
महेश शर्मा-
कोरोना काल ने देशकाल की परिस्थितियों के साथ ही लोगों के जीवन पर असर डाला। मैं भी प्रभावित हुए बिना न रह सका। समाज का बोर्ड ऑफ गवर्नर का मुखिया बदला तो असर तो मुझ पर भी पड़ेगा। आप ही बताइए पड़ेगा की नहीं पड़ेगा। ओडिशा में कर्फ्यू जैसा माहौल। पुलिस की गाड़ियां घरों में ही रहने की चेतावनी देते हुए निकल जाती थी। चारों तरफ मौत का सा सन्नाटा पसरा था। जिस मोहल्ले में कोविड 19 पॉजिटिव पाया जाता था। पूरा मोहल्ला सील कर दिया जाता था।
मैं कटक में था। अपने गेस्ट रूम में कैद। जैसे नजरबंद कर दिया गया हूं। गेट पर आकर नजारा देखते थे। देखने को क्या सूनी सड़कें, पार्क, चिचियाती चिरैया। सुंदर पार्कों में ताला लगा था। खिलखिलाते फूल हमें और हम उन्हें दूर से देखकर मुस्कान बिखेर देते थे। हूटर बजाती गाड़ियां देखकर गेट पर भी सन्नाटा छा जाता था। महानदी के निकट ही समाज का दफ्तर और छापाखाना दोनों थे। सोसाइटी का अखबार होने के कारण मालिकों की बकैती जैसी कोई बात नहीं दिखती। बाकी मेरा आदमी, तेरा आदमी यानी ‘माता’ वायरस यहां पर भी घुसा था।
हूटर बजाती गाड़ियां या फिर झुंड बनाकर उड़ते पंक्षियों की आवाज सन्नाटा तोड़ती थी। कहीं भी निजाम परिवर्तन का संकेत मिजाज पर भी दिखने लगता था। समाज का हिंदी और अंग्रेजी पोर्टल बंद कर दिया गया था। समाज को डिजिटल प्लेटफार्म पर लाने का श्रेय वहां का स्टाफ मुझे ही देता था। यह तीन भाषाओं में ओड़िया, अंग्रेजी और हिंदी। उसका एक ऑफिस कानपुर में भी खोला गया जो कि काफी जल्दी सिमट भी गया। नये प्रबंधन ने सख्त मॉनीटरिंग शुरू कर दी थी।
हालांकि भुवनेश्वर में पोर्टल का ऑफिस अभी भी है। स्टाफ भी काम करता था। न्यूज बुलेटिन और प्राइम टाइम के लिए एक स्टूडियो भी बनाया। था। कैम्पस सेलेक्शन से लाए गए प्रशिक्षु बच्चों को पोर्टल में समायोजित कर दिया गया था। स्थायी स्टाफ भी लाए थे जो अभी भी कार्य कर रहा है। शुरू में कटक में पोर्टल का ऑफिस चला फिर भुवनेश्वर शिफ्ट कर दिया गया। इसी के साथ राजस्थान पत्रिका ने कुछ गैर हिंदीभाषी राज्यों में स्पेशल स्टोरी के पत्रकार नियुक्त किया था उनमें मैं ओडिशा से था।
इंडिया टुडे के अप्रैल माह 2021 के अंक में मेरी दो रिपोर्ट छपी थी। एक वनों का दावानल पर तो दूसरी एसिड सरवाइवर की प्रेमकथा पर। अंशुमान तिवारी ने इंडिया टुडे (हिंदी) के संपादक पद से इस्तीफा दिया तो मैं भी अलग हो गया। राजस्थान पत्रिका में काम करता रहा। रिपोर्ट भी छपती थी। पारिश्रमिक भी मिलता था। वहां पर भुवनेशजी, सिद्धार्थ भट्ट, अरुण सिंह, नितिन चौधरी, गोविंद जी, हरीश जी, सिकंदर आदि का सहयोग मिलता रहा। एक्सक्लूसिव रिपोर्ट्स लगातार छपते रहने के कारण राजस्थान पत्रिका में मेरी छवि ठीकठाक रिपोर्टरों वाली थी।
वहीं, कार्य के दौरान ओडिशा के रायगढ़ा जिला सीमा में हीराखंड एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। उस घटना का लेट नाइट कवरेज मैने रात ढाई बजे तक किया। राजस्थान पत्रिका के छत्तीसगढ़ के रायपुर संस्करण को मृतकों और घायलों का अपडेट देने के साथ ही फोटो भी भेज रहा था। यहां कानपुर में अमर उजाला में तत्कालीन डेस्क इंचार्ज संजीव मोहन शर्मा ने रात में फोन किया। तो उन्हें सूचनाएं फोटो आदि भेजता रहा। वह खुद बताते हैं कि मालिकानों ने उन्हें प्रशस्ति पत्र भी दिया। ऐसी कुछ खबरें थी जो मेरी पत्रकारीय छवि निर्माण में सहायक रहीं।
