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आज के अखबारों ने सेबी प्रमुख के खिलाफ आरोप और कोलकाता मामले में सीबीआई के ढीले रुख को छोड़कर तिल का ताड़ बनाया है

संजय कुमार सिंह

कांग्रेस ने कल आरोप लगाया कि सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच को इस पद पर रहते हुए एक ऐसी कंपनी से किराया मिला जिसकी जांच सेबी कर रहा था। किराये की राशि में कुछ वर्षों तक दिये-लिये जाने के साथ आरोप यह भी है कि इसमें ठीक-ठाक वृद्धि होती रही है। आज यह खबर द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है। खबर के अनुसार संबंधित कंपनी ने किराया देने से इनकार किया है। इससे पहले भी आईसीआईसीआई बैंक द्वारा सेबी प्रमुख को भुगतान किये जाने का आरोप लगा था तब भी मैंने लिखा था कि अखबारों ने बैंक के खंडन के साथ छापा या नहीं छापा। पर मुद्दा यह है कि कांग्रेस का आरोप गलत है तो अखबार यही क्यों नहीं कह रहे हैं। कांग्रेस का आरोप गलत है तो इसे गलत साबित किया जाना चाहिये और यह न सिर्फ सेबी, सेबी प्रमुख, अदाणी और प्रधानमंत्री तथा सरकार के पक्ष में होगा बल्कि जरूरी भी है। मुझे नहीं लगता है कि कांग्रेस के आरोप गलत या निराधार होते तो सरकार और सेबी ने कार्रवाई नहीं की होती। फिर भी यह सब खबर तो है ही और द हिन्दू के लिए पहले पन्ने का है तो बाकी के लिए क्यों नहीं?

आप जानते हैं कि माधवी पुरी बुच पर कई आरोप हैं और जैसे-जैसे आरोप बढ़ेंगे मामला गंभीर होता जायेगा। यह नहीं कि उनपर तो कई आरोप हैं उनमें इस नये का कोई मतलब नहीं है। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने भ्रष्टाचार और आयकर की चोरी रोकने के कई उपाय किये हैं और इससे आम आदमी के लिए कारोबार-व्यवसाय करना मुश्किल हो गया है। यही नहीं, विदेशी दान और चंदे से जन सेवा और लोकोपकार के काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों के लिए विदेशी चंदा लेना इतना मुश्किल कर दिया है कि यह संभव ही नहीं है और इससे कई नामी-गिरामी एनजीओ बंद हो गये हैं। उनका काम नहीं चल रहा है और उससे रोजगार कम हुए हैं सो अलग। यह सब भले भ्रष्टाचार रोकने और नियमों का पालन करने के नाम पर किया गया है लेकिन असली मकसद विरोधियों को कमजोर करना है। जहां तक माधवी पुरी बुच के खिलाफ आरोप और उनकी जांच का मामला है, आज नवोदय टाइम्स में खबर है कि संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने उन्हें तलब करने पर विचार करके फैसला करेगी। 

माधवी पुरी बुच पर जो आरोप हैं उनमें एक यह भी कि अन्य मामलों के साथ उन्होंने अदाणी के यहां निवेश किये गये 20,000 करोड़ रुपये के संबंध में आवश्यक जांच नहीं की। यह मामला पुराना है और सेबी के पूर्व अध्यक्ष ने भी इसकी जांच नहीं की जबकि उनसे शिकायत की गई थी। अब उन्हें इस बारे में कुछ याद नहीं है और वे अदाणी की ही नौकरी में हैं। जिन सांसदों ने इसपर सवाल करने की कोशिश की उन्हें परेशान किया गया। इस संबंध में हिन्डनबर्ग ने आरोप लगाये पर कार्रवाई नहीं हुई तो उसने कहा कि माधवी पुरी बुच के अदाणी की कंपनी और उनके यहां काम करने वालों से संबंध-परिचय रहे हैं। इसका भी खंडन किया गया पर जो स्थितयां हैं और खंडन में जो कुछ कहा जा रहा है उससे यह आशंका लगती है कि उन्हें इस पद पर अदाणी की रक्षा करने के लिए बैठाया गया है और अब जो मामले सामने आ रहे हैं उससे लगता है कि वे अपने मूल काम के साथ अपना फायदा भी उठा रही थीं। आईसीआईसीआई बैंके के खंडन पर कांग्रेस ने कहा है कि यह जितना जवाब देता है उसस ज्यादा मामले को उलझाता है। यह बिना अनुमति या इजाजत लेकर अथवा सूचना देकर भी किया गया हो सकता है। ऐसा होता तो भी गलत था लेकिन वह भी बताया जाता तो लगता कि कांग्रेस के आरोप गलत हैं। पर सरकार और सेबी, कांग्रेस और खासकर पवन खेड़ा को क्यों बख्श दे रही है। जो भी हो, कार्रवाई नहीं होने से जो साबित हो रहा है उसकी चर्चा करने की जरूरत नहीं है। ऐसी खबरों का नहीं छपना, कम छपना या उन्हें प्रमुखता नहीं मिलना नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

