सरकार को प्रदूषण कम करने के लिए ईवी की जरूरत लग रही है और स्थिति पराली जलाना न रोक पाने की है। इसी तरह आज अखबारों में जो खबरें है उनमें हरियाणा चुनाव की खबरों की जरूरत नहीं हैं। फिर भी द हिन्दू को छोड़कर सबका पहला पन्ना विज्ञापनों से भरा हुआ है। सबसे कम विज्ञापन आज अमर उजाला में है। सबसे ज्यादा इंडियन एक्सप्रेस में।

संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला और हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है, पराली जलाना फिर क्यों शुरू हो गया। आप जानते हैं कि खेतों में पराली जलाने से धुआँ होता है और इससे दिल्ली में भी प्रदूषण होता है। न्याय मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के हवाले से सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि सीएक्यूएम (कमिशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट) से इसपर स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिये। दिल्ली में प्रदूषण और पराली की समस्या नई नहीं हैं। आप जानते हैं कि कल ही नवोदय टाइम्स में खबर थी, “प्रदूषण घटाना है तो ईवी (इलेक्ट्रीक व्हेकिल या वाहन) अपनाना होगा”। यह भी कि ऐसा पीएमओ की बैठक में कहा गया था। प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तरह-तरह के कानून बनाये गये हैं। गाड़ियों में महंगे और शीशा रहित पेट्रोल से लेकर डीजल वाहनों और इंजन पर प्रतिबंध तथा दिल्ली में ऑड-इवन जैसे प्रयोग किये जाते रहे हैं। यह सब तब जब 15 साल से पुरानी गाड़ियों को चलने की अनुमति नहीं है। आम जनता के लिए यह सब बेहद महंगी मजबूरी है। दूसरी ओर प्रदूषण बोर्ड में आधे से ज्यादा पद खाली हैं। अब पता चल रहा है कि पराली जलाना भी नहीं रोका जा सका है। कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि प्रदूषण के मूल कारण को रोके बगैर प्रधानमंत्री कार्यालय ईवी की जरूरत के लिए काम कर रहा है। इस काम में भारी बेरोजगारी के बावजूद पद खाली होने पर किसी का ध्यान नहीं है। यह प्रदूषण के मामले में सरकार के काम और प्राथमिकता का मामला है।
दूसरा मामला तिरुपति मंदिर के लड्डू में मिलावट का है। आप जानते हैं कि मिलावट लड्डू में नहीं, घी में था और उसे बाहरी चर्बी के रूप में पेश किया गया। लेकिन यह भी सच है कि पूजा के लिए सस्ता घी मिलता है और उसका उपयोग होता है। ऐसे में जरूरी नहीं है कि घी में मिलावट मांसाहार ही हो। और यह वह हो सकता है जो पूजा के घी में सस्ता करने के लिए मिलाया जाता है। ऐसे में यह मुद्दा प्रसाद में जानवर की चर्बी या बाहर की चर्बी का नहीं भी हो सकता है। कई और मामले हैं जिससे लगता है कि विवाद और प्रचार का मकसद राजनीतिक हो सकता है। इसका पता इससे भी चलता है कि लड्डुओं की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है। नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार, खुलासे के बाद लड्डू की बिक्री में कमी नहीं आई है और लोगों की आस्था अटूट है। अब कहा जा सकता है कि यह ऐसा मामला था जिसमें श्रद्धालुओं की दिलचस्पी नहीं थी और विवाद को खूब हवा देने के बावजूद लड्डुओं की बिक्री जारी रही।
आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में भी चुनाव होने हैं और एक पार्टी वोटों के लिए इस तरह के विवादों में भरोसा करती है। बहुत सारे लोगों की मानसिकता यह हो गई (या बना दी गई) है कि कांग्रेस हिन्दू विरोधी है और हिन्दुओं का ख्याल भाजपा शासन में ही रखा जाता है। इसलिए तिरुपति विवाद के साथ ही आज मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर के प्रसाद के पैकेट के क्रेट में चूहे के वीडियो की खबर आ गई है। अब इसे लेकर विवाद शुरू है और मामले की जांच की तैयारी चल रही है। इस संबंध में कहा जा चुका है कि सेबी अध्यक्ष के घोटालों की जांच से ज्यादा जरूरी मंदिर के प्रसाद बनाने के लिए खरीदे जाने वाले घी में मिलावट का मामला हो गया है और इसके आगे कोई दूसरा मामला टिक ही नहीं रहा ह। लड्डू बनाने में घी के इस्तेमाल का मामला इतना ही गंभीर है तो बाजार में उपलब्ध घी की गुणवत्ता भी मुद्दा होना चाहिये और जैसा मैंने कल लिखा था कि अब यह एफएसएसएआई की जांच का विषय नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की जिम्मेदारी है कि हर दिन, पूरे साल बाजार में बगैर मिलावटी मान्यता प्राप्त घी ही मिले। पर अब उसी को जांच का काम सौंप दिया गया जबकि जांच उसके खिलाफ होनी चाहिये कि उसके रहते बाजार में मिलावटी घी कैसे बिक रहा था या मंदिर ने कैसे खरीद लिया।
