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चैनलों पर न्यूज़ पढ़ते हुए एंकर को कब चीखना है, कब चिल्लाना है, सब ऊपर से तय होता है!

Split-screen interview with two women; left is smiling, caption 'Why do they shout so much?'; right is speaking, caption 'Are you bored of a catastrophe?'

विनीत कुमार-

हमारा मीडिया इतना चीखता-चिल्लाता क्यों है?

“Are you bored of a Catastrophe?” क्या तुम तबाही की ख़बरें पढ़कर चट गयी हो?

बुलेटिन के बाद ब्रेकिंग न्यूज करके (तब दोपहर के बाद की कोई भी ख़बर हो, ब्रेकिंग ही मानकर चलायी जाती) वापस न्यूज़रूम आयी तो मेल बॉक्स में एक मेल पड़ी थी जिसे कि मेरे बहुत ही सीनियर ने मुझे किया था. उस एक लाइन की मेल में लिखा था- “Are you bored of a Catastrophe?”

ये कोई 18-20 साल पहले की बात होगी. बिहार में बाढ़ या ऐसी ही कोई बड़ी घटना हुई थी जिसमें कुछ लोगों की मौत हो गयी थी और मैंने उनकी संख्या बतायी. मैं न्यूज़ पढ़ते ही चीखती-चिल्लाती नहीं. मुझे लगता है कि ऐसा करने से हम अपना असर खो देते हैं. मैंने तब बस मरने वालों की संख्या बतायी और उस सीनियर ने ऐसा लिखा. मैं उनके पास गयी और पूछा कि क्या हुआ! उनका जवाब था- You need some urgency. तुम्हें ये ख़बर बताते हुए थोड़ी बेचैनी दिखानी चाहिए थी.

मैं न्यूज़ पढ़ते-बताते वक़्त चीखती नहीं. मैंने ऐसा कभी नहीं किया. मुझे लगता है कि ऐसा करने से हम अपना असर खो देते हैं. दर्शकों को अपनी ओर खींचने का ये सही तरीक़ा भी नहीं है बल्कि स्क्रीन पर ऐसी पचास चीज़ें होती हैं, जिन्हें छोड़ देने की ज़रूरत है. दूसरी बात कि हर किसी को लगता होगा कि स्क्रीन पर जो एंकर-रिपोर्टर चीखते-चिल्लाते हैं, वो उनका अपना तरीक़ा या फ़ैसला हुआ करता है जबकि ऐसा है नहीं. ये वो लोग तय करते हैं जो न्यूज़रूम चलाते हैं..

भारत-रूस और दुनिया थीम पर जियो पॉलिटिक्स, भारत-अमेरिका के संबंध और भारतीय मीडिया की स्थिति को लेकर RT News की समाचार प्रमुख (भारत) रूनझुन शर्मा ने वरिष्ठ मीडियाकर्मी-न्यूज़ एंकर और अब इंडिया ग्लोबल रिव्यू (IGR) की संस्थापक पलकी शर्मा उपाध्याय से लंबी बातचीत की. यह पॉडकास्ट RT News पर उपलब्ध है.

बातचीत का एक बड़ा हिस्सा भारतीय मीडिया को लेकर है जिसमें मोटे तौर पर न्यूज़रूम के हालात और साख पर केंद्रित है. इसी कड़ी में उपाध्याय ने ख़ुद के न चीखने-चिल्लाने, संतुलित ढंग से ख़बरें बताने-बातचीत करने की बात कही और साथ में ये भी कि चीखने-चिल्लाने का फ़ैसला एंकर-रिपोर्टर के ख़ुद का नहीं होता है बल्कि उनके ऊपर जो लोग बैठे होते हैं, वो तय करते हैं कि ऐसा करना है. जिस प्रसंग को हमने ऊपर शामिल किया है, वो इसी बात की पुष्टि के लिए हम दर्शकों के सामने रखा है.

निःसंदेह पलकी शर्मा उपाध्याय हमारे दौर की बेहद शालीन, शिष्ट, प्रभावशाली और शानदार न्यूज़ एंकर है. वैचारिक स्तर पर असहमत रहने के बावज़ूद मैं WION और Firstpost पर इन्हें लगातार सुनता आया हूं. इनकी पूरी उपस्थिति में कहीं से किसी तरह की उग्रता, उकसाने वाला अंदाज़ या सतहीपन नहीं हुआ करता. आप यदि इनसे असहमत भी होते हैं तो वो इसके लिए भी एक स्पष्ट और तार्किक ज़मीन तैयार करके आपके सामने रखती हैं. बाक़ी प्रवाहपूर्ण और बेहद असरदार अंग्रेजी तो बोलती ही हैं. ऐसे में यह यकीं करने में कोई मुश्किल नहीं है कि वो जिस चीखने-चिल्लाने का विरोध कर रही हैं, वो ख़ुद इसमें शामिल नहीं रही हैं, अपने सीनियर के कहे जाने पर भी नहीं.

लेकिन बिहार में बाढ़ या ऐसी ही किसी भयावह ख़बर को लेकर जिसमें कि कुछ लोगों की मौत हुई है, पढ़ने के क्रम में इनके सीनियर ने यदि “Urgency” की बात की तो उसका मतलब हर हाल में चीखना-चिल्लाना ही रहा होगा, ये हूबहू मान लेना, दरअसल न्यूज़रूम के क्राफ्ट से ध्यान हटा लेने जैसा है.

