अपनी बात रखने या फैसले लेने में कभी भी सफल नहीं हुआ। हर चीज का माकूल समय होता है पर न जाने क्यों, कभी संकोचवश तो रिश्तों को लेकर हिचकिचाहट और गुरूरपन के चलते बात बन नहीं पाती है। फिर पछताना भी पड़ता है। फिलवक्त मुझे तल्खियाना अंदाज से जुदा बेहद नर्म लहजे और मखमल की तरह मुलामियत ख्यालात वाले मरहूम शायर जनाब मुनीर नियाजी की गजल के चंद लफ्ज याद आ रहे हैं। महफिल होती तो सामयीन इरशाद कहते हुए हौसला बढ़ाते। पर यहां तो भोर साढ़े तीन बजे पीस लिखने बैठा हूं, सो डायरेक्ट आप मुनीर नियाजी साहब की लाइनें पढ़िए।
‘हमेशा देर कर देता हूं मैं
ज़रूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
मदद करनी हो उसकी
यार का ढांढस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर
किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
बदलते मौसमों की सैर में
दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो
किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
किसी को मौत से पहले
किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ
उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं’
मुनीर साहब की ये गजल न जाने क्यों मुझे बहुत अच्छी लगती है। जब कोई कविता शेर गजल अपन की जिंदगी से मिलती-जुलती हो तो लगता है अपनी है। और तमाम मसरूफियत के बीच आप उसे गुनगुनाने लगते हैं। यानी सीधे आप रचनाकर से जुड़ जाते हैं। जिंदगी की हकीकत भी इन्हीं शेरों-शायरी, कविताओं, कहानी, उपन्यासों के बीच कहीं न कहीं गुजरती हुई आपसे जुड़ती है। आपकी खामोशी उसमें नुमाया होती है। मैं ऐसा मानता हूं। कभी भी तेजी नहीं दिखायी तो गाड़ी तो छूट ही जाएगी। अवार्ड लेने का मौका आया तो यह कहते हुए मारे ठसक के नहीं पहुंचे, ‘हुं…कोई अवार्ड लेने के लिए पत्रकारिता में थोड़े ही आए थे।
‘कमाई-धमाई के मामले में इतना संकोची कि तमाम मौके मिले कमा लो। पर नहीं सनके। साइकिल, पैदल, पब्लिक ट्रांसपोर्ट से न जाने कहां-कहां पहुंचे। किसी ने लिफ्ट दे दी उसका भला, न दी तो उसका भी भला। पत्रकारपुरम् में प्लाट फ्री में मिल रहा था वह भी लिया। मारे ठसक के कानपुर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन उपाध्यक्ष आरएन त्रिवेदी से कह दिया कि भैया जब पैसे होंगे तब ले लेंगे। यही बात लोक भारती के संपादक रमाकांत पांडे से भी कही थी। तब तो शुरुआती दिनों की बात थी। दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं। पर इस वक्तव्य के गवाह अभी भी बचे हैं।
