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आज के अखबार : सरकार का प्रचार और विपक्ष का विरोध ही ज्यादातर का मुख्य उद्देश्य लगता है

संजय कुमार सिंह

कलकत्ता के आरजी कर अस्पताल कांड की चिन्ता दिल्ली के अखबार अभी भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। ठीक है कि मामला वैसा ही है और हिन्दी पट्टी में बलात्कार व हत्या के मामले हों, उस पर आंदोलन नहीं हो तो अखबार उसकी चिन्ता भी नहीं करते हैं हालांकि, यह भी तथ्य है कि आंदोलन तभी होते हैं जब खबरें छपती हैं और इसके कई उदाहरण हैं। ऐसे में आरजी कर अस्पताल की घटना के बाद हिन्दी पट्टी में सामने आये बलात्कार, यौन शोषण और महिला (बालिका) हत्या के मामले ठंडे पड़ गये। और तो और विनेश फोगाट के कांग्रेस में शामिल होने पर बृज भूषण शरण सिंह ने भी अपनी राय रखने की हिमाकत की। यही नहीं, भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने भी कहा है, “लोग उंगली तो उठा रहे हैं, इसलिए किया था आंदोलन?”। कहने की जरूरत नहीं है कि आंदोलन इसीलिये किया हो तो वह गलत, गैरकानूनी या अनैतिक भी नहीं है जबकि भाजपा सरकार में भाजपा सांसद के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना शर्मनाक और अनैतिक दोनों है। उनका बोलना तो और भी ज्यादा।

ऐसी हालत में बंगाल में जो हुआ उसके लिए वहां की सरकार और मुख्यमंत्री न सिर्फ हिन्दी पट्टी की सरकार से बेहतर काम कर रही हैं बल्कि स्थानीय समाज के भारी दबाव में भी हैं और इनमें वहां के अखबार शामिल है। मुझे लगता है कि भाजपा ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए आरजी कर मामले को तूल दिया और अब जब यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपाई राज्यों में उससे ज्यादा बुरे मामलों में कार्रवाई नहीं हुई है या जो हुई है वह असंतोषजनक है। यही स्थिति विदेश में भारत को बदनाम करने के मामले में है। आज नवोदय टाइम्स में शिवराज सिंह चौहान का यह आरोप है कि राहुल गांधी देश की छवि खराब कर रहे हैं। यह अलग बात है कि अखबार ने इसे, “राहुल के खिलाफ भाजपा उतरी मैदान में” के मुख्य शीर्षक से छापा है और एक तरफ राहुल गांधी का आरोप है, कौशल वाले लोगों को किया जा रहा है दरकिनार। कहने की जरूरत नहीं है कि सच बोलने के लिए फंस और सजा पा चुके राहुल गांधी झूठ नहीं बोलेंगे और अगर उन्होंने कहा है कि कौशल वाले लोगों को दरकिनार किया जा रहा है तो यूं ही नहीं कहा होगा और कोई भी ऐसे लोगों के नाम गिना देगा।

यही नहीं, भारत को जमाने से ब्रेन ड्रेन के लिए जाना जाता है। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इसे रोकने या कम करने के लिए कोई सफल कोशिश की हो इसकी जानकारी नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी ने सरकार की नाकामी की चर्चा की है और पूछा जाये तो वे (या कोई भी) विस्तार से विवरण दे सकता है। पर एक पूर्व मुख्यमंत्री को राहुल गांधी को बदनाम और गैर जिम्मेदार साबित करने में लगा दिया गया तथा वे अपना काम कर रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार का प्रचार करने का कोई मौका ज्यादातर अखबार नहीं छोड़ रहे हैं। उदाहरण के लिए आज अमर उजाला में टॉप पर चार कॉलम की खबर है, कैंसर की दवायें होंगी सस्ती, अब पांच प्रतिशत जीएसटी। इसका एक मतलब यह भी हुआ कि जो गरीब कैंसर की चपेट में हैं और कैंसर का इलाज करा पा रहे हैं उनसे भी सरकार पांच प्रतिशत जीएसटी लेगी। जो इलाज ही नहीं करा पा रहे हैं उनके लिए तो कुछ नहीं ही है। खबर यह है कि अभी तक कैंसर के शिकार जो लोग किसी तरह इलाज करा पा रहे थे उनकी दवाइयों पर सरकार 12 प्रतिशत जीएसटी ले रही थी उसे कम करके पांच प्रतिशत कर दिया गया है और शून्य अभी भी नहीं किया गया है।