वह भी तब जब संदीप घोष पर ईडी का शिकंजा शीर्षक से खबर नवोदय टाइम्स में आज पहले पन्ने पर है। उप शीर्षक है, आरजी कर अस्पताल के पूर्व प्राचार्य, सहयोगियों के घरों पर छापेमारी। इस खबर को डॉक्टर हत्याकांड करके हाईलाइट भी किया गया है। काश! अखबारों ने भ्रष्टाचार विरोधी प्रधानमंत्री से संबंधित खबरों को हाईलाइट किया होता तो आज भाजपा की यह हालत नहीं होती और यह स्थापित हुआ होता कि प्रधानमंत्री ने अगर, ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ कहा था तो उसे करके दिखाया, उसे जीया। पर स्थिति उल्टी न भी हो तो वैसी नहीं है। बलात्कार के मामले की जांच करते हुए मामला भ्रष्टाचार की ओर मुड़ गया है और कलकत्ता पुलिस ने अगर इस मामले में अपने वालंटीयर को ही 12 घंटे के अंदर गिरफ्तार कर लिया था तो आज अमर उजाला में खबर है, सीबीआई की देरी से जज नाराज, कहा जमानत दे दूं। हालांकि, अभियुक्त को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

द टेलीग्राफ में आज पहले पन्ने पर एक शीर्षक है, सामूहिक बलात्कार का कोई सबूत नहीं है। कोलकाता पुलिस जब मामले की जांच कर रही थी अपने ही वालंटीयर को पकड़ लिया था तो सामूहिक बलात्कार की बात पोस्टमार्ट रिपोर्ट से पहले कहां से क्यों आ गई और जांच लगभग ठीक-ठाक चल रही थी तब भी सीबीआई को दे दी गई और अब सीबीआई की जांच संदेह के घेरे में है। मैं शुरू से कहता रहा हूं कि सीबीआई की साख ही कौन सी बहुत अच्छी है। कुल मिलाकर अब लग रहा है कि जांच को एक बलात्कारी से मोड़कर सामूहिक बलात्कार की ओर ले जाने का मकसद कुछ और रहा होगा। जो भी हो, मुझे इन सब बातों से मतलब नहीं है। खबरों की बात करूं तो सीबीआई के पक्ष में खबरें याद कीजिये अब उसके खिलाफ स्थिति है तो खबरें गिन लीजिये। जहां तक कोलकाता कांड के एक मात्र अभियुक्त की जमानत की बात है, आप जानते हैं कि दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के सहयोगी को खरोंच आने पर कितने दिन जेल में रहना पड़ा।

कोलकाता मामले में अभियुक्त संजय राय ने निर्दोष होने का दावा किया है और जांच में कोई प्रगति नहीं हुई है इसलिए जमानत की मांग की है। शाम साढ़े चार बजे सुनवाई में सीबीआई के वकील नहीं थे। सीबीआई के जांच अधिकारी ने कहा कि वे रास्ते में हैं। आप समझ सकते हैं कि इस मामले में सीबीआई कितनी गंभीर है। ईडी के छापे की खबर द टेलीग्राफ में तो है ही, हिन्दुस्तान टाइम्स में भी पहले पन्ने पर है। द टेलीग्राफ का आज का कोट सोहैला अब्दुल अली का है। पहले कोट पढ़िये फिर बताता हूं कि वो कौन हैं। “(बलात्कार के मामले में) मौत की सजा जिम्मेदारी से बचने का समाज का तरीका है…. यह किसी को संतुष्टि का एक क्षण मुहैया कराता होगा पर जिनका बलात्कार हो सकता है उनके लिए यह करता है? आज जब हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर और दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर यह खबर है कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने बलात्कार विरोधी  विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेज दिया है तब द टेलीग्राफ का यह कोट एक बलात्कार पीड़ित का है।

आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के नये कानून में बलात्कार और हत्या के अभियुक्त को मौत की सजा बाध्यकारी कर दी गई है और यह राजनीति है। द टेलीग्राफ ने अपनी खबर से बताया है, सोहैला अब्दुल अली के साथ मुंबई में 1980 में सामूहिक बलात्कार किया गया था। उस समय वे 17 साल की थीं। वह बच गईं और उनने इस बारे में बात करना चुना। उनने अपने परिवार को बताया, वे पुलिस के पास गईं और जब 20 साल की हुईं तो इसके बारे में लिखा। मानुषी पत्रिका में एक तीखा लेख, “मुझे लगता है कि मेरे साथ 10 बार बलात्कार किया गया था।” इसमें ऐसे विवरण दिए गए थे और बताया गया था कि कैसे चार हथियारबंद लोगों ने उसे यह भाषण सुनाकर जाने दिया कि वह कितनी “अनैतिक वेश्या” थी जो उस समय एक लड़के के साथ अकेली थी जब उन्होंने उस पर हमला किया था।

सोहैला की स्नातक थीसिस बलात्कार पर थी। अमेरिका में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने बलात्कार संकट परामर्शदाता के रूप में काम किया और 2018 में, उन्होंने व्हाट वी टॉक अबाउट व्हेन वी टॉक अबाउट रेप नामक पुस्तक लिखी। उनने अन्य कार्य भी किये। अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का अध्ययन किया, बच्चों की किताबें लिखीं, परिवार का पालन-पोषण किया। जिंदगी बलात्कार पर नहीं रुकी। 61 साल की सोहेला इन दिनों न्यूयॉर्क में हैं। अब 2024 के कलकत्ता आते हैं। 9 अगस्त को आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की एक जूनियर डॉक्टर के साथ बलात्कार किया गया। उसकी हत्या भी कर दी गई। इसका मतलब है कि उसे कभी भी अपने जीवन की कहानी को फिर से अपना बताने का मौका नहीं मिलेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि बंगाल में जब बलात्कार और हत्या का मामला सामने आया तो राजनीतिक कारणों से उसे बंगाल सरकार के खिलाफ मोड़ दिया। जांच का हाल ऊपर बता चुका हूं। निर्भया मामले में आरोपियों को फांसी दे दी गई थी पर फिर बलात्कार और हत्या हुई ही, होती रही है।

कोलकाता में डॉक्टर से बलात्कार और हत्या के मामले में वहां के समाज की प्रतिक्रिया और नाराजगी अपनी जगह थी ही और वह दिखी भी। भाजपा ने उस पर राजनीति की और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस हत्या कांड पर आक्रोश के बीच लाल किले की प्राचीर से इस साल के अपने भाषण में महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाया। मोदी ने सीधे तौर पर कोलकाता कांड का जिक्र तो नहीं किया, लेकिन उन्होंने रेप की घटना को अंजाम देने वाले को अपने हिसाब से चेतावनी देते हुए साफ-साफ कहा था कि पाप करने की सजा फांसी होती है। यह डर पैदा करना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि बेटियों पर अत्याचार हो रहे हैं, हमें गंभीरता से सोचना होगा। महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों को जल्द से जल्द सजा हो, ऐसा विश्वास पैदा करना जरूरी है। बेशक यह उनकी राय है पर जरूरी नहीं है कि यही सही या सर्वश्रेष्ठ हो और अब तो पता चल गया है कि नोटबंदी चाहे जितनी जरूरी और सही रही हो, उसके अपेक्षित लाभ नहीं हुए क्योंकि सोच समझ कर लागू नहीं किया गया। ममता बनर्जी ने राजनीति में मोदी से आगे दिखने की कोशिश में कानून बना तो दिया इसका लाभ होगा कि नहीं यह सोहैला अब्दुल अली के विचार जानने के बाद संदिग्ध लग रहा है। बेशक इसपर विचार होना चाहिये पर कौन करेगा या कराएगा।      