मेरा मानना है कि जब लिख रहे हैं तो सबकुछ कैनवास पर उकेरने में नहीं चूकना चाहिए। फैसलों में लेटलतीफी, अनिर्णय की स्थिति के चलते हमेशा देर कर देता रहा जिसका खामियाजा परिवार भुगतता है। पर मन में एक संतुष्टि होती है। कोई तनाव नहीं। हालांकि, जिंदगी की कश्मकश बहुत पीड़ा देती है। जब आप कुर्सी पर नहीं होते हैं या आपकी कुर्सी बाकियों के मुकाबले थोड़ी नीची होती है तो लोगों की नजरें बदल जाना लाजिमी है। यही बात हमारे जैसा जुनूनी पत्रकार समझ नहीं पाता। इश्क में भी यह बात लागू होती है। हमेशा डेढ़ इश्किया ही होकर रह गए। याद आया गुलजार साहब डेढ़ इश्किया फिल्म के लिए क्या खूब लिखते हैं,
ना बोलूं मैं तो, कलेजा फुंके है
जो बोल दूं तो ज़बां जले है
सुलग ना जावे, अगर सुने वो
जो बात मेरी ज़बां तले है
खैर, ये तो खामखां की बीसी करने लग गया। पर यह छौंक न लगाएं तो आप काहे को पढ़ेंगे। मनोरंजन भी पत्रकारिता का हिस्सा है सो मौके बे मौके करते रहना चाहिए। अलमस्त पत्रकार ययावरी पसंद होता है। अड्डेबाजी उसका शौक होता है। शुरुआती दिनों में प्रमोद तिवारी का साथ और अड्डेबाजी न हो। पन्ना छूटा, छुट्टी पायी, दोस्त गेटपर इंतजार कर रहे हैं जिनमें कवि, पत्रकार ही होते थे। पत्रकारों में धीरेंद्र अवस्थी, लोकेश शुक्ला, राजीव सचान, कमल सक्सेना, अनूप वाजपेयी, राजेश द्विवेदी, रोमी अरोड़ा (माते), ईशान अवस्थी आदि तो कवियों में राजेश अरोड़ा, सत्यप्रकाश शर्मा, राजेंद्र शुक्ला बापू, कृष्णानंद चौबे आदि। कभी मेडिकल कालेज वाली सड़क के डिवाइटर पर बैठे हैं, थोड़ी दूर पर जूनियर डाक्टरों का जमावड़ा, तो कभी रावतपुर स्टेशन के सामने, अनवरगंज स्टेशन वाला पार्क, जरीब चौकी वाला 24×7 चाय की ठिलिया। और ज्यादातर सेंट्रल स्टेशन यानी घंटाघर चौराहा।
कभी कभार जय सियाराम या नीलम होटल की मिस्सी रोटी और दाल, वहीं पर मिल जाते थे सतींद्र वाजपेयी, अंबरीश शुक्ला। आज वालों की टीम मिल गयी तो बवाल होने की संभावना बढ़ जाती थी। हम उस गैरपत्रकारीय जमात की चर्चा करना जरूरी समझता हूं जो हमारा संबल रही है।
कहीं न कहीं हौसलाआफजायी में आगे-आगे आ जाती थी। कुछ साथियों की मुफलिसी उन्हें पता होती थी पर मजाल है कि मदद की शाइस्तगी से कह जाते थे पर हमारे साथियों किसी के आगे कभी भी हाथ नहीं पसारा। विष्णु जी की तरह भौहैं तनी रहती थी। यानी एक पर्याप्त दूरी बनाकर चलते थे। न जाने कितनी बार स्कूटर झुकाकर स्टार्ट करके ऑफिस पहुंच जाते थे। किकिया किकियाकर हार जाते थे तो कोई साथी कह उठता था, अबे पेट्रोल सुंघाव स्कूटर को। तो उसे झुका लेते थे। अनवर जलालपुरी साहब का शेर भी याद आ जाता था।
‘कोई रुसवा तो कोई मोतबर होता रही रहता है
यहां ये खेल प्यारे उम्र भर होता ही रहता है
ये दुनिया है यहां तुम हादसों से दोस्ती कर लो
के हर लम्हा यहां जेरो-जबर होता ही रहता है
अगर गैरत सलामत है तो गुरबत के भी आलम में
बड़ी इज्जत से मुफलिस का गुजर होता ही रहता है’