जब वो यह बात कह रही हैं तो वो विज़ुअल्स हमारे सामने नहीं है. होता तो बहुत अच्छी बात होती. टीवी वैसे भी दृश्यों की भाषा पर टिका माध्यम है. ऐसे में इस पेशे में लंबे समय तक रहे लोग अब यूट्यूब वीडियो या पॉडकास्ट कर रहे हैं तो उन पर यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि जो बातें उनके जीवन में इतना मायने रखती है कि अठारह-बीस साल बाद भी याद रह जाती है तो किसी तरह उसकी फुटेज शामिल करें. मामला कॉपीराइट पर आ टिकता हो तो इसकी अनुमति लें.

यदि ऐसा हो पाता है तो दर्शक सतही मीडिया के छात्रों के लिए सीखने-समझने के लिए बहुत कुछ सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हो सकेगा. नहीं तो यह देश के उन लाखों छात्रों के लिए विज्ञान की पढ़ाई बनकर रह जाएगी जिसमें किताबों में, बोर्ड पर मास्टरों के बनाए गए रेखाचित्रों के माध्यम से पढ़ा तो सबकुछ है किन्तु पूरे जीवन में एक परखनली तक न देख पाए. ख़ैर,

संभव है कि पलकी शर्मा उपाध्याय के सुपर सीनियर ने जिस अर्जेंसी की बात की हो, उसका आशय चेहरे पर वो भाव लाना हो जो ख़बर की तासीर से मेल खाती हो. मरने वालों की संख्या बताते हुए उन्हें कहीं ऐसा तो नहीं लगा कि ये महज एक संख्या है. चेहरे पर एक घड़ी के लिए वैसी ही पीड़ा, तरलता और अफ़सोस जैसे किसी परिजन के गुज़र जाने पर हमारे चेहरे पर अपने आप आ जाते हैं. मरने वालों की संख्या महज एक आंकड़ा नहीं है, उसके पीछे ज़िंदगियों के थम जाने की घटना शामिल है. रघुवीर सहाय की एक कविता है जिसकी पंक्तियों संभव हैं, यहां मैं थोड़ी त्रुटियों के साथ पेश कर पा रहा हूं लेकिन इससे आपको भाव का अंदाज़ा लग जाएगा. वो लिखते हैं-

सात सौ लोग मारे गए, अख़बार कहता है
टूटे हुए खंडहर, शहतीर..दूरदर्शन दिखाता है.
मेरे भीतर से ख़बरें आती हैं- हहराकर.

आंकड़ों में, संख्या में पिरामिड और उल्टा पिरामिड फॉर्मेट में ख़बरों के पढ़ या लिख दिए जाने के बाद भी कई बार ख़बरें हमारे भीतर धंसी रह जाती हैं जो कि शब्दों से कम, भाव से कहीं ज़्यादा जाहिर होते हैं.

आपको लग रहा होगा कि पलकी शर्मा उपाध्याय की बात पर भरोसा करते हुए और स्क्रीन पर चीखते-चिल्लाते हुए ख़बरें न पढ़ने के पक्ष में बात करते हुए भी मैंने उनके सुपर सीनियर के कुछ ज़्यादा ही उदात्त होने की संभावना देख रहा हूं लेकिन ये बात भी मुझे रूनझुन शर्मा के इस वाक्य के कहने के अंदाज़ से ही ध्यान में आया- Let’s talk about Indian Media, Why do they shout so much? ये वाक्य जब वो बोल रही होती हैं तो देखकर लगता है कि वो इसे लेकर इसलिए इत्मिनान है, चहक रही हैं कि वो इस कैटेगरी में शामिल नहीं है.

कॉफी मग उठाते हुए पलकी शर्मा उपाध्याय जब रिस्पांड करती हुई कहती हैं- I don’t know..तो ऐसा लगता है किसी अपर मिडिल क्लास घर में बैठे एक व्यक्ति ने दूसरे से पूछा हो- ये लड़ने-झगड़ने का शोर कहां से आ रहा है और पता नहीं कहने में पूरा ऐसा अंदाज़ हो कि भई हम तो इस तरह की क्लास से आते ही नहीं. ये मुलायमित भरे अंदाज़ में भी ख़ुद को एक क्लास से काटकर देखने की जो अदा है, वो चीखने-चिल्लाने के ख़िलाफ़ होकर भी शांत, सहज बने रहने के प्रति बेचैन करता है.

दोनों का ये अंदाज़ ख़ुद को एनओसी देने जैसा है जबकि जिस दुनिया की बात हो रही है, वो इसी दुनिया से आते हैं. वो बातचीत के साथ इंडियन मीडिया शब्द इस्तेमाल करते हैं जिसे कि बड़ी ख़ूबसूरती से जता देते हैं कि हम इस इंडिया मीडिया से नहीं आते हैं. अब जब इस तरह से बाड़े बनाए जाने लगेंगे तो हम दर्शक चीखने-चिल्लाने का समर्थन न करते हुए भी, अदाकारी बातचीत के साथ कहां जुड़ पाएंगे जिसमें शालीनता है, शिष्टता है, एक स्तर पर खुलापन भी है लेकिन वो भीतर से हहराकर आने वाली जो बात है- वो ग़ायब है.

मीडिया के एक बड़े धड़े का उदंड होना, कर्कश और फूहड़ हो जाना, साख को ताक पर रखकर कुतर्क करना जिसके बारे में अब ख़ुद न्यूज़ एंकर बोलने लगे हैं, चिंता की बात है. इस पर यदि दो अनुभवी ख़ुद को निस्संग रखकर बात करते हैं तो थोड़ी बहुत अंग्रेजी मजबूत होने के अलावा हमें और क्या हासिल हो सकेगा!

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