देश के दो प्रमुख मामलों में अखबारों का हाल देखने-जाने के बात अब सुनिये आज के लीड की कहानी। द टेलीग्राफ ने आज फ्रांस के एक बलात्कार की कहानी छापी है जो 71 साल की एक महिला की है। उसे 2020 में यानी चार साल पहले पता चला कि उसका पति उसे बेहोश करके अपने मित्रों को बलात्कार के लिए परोस देता है। खबर के अनुसार, महिला चाहती तो इस मामले को गोपनीय रखने की मांग कर सकती थी पर उनने ऐसा कुछ नहीं किया और कहा है, अगर किसी महिला की नींद खुले और उसे कुछ याद नहीं हो तो वह उनकी कहानी याद कर सकती है। उनकी राय में दुनिया के लिए उनका मामला जानना जरूरी है और शर्म अगर आनी है तो उन पुरुषों को आये उन्हें नहीं। आप समझ सकते हैं कि बलात्कार को देखने का एक नजरिया यह भी है और कोलकाता मामले में भाजपा की सेवा में या ममता बनर्जी के विरोध में इसे हवा देने वालों ने आज द टेलीग्राफ की तरह, आम आदमी या महिला के पक्ष में कुछ खास नहीं पेश किया है। जब ममता बनर्जी का बनाया नया कानून विचार के लिए राष्ट्रपति को भेज दिया गया है। मेरे ख्याल से वहां ऐसे कानून की जरूरत नहीं है, जहां है, वह वैसे ही है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि आज द टेलीग्राफ की लीड सबसे अलग है।

इंडियन एक्सप्रेस की लीड आज एक्सक्लूसिव है। बाईलाइन वाली इस खबर के अनुसार दिल्ली और माले के बीच रक्षा वार्ता हुई। रक्षा सचिव स्तर की वार्ता में द्विपक्षीय सैनिक अभ्यास पर भी बात हुई। दो कॉलम के लीड के बराबर में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य के खिलाफ सीबीआई के आरोप तीन कॉलम में हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि किसी को यह दावा नहीं करना चाहिये कि वह भगवान के दूत हैं और यह तय करना जनता पर छोड़ देना चाहिये कि आपमें भगवान है कि नहीं है। आज पहले पन्ने की एक खबर पहलवान विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया के कांग्रेस में शामिल होने और विनेश को विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट मिलने की खबर है। आज यह खबर भिन्न अखबारों में अलग शीर्षक से है। पर वह महत्वपूर्ण नहीं है। दूसरी खबर मणिपुर में पूर्व मुख्यमंत्री के घर पर रॉकेट हमले की है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी आज सबसे अलग है, “अगर गिरफ्तारी नियमानुसार नहीं हो तो आरोपियों को रिहा कर देना चाहिये: सुप्रीम कोर्ट”

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार भूषण स्टील के प्रमोटर नीरज सिंगल को 16 महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी। उनपर मनी लॉडंरिंग का मामला है और वित्तीय संस्थाओं से 46,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी  का आरोप है। एक और खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री जेल से फाइलें साइन करें तो सरकार को कोई दिक्कत है। इससे यह मामला भी दिलचस्प रुख लेता दिख रहा है। द हिन्दू में मणिपुर की खबर लीड है। शीर्षक है, मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री के घर पर रॉकेट हमले में एक व्यक्ति मारा गया। सकेंड लीड है, स्वास्थ्य मंत्रालय ने मल्टी ड्रग रेसिसटैंट टीबी के लिए नई उपचार व्यवस्था को मंजूरी दी। हिन्दुस्तान टाइम्स ने जम्मू और कश्मीर के घोषणा पत्र को पेश करने की खबर को लीड बनाया है और बताया है कि अमित शाह के इसका लोकार्पण किया जिसमें जनकल्याण पर फोकस है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, 370 कभी वापस नहीं। मुझे समझ में नहीं आया कि जब बिना लाभ हटाने के उपाय किये जा सकते हैं तो वापस बहाल करने में क्या दिक्कत हो सकती है। पर खबर तो खबर है। अमर उजाला में अमर उजाला में भी यही लीड है। इसमें यह ज्ञान जोड़ दिया गया है कि 370 आतंकवाद की ओर ले जा रहा था। दूसरे पहले पन्ने में एक सड़क दुर्घटना की खबर लीड है।

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