हमारे खयालों में मियां अनवर जलालपुरी आखिरी शेर में भीतर का हौसला बढ़ाकर धीमे से किसी मुशायरे की निजामत के लिए निकल लेते थे। हम उन्हें शुक्रिया कहकर आगे बढ़ जाते थे। हमारे राजनीतिक मित्र चौधरी सुखराम सिंह यादव विधानपरिषद के उपाध्यक्ष हुआ करते थे। लोकसभा अध्यक्ष दादा सोमनाथ चटर्जी का उनके गांव मेहरबान सिंहा का पुरवा आना हुआ। सुखराम ने हमसे कहा, महेश तुम्हारा सम्मान कराने का मन है। एक अवार्ड स्पांसर्ड कर देते हैं। कार्यक्रम हुआ और सुखराम भाई इंतजार करते रहे, मैं गया ही नहीं। बाद में पछतावा हुआ और सुखराम की नाराजगी भी झेलनी पड़ी। खैर उन्हें तो मना लिया पर मौका निकल चुका था।
केसी कुलिश अवार्ड में भी यही हुआ रिपोर्ट्स की कतरने ही सबमिट नहीं किए। लेकिन देरी और लापरवाही मेरे काम में कभी नहीं झलकी। उन दिनों वीआईपी ट्रेनों से आया-जाया करते थे। तो मीडिया मंडी में प्रतिस्पर्धा का दौर था। दैनिक जागरण पहले से ही था। आज पेपर आया। 10-12 साल बाद स्वतंत्र भारत आया पीछे से अमर उजाला भी आ गया। नौकरी के मौके खुले पर मेहनत और कड़ी हो गयी। तनख्वाह तो बस पूछो मत। लेकिन जुनून सिर पर सवार रहता था। रोज समीक्षा। लेट नाइट वीआईपी कवरेज में स्टेशन तो अक्सर कभी-कभी सर्किट हाउस भी जाना पड़ता था।
राजीव गांधी, वीपी सिंह, जितेंद्र प्रसाद, अजीत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, अटल जी, मुलायम सिंह यादव आदि सबका आना हुआ करता था। तो कवरेज की तीव्रता भी रहती थी। एक बार तो वीपी सिंह को सुबह छह बजे ट्रेन से गुजरना था। यहां चार बजे तक अनवरगंज स्टेशन वाले पार्क पर अड्डा लगा था। चीफ रिपोर्टर प्रमोद तिवारी बोले, वीपी सिंह कौन कवर करेगा। मैंने हाथ उठा दिया। वह बोले, जाओ। मीटिंग में न आना। सो जाना लेकिन शाम तक आ जाना, मामा (प्रमोद मुझे मामा कहते थे) नहीं तो मेरी भी गयी और तुम्हारी भी। मजीरा जैसी आंखे दिखाते हुए मोहन बाबू (नरेंद्र मोहन) चाबुक चलाकर प्राण लेंगे। एक-एक चाय का दौर और चला और ये लोग घरों को और मैं स्टेशन की ओर निकल गया। देखा कि रमेश वर्मा समेत कुछेक पत्रकार नहा-धोकर पहुंचे थे। मैं चिपरी चिपरी आंखे लिए जा पहुंचा। वर्मा जी तब आज में चले गए थे।
अर्जुन अरोड़ा की शागिर्दी में ज्ञान जागा
बात बहुत पुरानी है। पर कहा जाता है कि ज्ञानी गुणी की सोहबत भर से ज्ञान का संचार होने लगता है। यह बराबर सही है। शायद इमरजेंसी के दौरान की बात होगी। हाईस्कूल का छात्र था। मेरे पिता बाबू राम विलास शर्मा मुझे श्रमिक नेता, राज्यसभा सांसद रहे श्रम मामलों के विद्वान अर्जुन अरोड़ा के घर पांडुनगर ले गए। वहीं पर गणेश शंकर विद्यार्थी इंटर कालेज में पढ़ता था। विद्यार्थी जी की मूर्ति का अनावरण करने तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी कालेज आई थीं। प्रदेश अध्यक्ष चतुर्भुज शर्मा भी थे।
