सुभाष सिंह सुमन-
पिछली सरकारों के राज में भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे, लेकिन आस्था पर डाका डालने का मामला नहीं आया। अमृतलाल के राज में वह भी हो रहा है। बीते जमानों में गोरी-गजनवी जैसे बाहरी आक्रांता मंदिर तोड़कर लूट मचाते थे। नये भारत वाले इस जमाने में गोरी-गजनवी मंदिर बनाकर लूट मचाते हैं। रामजी के नाम पर आया चढ़ावा चुरा गये। रामजी का मंदिर बनाने के लिए जमा हुआ चंदा खा गये। 3-4 दिन पहले इसपर एक पोस्ट लिखा था। उसकी रीच को लकवा मार गया था। उसे भी इसके साथ चिपकाता हूँ।
रावण अत्यंत पापी था। उसके अनंत पापों की सूची में सीता-हरण भी है। रावण ने सीता-हरण किया कैसे? उत्तर है साधु बनकर। बल से नहीं, छल से। रामायण में ही एक और मायावी राक्षस मिलता है। कालनेमि। कालनेमि ने क्या किया था? हनुमान का रास्ता रोकने के लिए साधु बन गया था। आश्रम बनाकर राम नाम जपने लगा था। हालाँकि कालनेमि का सामना अत्यंत बुद्धिमान हनुमान से हुआ था।
रावण या कालनेमि कोई एक व्यक्ति नहीं है। इसे गुण-दोष की तरह समझिये। रावण या कालनेमि होने का मतलब, जो आपको सगा होने के स्वांग में फँसाकर डंस ले। वह आपको इस तरह मतिभ्रम कर दे कि आप जान ही न पाओ, आपका अपहरण होने वाला है। वह आपके आराध्य की आपसे भी तीव्र गहनता से आराधना करने का ढोंग करे, ताकि आप समय से संजीवनी तक पहुँच न पाओ।
बाबर हो या औरंगजेब, उसने आपके आराध्य की आराधना का स्वांग रच कभी आपको फँसाया नहीं। उनका पक्ष सदा सुस्पष्ट था। अब बाबर या औरंगजेब को व्यक्ति की जगह गुण-दोष के अर्थ में समझें, तो इसका अर्थ है सामने से आक्रमण करने वाला/घोषित-सिद्ध शत्रु। आप हर पल इस तथ्य से परिचित हैं कि सामने वाला आपके ऊपर आक्रमण करने वाला है। और जब आप इस तथ्य से परिचित हैं, निश्चित उसके लिए मानसिक रूप से तैयार होंगे और यथासंभव सामरिक तैयारी भी रखेंगे।

इस देश की बहुसंख्यक जनता यहीं पर गड़बड़ा गयी है। उनके सिलेबस में रहा बाबर और औरंगजेब। परीक्षा में प्रश्न मिल रहा है रावण और कालनेमि का। तैयारी उन्होंने की बाबर और औरंगजेब से युद्ध करने की। इधर रावण अधिकांश की बुद्धि हर चुका है, और जो बचे हैं उन्हें कालनेमि अपने आश्रम में बैठाकर रामकथा सुना रहा है। हमारे युग के रावण और कालनेमि प्रत्यक्ष में ‘राम’ को ही ला देने का दावा ठोक देते हैं। परोक्ष में ‘राम’ के नाम पर भी घोटाले कर लंका की तिजोरियाँ भर रहे हैं। इस युग में रावण ने चाल और चेहरा बदल लिया है, लेकिन चरित्र अब भी वही है।
हनुमानजी को बताया गया है अति चतुर। विद्यावान गुणी अति चातुर। उनकी बात निराली। फिर भी वो कुछ समय के लिए फँसे। कालनेमि उनको कुछ समय भ्रमित करने में सफल रहा। सीताजी तो साधु वेश में आये रावण को पहचान ही नहीं सकीं। अपहृत हो गयीं। जनता भोली। भ्रमित होना अवश्यंभावी जैसा है। किसी व्यक्ति का भ्रमित हो जाना अपराध नहीं, लेकिन भ्रम को ही सत्य मानकर बैठे रह जाना पाप है। इस पाप से बचो लोगों।
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