नई दिल्ली/अयोध्या। अयोध्या के राम मंदिर दानपात्र से कथित गबन के मामले में एक दिलचस्प पहलू चर्चा का विषय बना हुआ है। जिस दैनिक जागरण को अक्सर सत्ता समर्थक या केंद्र सरकार के प्रति नरम रुख रखने वाले अखबार के तौर पर देखा जाता रहा है, वही अखबार इस पूरे मामले में पहले दिन से लगातार और आक्रामक ढंग से खुलासे कर रहा है। ऐसे में मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर दैनिक जागरण इस मुद्दे पर इतनी तल्लीनता और मुखरता के साथ क्यों बैटिंग कर रहा है?
राम मंदिर जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दे पर दैनिक जागरण की सिलसिलेवार रिपोर्टिंग ने कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। अखबार ने कथित तौर पर गबन की रकम, संदिग्ध कर्मचारियों की भूमिका, रिश्तेदारों के खातों की जांच, कौशलपुरी के कथित गोपनीय ठिकाने और ट्रस्ट के भीतर संभावित संरक्षण जैसे पहलुओं को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे केवल खोजी पत्रकारिता का मामला मानने को तैयार नहीं है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि इस कवरेज को केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच अंदरखाने चल रही खींचतान के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि, इस तरह के दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
चर्चा यह भी है कि राम मंदिर ट्रस्ट और उससे जुड़े फैसलों को लेकर समय-समय पर विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे में दानपात्र गबन प्रकरण की लगातार प्रमुखता से रिपोर्टिंग को कुछ लोग व्यापक राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देख रहे हैं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष यह भी है कि यदि किसी बड़े धार्मिक संस्थान से जुड़े वित्तीय अनियमितता के आरोप सामने आते हैं तो मीडिया का दायित्व बनता है कि वह तथ्यों को सामने लाए और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सवाल पूछे। इस दृष्टि से देखा जाए तो दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग को खोजी पत्रकारिता की सामान्य प्रक्रिया भी माना जा सकता है।