राज्य में राजनीतिक उतार-चढ़ाव, तीज-त्योहार, जनसमस्याओं की रोचक खबरें भेजता रहता था। कुल मिलाकर काम करने का अवसर, किसी भी रिपोर्ट का रिच कंटेंट जुटाने की कला का भरपूर लाभ मिला। पर क्या करता। कोरोना के कारण राजस्थान पत्रिका ने जिन राज्यों से विशेष रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों को हटाया था उनमें मैं भी एक था।
हालांकि, उन्होंने मुझे 2022 के यूपी चुनाव के दौरान दोबारा संपर्क किया। पर तब तक मैं बड़े भाई शंभूदयाल वाजपेयी की शरण में जा चुका था। वह मुझे बहुत सम्मान देते हैं। इसके पीछे काम और स्वभाव दोनों ही हैं। ऊपर से भले ही सख्त दिखते हों पर भीतर से वाजपेयी जी बहुत नरम दिल और मानवीय स्वभाव के व्यक्ति हैं। अमृत विचार के कई संस्करण खड़े किए। उनकी मेहनत लगन समर्पण से अखबार गति पकड़ रहा है। यह अच्छे लक्षण हैं। रिश्तों में भावुकता के कारण थोड़ा भटकाव आ गया था इसलिए तारतम्यता प्रभावित हुई।
हां, तो उधर दीपक जी समाज के बोर्ड ऑफ गवर्नर के चेयरमैन नहीं रहे। तो मेरी कुर्सी में हालाडोला लाजिमी था। 2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का चुनाव देखने और लिखने का क्रेज था। तो ट्रेन से हावड़ा पहुंचा। कोरोना में चुनाव कराने को लेकर वहां चखचख मची थी। मानिकतल्ला में रहा। घूम-फिरकर वहां की थोड़ी बहुत नब्ज टटोलने की चेष्टा करता रहा। कोलकाता का ब्रिगेड परेड मैदान में शायद पांच मार्च को कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट की संयुक्त रैली थी। गजब भीड़ जुटी। वहां पर लड़ाई टीएमसी बनाम भाजपा की चर्चा थी पर इस रैली ने लोगों को नये समीकरण पर सोचने पर मजबूर कर दिया।
दो दिन बाद यानी सात मार्च को मोदी उसी मैदान में गरजे तो कांग्रेस और लेफ्ट की संयुक्त रैली से ज्यादा लोग जुटे। उधर ममता बनर्जी का किसी अन्य क्षेत्र में पैदल रोड शो ने भाजपा दिग्गजों की नींद ही उड़ा दी। दस को ममता ने भी ब्रिगेड परेड ग्राउंड पर भारी भीड़ वाली रैली की। लोग पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की चर्चा करने लगे। उधर आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी पश्चिम बंगाल के हुगली व इर्दगिर्द मुस्लिम एरिया में चुनावी बिसात बिछाने को बैठ गए। वह बिहार के चुनाव में वोटों में सेंधमारी करके राजद व कांग्रेस के एलायंस को हार का स्वाद चखाकर आए थे। तब से उन्हें भाजपा की बी टीम कहा जाने लगा था।
वहीं का तजुर्बा दोहराते हुए वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को झटका देने की तैयारी कर चुके थे। हुगली व इर्दगिर्द सियासी प्रभाव रखने वाले फुरफुरा शरीफ के पीरजादा से ओवैसी की मुलाकतों ने राज्य में हलचल पैदा कर दी थी। ओवैसी की पोल खुल चुकी थी तो जनता उनके छलावे में नहीं आयी। ममता को सत्ता से दूर रखने की ओवैसी और पीरजादा की चाल कामयाब नहीं हुई। इस बीच गंगा सागर जाने का अवसर मिला जो मैंने गंवा दिया।
कहा जाता है कि सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार। कोलकाता प्रवास के दौरान के दौरान मुझे सूचना दी गयी कि राज्य सरकार बाहर से आए पत्रकारों को गंगासागर तक ले जाना चाहती है। मुझसे कहा गया कि आप चलना चाहें तो चलिए। मौका बार-बार नहीं आता। पर जब मुझे पता चला कि वहां तक जाने के लिए जलयात्रा भी करनी पड़ती है तो भइया अपन की तो फूं सरक गयी। मना कर दिया।