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार जब बहुमत में थी 12 प्रतिशत लेती थी अब सीटें कम हो गई हैं तो टैक्स पांच प्रतिशत है। लेकिन प्रचार देखिये। यहां यह भी दिलचस्प है और आज ही खबर है, स्वास्थ्य और जीवन बीमा के प्रीमियम पर जीएसटी कम करने का फैसला टाल दिया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार जीएसटी कौंसिल ने स्वास्थ्य बीमा पर इस मांग को टाल दिया है और जीओएम (मंत्रियों के समूह) से इसपर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। खबर के अनुसार बीमा प्रीमियम पर यह टैक्स अभी 18 प्रतिशत है। सरकार ने सबके स्वास्थ्य की देखभाल के लिए पर्याप्त अस्पताल बनवाये होते और लोगों का इलाज मुफ्त हो तो इस बीमे के जरूरत ही नहीं है। सरकारी अस्पतालों और वहां इलाज की व्यवस्था आप जानते हैं। एम्स जैसे अस्पताल में जहां पहले बहुत कुछ मुफ्त था, अब पैसे लगते हैं और कुछेक पर टैक्स भी लगता है। ऐसे में कैंसर की दवा पर टैक्स शून्य नहीं है, स्वास्थ्य बीमा पर टैक्स कम नहीं हुआ और क्रेडिट कार्ड के कर्ज के ब्याज पर लगने वाला जीएसटी 18 प्रतिशत है। उसकी चर्चा भी नहीं है। एक समय मैं कहता था कि क्रेडिट कार्ड का कर्ज बहुत सुविधाजनक है क्योंकि न्यूनतम किस्त हर महीने सिर्फ पांच प्रतिशत देना होता है। पर अब उसमें शामिल ब्याज पर 18 प्रतिशत जीएसटी है।

उदाहरण के लिए अगर क्रेडिट कार्ड का आपका कुल बकाया या देय 60,000 रुपये हो तो न्यूनतम मासिक भुगतान 3,000 रुपये होगा। इसमें ब्याज की राशि (लगभग) 2000 रुपये होगी और इसपर 18 प्रतिशत के हिसाब से जीएसटी होगा 360 रुपए मतलब किस्त की राशि हुई 640 रुपए मात्र। अगर न्यूनतम किस्त का भुगतान समय पर नहीं हुआ जो भारी जुर्माना लगता है और उसपर भी जीएसटी है। इसलिये जो क्रेडिट कार्ड पहले ही महंगा था जीएसटी के बाद और महंगा हो गया है तथा सूदखोर महाजनों का धंधा भले अवैध हो, सरकार क्रेडिट कार्ड पर ब्याज, जुर्माना और जीएसटी के नाम पर महाजनों से ज्यादा वसूल रही है। मजबूर आदमी बोल नहीं सकता इसलिए झेल रहा है और सरकर किसी न किसी तरह हर किसी को मजबूर बना रही है। पर चाहती है कि विदेशों में बदनाम नहीं किया जाये। नरेन्द्र मोदी खुद करते रहे हैं तो वह उनका ‘अधिकार’ था। टाइम्स ऑफ इंडिया में जीएसटी कम होने की खबर पहले पन्ने पर है और शीर्षक भी वैसा ही है, कैंसर की दवाइयों, नमकीन और साझे में हेलीकॉप्टर सेवा पर जीएसटी कम हुईदैनिक जागरण ने इसे पांच कॉलम में लीड बनाया है। शीर्षक है, कैंसर का इलाज कराना होगा सस्ता। इसे सर्वश्रेष्ठ प्रचारक का ईनाम दिया जा सकता है।  

