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उत्तर प्रदेश

मृत्युंजय कुमार को संपादक रहते एक ब्राह्मण ने बता दिया था- ‘तेरी कुंडली में तो राजयोग है बेटा!’

यशवंत सिंह-

मृत्युंजय कुमार जी अमर उजाला गोरखपुर के संपादक हुआ करते थे। अख़बार के लिये एक स्टोरी कराने के सिलसिले में पता चला इन्हें कि कुशीनगर ज़िले के एक गाँव में रावण संहिता के एक नामी विद्वान ब्राह्मण रहते हैं जो लोगों का भविष्य बता देते हैं। उत्सुकतावश वे पहुँच गये ख़ुद की भी कुंडली दिखाने।

जब मृत्युंजय जी को बताया गया कि आप की कुंडली में राजयोग है तो इन्होंने सिर पकड़ लिया! दूर-दूर तक उन्हें किसी क़िस्म के राजयोग की झीनी-भीनी रोशनी से लैस किसी किरण का कोई एक कण तक नहीं दिख रहा था।

लेकिन विद्वान ब्राह्मण महोदय राजपद वाले अपने लिखे श्लोक पर अड़े रहे जो रावण संहिता के माध्यम से इनकी कुंडली देख कर काग़ज़ों पर अंकित कर दिया था।

मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार मृत्युंजय जी से जब भी मिलता हूँ तो ये राजयोग वाली कहानी ज़रूर सुनता हूँ। अबकी बताये कि वो पंडी जी अब भी जीवित हैं और उनके संपर्क में हैं। उनकी असंभव सी लगने वाली बात सच साबित हुई, ये एहसास जब जब ताज़ा होता है, ज़ेहन में आता है तो ये संकेत मिलता है कि दुनिया /ब्रह्माण्ड अब भी रहस्य की बहुत सी परतों से घिरी हुई है जिसके प्रति हम अबूझ हैं।

लगता है कभी कभी सब पूर्वनियोजित है, हम कठपुतलियाँ मनुष्य बस अपना अपना किरदार अदा कर रही हैं।

अबकी उसी रावण संहिता वाले विद्वान ब्राह्मण से ख़ुद की कुंडली दिखाने का तय किया हूँ कि क्या अपने हिस्से में केवल बवाल योग और संन्यास योग ही लिखा है या कुछ एलीट टाइप योग की भी गुंजाइश है! हाँ देख दिखा कर फ्यूचर प्लानिंग उसी हिसाब से पक्का किया जाये कि लखनऊ रहा जाए या हरिद्वार निकल लिया जाये!

दो मित्रों के कुछ छोटे मोटे जेन्युइन काम थे तो इनको साथ लेकर लोकभवन वाले सत्ता के गलियारे में घुसा। मृत्युंजय जी ने दोनों लोगों का न सिर्फ़ संकट-हरण किया बल्कि एक-एक किताब अपनी तरफ़ से भेंट कर हंसते हँसाते विदा किया!

मैंने ख़ुद के ख़िलाफ़ जालौन के एक थाने में दर्ज फ़र्ज़ी मुक़दमे को ख़त्म कराने के लिए समुचित प्रयास करने पर धन्यवाद ज्ञापित किया!

इस मौक़े पर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अनिल कुमार भाई भी साथ लगातार बने हुए थे। राहों से अनजान अपन लोगों को सत्ता के गलियारे में ले जाने और फिर सकुशल बाहर निकाल लाने में इनका योगदान याद करेगा हिंदुस्तान! अनिल जी व्यंग्यकार हैं तो इनके ज़िक्र में कोई न कोई छंद लय ताल अलंकार आना ही चाहिए न। जै जै

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से

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