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उत्तर प्रदेश

राम मंदिर डकैती: न भाजपा नेताओं की भावना आहत हो रही, न ही न्यूज चैनलों को सनातन का अपमान दिख रहा!

Huge crowd gathered at a temple complex during a festival, with orange flags, colorful banners, and ornate stone arches framing the entrance.

मनीष दुबे-

राम मंदिर आंदोलन के दौरान देश भर में यह कहा गया कि मंदिर सिर्फ एक धार्मिक परियोजना नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। राम के नाम पर राजनीति हुई, चुनाव लड़े गए, बहसें हुईं, टीवी स्टूडियो गर्म रहे और नेताओं की भावनाएं बार-बार आहत होती रहीं। लेकिन अब जब राम मंदिर के दानपात्र से करोड़ों रुपये के कथित गबन का मामला सामने आया है, तो एक अजीब सी खामोशी दिखाई दे रही है।

जिन नेताओं को किसी फिल्म, बयान, सोशल मीडिया पोस्ट या मंचीय टिप्पणी में सनातन का अपमान नजर आ जाता है, वे इस मामले में चुप हैं। जिन टीवी चैनलों पर हर दूसरे दिन “हिंदू आस्था पर हमला” और “सनातन खतरे में है” जैसी बहसें चलती हैं, वहां भी राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी को लेकर वैसी बेचैनी नहीं दिख रही।

सवाल यह है कि यदि राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है, तो फिर उस मंदिर के दानपात्र से जुड़े कथित घोटाले को सनातन और आस्था का मुद्दा क्यों नहीं माना जा रहा? यदि किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा मंदिर पर टिप्पणी करने से धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, तो फिर मंदिर में चढ़ाए गए श्रद्धालुओं के धन में कथित गबन की खबर पर वही भावनाएं क्यों नहीं जाग रहीं?

अयोध्या में सामने आए इस मामले में अब तक कई कर्मचारी गिरफ्तार हो चुके हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय हैं। करोड़ों रुपये के गबन के आरोपों की जांच चल रही है। सवाल ट्रस्ट की निगरानी व्यवस्था पर भी उठ रहे हैं। लेकिन राजनीतिक प्रतिक्रिया लगभग नदारद है। न बड़े नेताओं के बयान आ रहे हैं, न टीवी स्टूडियो में रोजाना होने वाली तीखी बहसें दिखाई दे रही हैं।

आलोचकों का कहना है कि इससे यह धारणा मजबूत होती है कि धर्म और आस्था को लेकर दिखाई जाने वाली संवेदनशीलता कई बार चयनात्मक होती है। जब राजनीतिक लाभ की संभावना होती है तो धर्म केंद्र में आ जाता है, लेकिन जब सवाल जवाबदेही और पारदर्शिता का हो, तो वही धर्म और आस्था चर्चा के हाशिये पर चली जाती है।

यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि किसी विपक्षी दल के शासन वाले बड़े धार्मिक संस्थान में इसी तरह का कथित घोटाला सामने आता, तो क्या राजनीतिक और मीडिया प्रतिक्रिया इतनी ही शांत रहती? क्या तब भी यह महज एक आपराधिक जांच का मामला माना जाता या फिर इसे आस्था पर हमला और धार्मिक भ्रष्टाचार का राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाता?

राम मंदिर चढ़ावा कांड ने सिर्फ वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को ही जन्म नहीं दिया है, बल्कि इसने राजनीति, मीडिया और धर्म के रिश्तों पर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला पूछ रहा है कि आखिर आस्था की रक्षा का दावा करने वालों की आवाज इस बार इतनी धीमी क्यों है?

क्योंकि सवाल सिर्फ करोड़ों रुपये का नहीं है। सवाल उन करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का भी है, जिन्होंने राम के नाम पर अपना योगदान दिया था। और शायद इसी वजह से यह प्रकरण सिर्फ एक कथित चोरी या गबन का मामला नहीं, बल्कि जवाबदेही की भी परीक्षा बन गया है।


फलाहारी बाबा ने मुख्यमंत्री को अपने खून से चिट्ठी लिखी है-
“श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा में दान के रुपए, चढ़ावा, आभूषणों को CCTV कैमरे बंद करके प्रबंध कमेटी वाले लोग बंदरबांट करके करोड़ों की गाड़ियों और कोठियों में प्रस्थान कर गए हैं”
मथुरा से यह नया मामला सामने आया है।
-राजेश साहू, पत्रकार

Handwritten Hindi letter on an orange organization letterhead with a small baby deity illustration on the left and contact info at the top edge.

क्या राम मंदिर से हर दिन 27 लाख रुपए चुराए गए?
दरअसल साल 2024-25 में राम मंदिर की कुल आय 327 करोड़ रु. रही.. जिसमें 153 करोड़ चंदे और दानपेटियों से आए़
हर महीने राम मंदिर की कमाई 12 करोड़ 75 लाख के आसपास हुई, यानी हर दिन 42 लाख आय…
2 साल में 200 करोड़ रुपए चोरी के आरोप लग रहे हैं…मतलब अगर इसमें थोड़ी भी सच्चाई होगी तो हर दिन राम मंदिर से 27 लाख रुपए दान के चोरी हुए हैं…बस इसीलिए ये मामला बेहद गंभीर है, SIT जांच कर रही है, जल्द से जल्द पूरा मामला साफ होना चाहिए, ये मुद्दा करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा है.
-श्वेता राय

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