द हिन्दू में लीड का शीर्षक है, स्वास्थ्य, जीवन बीमा पर मंत्रियों का समूह जल्दी ही फैसला करेगा। उपशीर्षक में बताया गया है, जीएसटी कौंसिल ने विचार किया कि दर 18 प्रतिशत से कम की जाये या पूरी तरह खत्म कर दी जाये। अगर छूट देनी ही है तो किसे मिलनी चाहिये और इस, बात पर भी चर्चा होनी है कि समूह बीमा पॉलिसियों पर कैसे व्यवहार करना चाहिये। आज की दूसरी बड़ी खबर, (कोलकाता वाली) इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। इसका शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर में देरी, पोस्टमार्टम से संबंधित कागजी कार्रवाई न होने को रेखांकित किया। उपशीर्षक है, पीठ ने सरकार से फॉर्म जमा करने के लिये कहा। चिकित्सकों से आज वापस काम पर लौटने के लिए कहा। इंडियन एक्सप्रेस की एक दूसरी खबर बताती है कि ममता बनर्जी के अनुसार, कोलकाता के पुलिस प्रमुख ने इस्तीफे की पेशकश की है लेकिन पूजा के लिए सरकार को उनकी जरूरत है। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार ममता बनर्जी ने कहा है कि पीड़िता के परिवार को सरकार की ओर से किसी पैसे की पेशकश नहीं की गई थी।   

जनसत्ता में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पांच कॉलम की लीड है। शीर्षक है, कहां है पोस्टमार्टम का जरूरी दस्तावेज, क्यों हुई एफआईआर में 14 घंटे की देरी। नवभारत टाइम्स में भी यह खबर लीड है और इसका शीर्षक है, हड़ताली डॉक्टरों को एससी का अल्टिमेटम। हिन्दुस्तान टाइम्स  में यह खबर लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सकों से कोलकाता हत्याकांड पर आंदोलन खत्म करने के लिए कहा। द टेलीग्राफ में भी यह खबर लीड है लेकिन कुछ अलग तरह से। अखबार ने सात कॉलम में फ्लैग शीर्षक रखा है, ममता बनर्जी ने प्रदर्शनकारियों से कहा, अदालत के निर्देश के अनुसार काम शुरू कीजिये, आप मुझसे मिलने आ सकते हैं, स्वागत है। मुख्य शीर्षक है, मुख्यमंत्री ने जूनियर डॉक्टर्स से अपील की। बीच में एक बॉक्स में खास बिन्दु हैं जिसका शीर्षक है, सोमवार की सुनवाई की खास बातें। एक दूसरी खबर का शीर्षक है, सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं। नवोदय टाइम्स में यह खबर दो कॉलम की है, “काम पर लौटें बंगाल के डॉक्टर : सुप्रीम कोर्ट”। उपशीर्षक है – कहा, काम की कीमत पर नहीं किया जा सकता प्रदर्शन। अमर उजाला में यह लीड नहीं है लेकिन पांच कॉलम का शीर्षक है, सुप्रीम निर्देश – शाम 5 बजे तक काम पर लौटें…. डॉक्टरों का इन्कार। कोलकाता कांड, शीर्ष अदालत ने कहा – कर्तव्य की कीमत पर नहीं हो सकता विरोध…. लौटने पर नहीं होगी कार्रवाई। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड नहीं है। पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, “आवश्यक दस्तावेजों के बिना आरजी कर के डॉक्टर का पोस्टमार्टम कैसे किया गया : सुप्रीम कोर्ट”। यहां लीड का शीर्षक है, कांग्रेस से कोई गठजोड़ नहीं, आप ने हरियाणा चुनाव के लिए 20 उम्मीदवार घोषित किये। नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड है। इसका शीर्षक है, हरियाणा में अकेले लड़ेगी आप उपशीर्षक है, कांग्रेस से गठबंधन पर असमंजस खत्म, 20 प्रत्याशी घोषित किये।      