मन में सोचा कि महाप्रभु जगन्नाथ का भक्त हूं। काहे यहां-वहां जाएं। यह सोचते हुए मन को समझा लिया पर घर पहुंचकर किस्सा बताया तो पत्नी को कनविंस नहीं कर सका। वह कहती रहीं तुम्हारे भाग्य में देवी देवता के दर्शन लिखे ही नहीं। महाप्रभु से मैत्री भक्ति रखता हूं। तो मन में भाव आया कि जब महाप्रभु जगन्नाथ सेट हैं तो काहे भागमभाग मचाऊं।
खैर, कोलकाता में तब आजतक चैनल की मनोज्ञा जी, इंडिया टुडे की रोमिता दत्ता दीदी, दैनिक जागरण के जेपी वाजपेयी से बराबर संवाद रखते हुए पश्चिम बंगाल की पॉलिटिकल पल्स पर नजर बनाए रखा। वहां करीब सात दिन रहा था। नया तजुर्बा लेकर लौटा।
कोरोना की दूसरी लहर ने तो झकझोर दिया। ट्रेनें कम चल रही थीं और जो चल भी रहीं थी तो बहुत कम यात्री सवार होते थे। यात्रा में भय लगता था। कहिए तो पूरे कूपे में आप अकेले ही बैठे हों। भुवनेश्वर राजधानी से कानपुर से भुवनेश्वर, भुवनेश्वर से कानपुर यात्रा जब तब हो जाया करती थी। पर दूसरा दौर बेहद भयावह था। काम के ठीहे से अपने घरों को लौटने वाले मजदूरों-पदयात्रियों साइकिल से आने वालों का हाईवे पर जत्था का जत्था निकल रहा था। कुछ तो दुर्घटनाओं का शिकार भी हुए। यह सब देखकर जी भर आता था।
मददगीरों ने भी खूब दरियादिली दिखायी। यह मंजर दिल दहलाने वाला था। बहरहाल मैं कानपुर से जब भुवनेश्वर पहुंचा तो हमारे ही दफ्तर से किसी ने नगर निगम के नगर आयुक्त को सूचित कर दिया कि कानपुर से राजधानी से महेश शर्मा संपादकीय सलाहकार आए हैं। उन्हें 14 दिन के लिए क्वारंटीन करा दीजिए। गेस्ट हाउस के मेरे ही कमरे में मुझे की क्वारंटीन, वह भी 14 दिन के लिए। सोच में पड़ गया।
हालांकि उपायुक्त मेरे संपर्क में आकर ढांढ़स बंधा रहे थे। उधर नगर निगम कर्मी कमरे के दरवाजे पर नाम तारीख आदि चस्पा कर गया था। करीब दस बजे रात को मैंने उपायुक्त महोदय को फोन किया और पूछा कानपुर वापसी कितने घंटों में कर सकता हूं। तो वह बोले, समय पर्याप्त है। कब जाएंगे। मैंने कहा, सुबह की भुवनेश्वर राजधानी से। उन्होंने कहा, जा सकते हैं।
बस फिर क्या टिकट बुक कराया और उल्टे पांव कानपुर के लिए लौटा। घर पहुंचकर जान में जान आयी। दोबारा गया पर अपना सामान लेने। समाज को बाय-बाय कह आया। मन उचटने लगा। पुराने साथी छूटने लगे थे। नया प्रबंधन भी अपने-अपने लोगों को बैठाने लग गया। कानपुर घर लौट आया। मौलिक लेखन की योजना पर काम करने लगा। लेकिन महाप्रभु जगन्नाथ के दर्शन को बार-बार जी चाह रहा था।
एक मित्र अनूप वाजपेयी का फोन आया। बोले, अपने शंभूदयाल वाजपेयी जी अमृत विचार के संपादक हैं। लखनऊ में जाकर मिल लो। बात की तो उन्होंने लखनऊ बुला लिया। बात बन गयी। 2022 में उनसे मैंने पुरी (ओडिशा) जाकर महाप्रभु जगन्नाथ जी की रथयात्रा कवरेज करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने सहर्ष अनुमति दे दी। दिव्य दर्शन हुए। कवरेज भी किया रथयात्रा का। तब तक कोरोना का असर खत्म सा था। लोगों ने वैक्सीने लगवा ली थी।
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-13) : मेरी एक रिपोर्ट से भड़के धर्मेंद्र प्रधान ने पूछा- ‘इंडिया टुडे में ओडिशा से आप लिखते हैं?’