कालेज के प्रबंधक राधाकृष्ण अवस्थी ने आयोजन किया था। हाईस्कूल पास हुआ तो आगे कहां पढ़ूंगा, यह बाबू नहीं अर्जुन अरोड़ा जी तय करते थे। मैं उनकी सिगरेट (गोल्डफ्लेक) खरीदने जाता था। तब शायद पांच रुपये की डिब्बी आती थी। चौराहे पर पकड़ू पान वाला रखता था। अरोड़ा जी के यहां आए दिन मीटिंगें तो कहीं क्षेत्रीय श्रम संस्थान में सेमिनार आदि हुआ करते थे जिनमें वह जाते थे। मैं भी साइकिल से पहुंच जाता था। अक्सर वह मुझे किचन की जिम्मेदारी देते हुए समय पर चाय नाश्ता भिजवाने आदि का काम लेते थे। मैं पास होकर इंटर मीडिएट के लिए बीएनएसडी इंटर कालेज में दाखिला ले लिया था। चाचा तारकनाथ मिश्रा की सिफारिश पर कालेज के लिपिक वासुदेव मिश्रा चाचा ने प्रवेश दिला दिया था। पढ़ने, रेडियो पर न्यूज सुनने आदि का चस्का शुरू हो चुका था।
उधर अरोड़ा जी के यहां आने वाले श्रम आंदोलन से जुड़े तमाम नेता आया करते थे। कांग्रेस का बोलबाला था। अर्जुन अरोड़ा, विमल मेहरोत्रा, राधाकृष्ण अवस्थी, चंद्रिका प्रसाद वैद्य आदि में मेलजोल था तो कतरब्यौंत भी खूब हुआ करती थी। इस दौरान प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी पर सम्मेलन, यूनियन की बैठकें, अरोड़ा जी की संस्था थी सोसायटी फॉर डेवलेपमेंट ऑफ उत्तर प्रदेश की बैठकें अरोड़ा जी के निवास पर ही हुआ करती थी। मुझे इंतजाम के लिए बुला लिया जाता था। मुझे बहुत अच्छा लगता था। जानकारी प्राप्त करने के साथ ही बढ़िया पकवानों से पेट की भूख भी शांत हो जाया करती थी।
इधर मैंने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। राधेश्याम जिला क्रिकेट लीग में मेरी टीम खेलती थी। मैं भी हिस्सा लेता था। इंटर मीडिएट पास हुआ तो अर्जुल अरोड़ा जी के पैर छूने उनके बंगले पहुंचा। गौरवर्ण, लंबी कदकाठी ब्लैक कलर का पाइप पीते हुए आकर्षक दिखने वाले अरोड़ा जी का व्यक्तित्व वाकई बेमिसाल था। ट्रेड यूनियन आंदोलन की बारीकियां काफी सीखने का मौका मिला जो श्रम और उद्योग की बीट पर रिपोर्टिंग के काम आया। रिजल्ट देखकर उन्होंने पूछा महेश अब कहां पढ़ोगे? मैंने कहा क्राइस्ट चर्च में। वह बोले क्यों, मैं चुप। वह बोले, इसलिए कि वहां लड़कियां पढ़ती हैं। इतना कहकर वह पाइप में तंबाकू भरकर जलाते हुए मेरी ओर देखने लगे। मैं सिर नीचे किए चुप रहा। उन्होंने नाइनन अब्राहम (प्रिंसिपल क्राइस्ट चर्च) को चिट्ठी लिखी। और मुझे भेज दिया। मुझे बीए में प्रवेश मिल गया।
इस बीच गर्मी की छुट्टियों में कानपुर उत्पादकता परिषद में दो महीने के लिए (लीव वैकेंसी पर) नौकरी भी लगवा दी थी। तो ढाई सौ रुपया मिल जाता था। बहुत था। दिवाली में पटाखों की दुकान लगाकर पांच सौ कमा लेता था। बाद में मैगजीन और अंग्रेजी उपन्यास का स्टाल एवन मार्केट काकादेव में शाम को नियमित लगाता था। कम्पटीशन में शर्माजी और बब्बू भाटिया मैगजीन वाले थे। पढ़ने का चस्का बढ़ता गया। एएनडी महिला महाविद्यालय में डॉ. हेमलता स्वरूप के संपर्क में आने से लायब्रेरी से किताबें आदि पढ़ने के लिए मिल जाती थी। ग्रेजुएशन पास होते-होते हिंदी के साथ ही बांग्ला, रूसी (सोवियत रूस), ब्रिटिश लेखकों के अनूदित पुस्तकें पढ़ डालीं।
