इस्तेमाल साइबर अपराधी करते हैं। दूसरी ओर, चीन से कुट्टी हुई तो टिक-टॉक औक कैम स्कैनर जैसे ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया गया। साइबर अपराधों की जांच के दौरान टेलीग्राम के दुरुपयोग का पता चला या नहीं, मैं नहीं जानता हूं पर आज खबर यह होनी चाहिए थी कि सरकार के इस आरोप के बावजूद टेलीग्राम अभी तक चल क्यों और कैसे रहा था। अब ऐसी खबरें नहीं होती हैं। इसलिए नहीं है और सरकार बचाव में जो कहे वही खबर है, सवाल करने वाले सर्वोच्च स्तर पर कॉक्रोच कहे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री की डिग्री असली हो या नकली यह नागरिकों की चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए और अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों की चिन्ता का विषय है या हो तो वे रिटायरमेंट के बाद के जुगाड़ में लगे हों, यह भी हमारी-आपकी चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए। मीडिया की चिन्ता का विषय जरूर होना चाहिए था पर होता को न्यूजक्लिक के प्रबीर पुरकायस्थ को क्यों फंसाया जाता और पोल खुलने पर भी कार्रवाई क्यों नहीं होती? तहलका के तरुण तेजपाल का मामला भी कुछ ऐसा ही है। उन्होंने भाजपा से संबंधित खुलासे किए तो फंस गए (या फंसा दिए गए) और कोर्ट से बरी हो गए तो सरकार अपील करने जा रही है। उसकी खबर अलग है। उसकी चर्चा अलग से होनी चाहिए। मैं नहीं जानता तेजपाल के खिलाफ मामला कितना सही है लेकिन मैं यह जानता हूं कि उन्होंने भाजपा के खिलाफ खबरें कीं और करवाई हैं। इसलिए सरकार को इसमें पार्टी नहीं होना चाहिए। पीड़िता मदद मांग रही हो तो बात अलग है। पर ऐसी कितनी पीड़िताओं की मदद सरकार ने की है वह भी देखना होगा। सरकार निचली अदालतों के किन फैसलों के खिलाफ ऊंची अदालत में गई है और वहां क्या हुआ या सिर्फ स्टे से काम चल गया – भी खबर हो सकती है लेकिन कौन ऐसी खबरें करके ईडी को निमंत्रण दे?
राज्यसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का पर्चा जैसे खारिज हुआ और उसके बाद जो सब हुआ उसमें भाजपा समर्थित उम्मीदवार का जीत जाना और उसके बाद अब क्रॉस वोटिंग महत्वपूर्ण नहीं है। कई लोगों ने पहले ही एलान कर दिया था। यह वैसे ही है कि 2024 चुनाव के बाद तेलुगू देशम के चंद्रबाबू नायडू और नीतिश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को समर्थन देने के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष के लिए ओम बिरला का समर्थन नहीं किया होता तो आज कहानी दूसरी हो सकती थी लेकिन जो हो रहा है वह अंध समर्थन के कारण ही है। मुझे नहीं पता यह सब कंप्रोमाइज्ड होने के कारण है, स्वार्थ में है या हिन्दुत्व के भले के लिए है। पत्रकारिता हो रही होती तो इसकी जांच होती, इसकी जानकारी होती। या आरटीआई से जानकारी नहीं मिलती तो उसकी खबर होती। अब तो खबर थी कि आरटीआई में सक्रियता को नया व्यवसाय मान लिया गया है। सवाल करने वाले को फंसा दिया गया तो सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से मना कर दिया। इस तरह विकास तो हुआ है। प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर पत्रकारों को नहीं ले जाते हैं क्योंकि उन्हें जरूरत दुभाषियों की होती है। इन और ऐसी खबरों के बीच सरकार के प्रचार में नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, शुक्रिया यूएस-ईरान! होर्मुज खुला। यहां यह खबर नहीं है कि इसके लिए बढ़ाई गई पेट्रोल की कीमत कम होगी कि नहीं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत कम होने पर भारत में कीमतें कम क्यों नहीं होती हैं। यहां सरकार के अनैतिक खेलों का प्रचार और इस बहाने उसकी प्रशंसा तो हो ही रही है विपक्ष ऐसा नहीं करता है तो उसकी ‘गलतियां’ बयान करने वालों की कमी नहीं है।
जब 20 सांसदों का गिरोह सरकार से डर सकता है तो उसकी आलोचना कौन करेगा और प्रशंसा का क्या मतलब – फिर भी सब चल रहा है। ट्रम्प ने ईरान के साथ करार पर दस्तखत कर लिए – आज इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड है। इस समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए सोशल मीडिया पर पाकिस्तान की तारीफ की जा रही है। भारत की यह स्थिति है कि अमेरिका तो मित्र था ही, ईरान से भी दोस्ती थी। फिर भी दोनों लड़े, लड़ते रहे, हमारा नुकसान हुआ, गैस, तेल की दिक्कत हुई, कीमतें बढ़ानी पड़ी, तीन नाविकों की जान गई और हम समझौता भी नहीं करा पाए। सवाल पूछना तो बहुत दूर। इसके लिए भारत और भारत की विदेश नीति की आलोचना हो रही है। मुझे लगता है कि युद्ध अमेरिका ने शुरू किया था, पंगा ट्रम्प ने लिया और ईरान ने हार नहीं मानी। उन्हें समझौते की मेज पर आना पड़ा, भले होर्मुज डलडमरूमध्य में दाल नहीं गलने के कारण – यही खबर है और करार अमेरिका की हार है पर अब खबरें ऐसे नहीं लिखी जातीं हैं. जैसे लिखी जानी चाहिए या जाती थीं उसका जिक्र मैंने कल द टेलीग्राफ की खबर के जरिए किया था। आज दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, “हमारे लिए एआई ‘ऑल इनक्लूसिव’ है : प्रधानमंत्री ने भारत को टेक हब कहा”। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री के कहने से भारत टेक हब नहीं हो जाएगा और असल में हो भी तो एआई को पहले आई कहना और अब ऑल इनक्लूसिव कहना भारत के टेक हब होने की सच्चाई नहीं बता रहा है? खासकर तब जब 17-19 साल के बच्चों ने एनटीए और सीबीएसई के वेबसाइट का हाल सार्वजनिक कर दिया है। परीक्षा में चोरी रोकने के लिए सेना लगानी पड़ती है और परीक्षा के बाद साइट को दुरुस्त करने के लिए आईआईटी की सेवा लेनी पड़ती है फिर भी प्रधानमंत्री अगर कोई दावा कर रहे हैं तो उनके दावे की अहमित लीड लायक है – यह भी खबर है और वही हो रहा है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