अमर उजाला की आज की लीड सबसे अलग है। शीर्षक है, वायु प्रदूषण पर सख्ती दिल्ली में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध। उपशीर्षक है, उत्पादन, भंडारण, बिक्री व उपयोग पर रोक, एक जनवरी तक ऑनलाइन भी नहीं बेच सकेंगे। लीड के बराबर में एक खबर है, डीपीसीसी इंजीनियर के ठिकाने पर छापा, 2.39 करोड़ की नकदी जब्त। मेरे लिये यह एक आश्चर्यजनक खबर है। भ्रष्टाचार रोकने के सरकार के दावों और नोटबंदी से लेकर नियमों में किये गये बदलाव और उपायों के बावजूद अभी भी इतनी नकदी मिलना कई सवालों को जन्म देता है पर प्रधानमंत्री जवाब देने की बजाय ‘मन की बात’ करते हैं। उन्हें बताना चाहिये कि लंबे-चौड़े दावों और नियमित छापमारी के बावजूद इतनी रकम लोगों के पास इकट्ठा कैसे हो सकती है। अमर उजाला की इस खबर का उपशीर्षक है, नवीनीकरण के लिए कंपिनयो से लेता था घूस, रंगे हाथों हुआ था गिरफ्तार। तमाम दावों के बावजूद सरकार का यह कहना कि अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ सबूत नहीं हैं क्योंकि वे ‘अनुभवी चोर’ हैं और दिल्ली में सरकार की नाक के नीचे से 2.39 करोड़ रुपये बरामद होना बताता है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का दावा सिर्फ दिखावा और प्रचार है।

सरकार की प्रशंसा करने वाली आज की सबसे बड़ी खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में फोटो के साथ सेकेंड लीड है। शीर्षक है – भारत, संयुक्त अरब अमीरात ने रणनीतिक साझेदारी का विस्तार किया। इंडियन एक्सप्रेस में उसकी एक्सक्लूसिव खबर के कारण जगह कम थी तो यह खबर भगवा परिधान में फोटो के रूप में है और शीर्षक वही है, रणनीतिक संबंध। इस महत्वपूर्ण खबर के बदले में बांग्लादेश भारत से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करेगा, खबर को कम महत्व मिला है। पर यही मीडिया की आजादी है और भारतीय मीडिया को पूरी तरह उपलब्ध है इसलिए इमरजेंसी की आलोचना अभी भी होती है और सेना प्रमुखों की किताब लटकी हुई तो उसे कोई याद भी नहीं करता। इमरजेंसी पर हाल तक किताबें आई हैं। खबरें छापने की अपनी आजादी का उपयोग इंडियन एक्सप्रेस जब तब करता रहता है। आज की खबर है, इजराइल में रोजगार की दिखावटी योजना के लिए ‘दोषपूर्ण’ चुनाव का नतीजा यह रहा कि जो चुने गये उनमें कौशल नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने आज छपी पहली किस्त में बताया गया है कि इजराइली ठेकेदार परेशान हैं और चाहतें हैं कि नये सिरे से कर्मचारी तैनात किये जायें। खबर के अनुसार चुन कर भेजे लोगों में कुछ को हथौड़ा पकड़ना भी नहीं आता है। भारत में अधिकारियों ने स्वीकार किया कि चुनाव की प्रक्रिया में सुधार की गुंजाइश है। खबर में कुछ चुने गये लोगों के उदाहरण हैं मैं एक को हिन्दी में पेश कर रहा हूं। अमरेश मदेशिया (44) को सिवान, बिहार से बढ़ई का काम करने के लिए चुन कर भेजा गया था। लखनऊ में कौशल परीक्षा में चुने गये पर तेल अवीव के पास आठ हफ्ते मजदूर का काम किया। उसने कहा, “भाषा की समस्या थी …. मैं झाड़ू पोछा लगाता था, सीमेंट की बोरी और लोहे के छड़ ढोता था। मैंने सोचा : क्या मैं यहां मजदूर का काम करने और मरने आया हूं।” गये महीने वह वापस चला आया।        

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