अरोड़ाजी ने एक बार पूछा, महेश नौकरी करोगे? मैनें कहा, हां। वह बोले, कहां? मैने कहा, आईईएल (डंकन जो आजकल जेपी की कानपुर फर्टिलाइजर एवं सीमेंट कारखाना है) में। बोले, क्यों? मैने कहा कि वहां पर कैंटीन में खाना अच्छा और बहुत सस्ता मिलता है। जैसे आठ आने में ऑमलेट ब्रेड। उन्होंने मेरे ही सामने आईईएल के डिवीजनल पर्सोनल मैनेजर बीपी सिंह को फोन लगाकर मुझे एपरेंटिस पर रखने को कहा। उधर से उन्हें बताया गया कि वह बाहर हैं तीन दिन बाद लौटेंगे। यह बात अरोड़ा जी ने मुझे बता दी थी। दूसरे दिन उन्हें लखनऊ जाना था। वापसी में उनका भीषण एक्सीडेंट हो गया। उन्हें हैलट के प्राइवेट वीआईपी वार्ड जिसे तब निगम वार्ड ब्लाक-50 कहा जाता था, में रखा गया। उन्हें देखने वालों की भीड़ लगी थी। लोग बारी-बारी से आ जा रहे थे। वह नीम बेहोशी में थे।
शरीर में प्लास्टर, पट्टियां बंधी थीं। मैने बाहर से झांककर देखा। बहुत दुखी हुआ और एक कोने में जाकर सिसक-सिसककर रोने लगा। एक्सीडेंट न हुआ होता तो मैं पत्रकारिता के बजाय आईईएल में नौकरी कर रहा होता।
शौचालय में चिंतन और प्रतिभा
कहा जाता है कि नए-नए आइडियाज तो शौचालय में ही आते हैं। लोग कहते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के शौचालय में लायब्रेरी थी। अखबार लेकर वह खुद जाते। नेशनल, इंटरनेशनल और भारत की प्रगति के नायाब आइडिया उन्हें वहीं मिलता था। यह पीस लिखने के दौरान मैं जब शौचालय गया तो मुनीर नियाजी साहब की वही गजल याद आ गयी, हमेशा देर कर देता हूं मैं..। फ्लैश बैक में चला गया तो विवाह के लिए लड़की देखने का वाकया याद आ गया। उस दिन देर हो जाती तो मेरी जिंदगी में नायाब पत्नी प्रतिभा शर्मा न आती।
किस्सा कुछ यूं था कि जिस दिन मुझे भावी श्रीमती जी को देखने ट्रैफिक पुलिस लाइन जाना था उसी दिन मेरा एक मैच पड़ गया। घर में बिना बताए मैं मैच खेलने निकल गया। हमारे विवाह के बिचवानी हीरालाल चाचा घर आ गए। मित्र दीपकराज गुप्ता भी आ गया। उसे पता था मैच कहां पर हो रहा है। मैं डीप फाइन लेग पर फील्डिंग कर रहा था। तभी मेरे कानों में कर्कश स्वर पड़ा, महेश। पलटकर देखा तो हीरा चाचा और दीपक लैंब्रेटा स्कूटर लिए किनारे खड़े हैं। बोले, कोर्ट साहब (ससुरजी एसपीओ थे) के यहां चलना है, लड़की देखने।
मन ही मन लड्डू फूटने लगे। ओवर हुआ तो कैप्टन को पूरी बात बताई। उन्होंने सब्स्टीट्यूट फील्डर लेकर मुझे छोड़ दिया। साथ ही एक कोट दिलाया क्योंकि मैं तो किट में था। यहां देर हो जाती तो प्रतिभा जैसी जिम्मेदार घर-गृहस्थी संभालने वाली जीवनसाथी कहां मिलती। वह मुझे अपना तीसरा बच्चा मानते हुए मेरा ख्याल रखती थी और अब भी रखती है। हां, गुस्सा नाक पर रहता है पर दिल की बहुत ही अच्छी महिला है मेरी पत्नी। फिर मुनीर साहब की लाइन याद आ गयी। हमेशा देर कर देता हूं मैं। पर यहां नहीं की।