अब यह स्पष्ट है कि घी में मिलावट का मामला एफएसएसएआई की जिम्मेदारी और मौजूदगी के बावजूद हुआ है और कथित मिलावटी घी में बना लड्डू प्रसाद के रूप में उपयोग किया गया तो जांच का काम एफएसएसएआई को सौंप दिया गया है। इसी तरह, आज यह खबर है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया पर जमीन घोटाले का मुकदमा चलेगा। हाईकोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल के आदेश को बरकरार रखा है जो उन्होंने विपक्ष के मुख्यमंत्री के खिलाफ दिये थे। आप जानते हैं कि राज्यपाल भाजपा के मुख्यमंत्री (यों) के खिलाफ जांच के आदेश नहीं देते हैं और ऐसे मुख्यमंत्रियों को हाईकोर्ट से राहत भी नहीं मिलती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के मामले में यह सब हमने हाल में देखा है। इसके अलावा, हाल में (21 सितंबर को) एक खबर थी कि ईडी ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में बीजेपी नेता और पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्र को बरी कर दिया है। ईडी ने क्लीन चिट दी। तथ्य यह है कि रंगनाथ मिश्र बसपा में थे 18 जनवरी 2020 को ईडी ने उनकी पाच करोड़ की संपति जब्त की थी। 29 जनवरी 2022 को खबर थी कि बसपा सरकार में मंत्री रहे रंगनाथ मिश्र कई समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गये थे। यह संयोग हो या प्रयोग, खुलकर हो रहा है। रोकने की जरूरत किसी को लगती है ऐसा खबरों से नहीं दिख रहा है।
इसी तरह नीट और एनटीए का मामला आप जानते हैं। परीक्षा में गड़बड़ी, विवाद, छात्रों की आत्महत्या आदि के बीच स्थिति को सुधारने, परेशानी कम करने या परीक्षा की पवित्रता को बनाये रखने के लिए कुछ हुआ हो या नहीं, आज खबर है, मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटा धोखाधड़ी है और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, यह बंद हो। जब पूरी परीक्षा ही गड़बड़ होने का आरोप है, नतीजे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बदले और सुधारे गये हैं। महीनों यह आशंका बनी रही कि परीक्षा रद्द हो जायेगी और नहीं हुई तब कुछ आरक्षण से कितना फर्क पड़ना है। परीक्षा को दुरुस्त करने की मांग की गई हो या नहीं कोटा बंद करने का आदेश आ गया है। अमर उजाला में यह खबर सेकेंड लीड है। द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर है। अमर उजाला में छपी खबर का उपशीर्षक है, पंजाब सरकार का कोटे की परिभाषा में बदलाव सिर्फ पैसा कमाने की चाल। इसके साथ एक शीर्षक है, पंजाब सरकार ने यूपी व हिमाचल का दिया हवाला। शीर्षक से यह खबर सिर्फ पंजाब की लग रही है लेकिन दूसरी खबरों से लग रहा है कि मामला दूसरे राज्यों से भी जुड़ सकता है।
इन सभी खबरों के बीच आज जिस खबर से सरकार की प्राथमिकता का पता चलता है वह है उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश। इसे खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए जारी किये गये निर्देश के रूप में पेश किया गया है (इंडियन एक्सप्रेस)। मुख्य शीर्षक है, “सभी रेस्त्रां / ढाबा में मालिकों का नाम प्रदर्शित करना होगा : योगी। इसके साथ एक्सप्लेन्ड में बताया गया है कि सर्वोच्च अदालत ने क्या कहा था, ….सक्षम अधिकारी आहार सुरक्षा अधिनियम के तहत ऐसे आदेश जारी कर सकते हैं और यह अधिकार पुलिस अपने हाथ में नहीं ले सकती है। आप जानते हैं कि इसकी ना तो जरूरत है और ना मांग फिर भी कांवर के समय इसे क्यों लागू किया गया था और सुप्रीम कोर्ट के स्टे कर देने के बाद अब विधिवत लागू कर दिया गया है। आज कई अखबारों में यह खबर प्रमुखता से है।
यहां यह बताना जरूरी है कि हरियाणा और कश्मीर में चुनाव हैं। कश्मीर में आज दूसरे चरण का मतदान है लेकिन पहले पन्ने पर खबरें नहीं के बराबर है। नवोदय टाइम्स में, “दूसरे चरण का मतदान आज” शीर्षक से एक छोटी सी खबर है। दूसरी ओर कोलकाता के अंग्रेजी अखबार, द टेलीग्राफ में हरियाणा चुनाव की खबर लीड है। शीर्षक है, विनेश का फोकस रोजगार और झूठी लड़ाई पर। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, अग्निवीर और अन्याय पर गुस्से के कारण फायदे में हैं पहलवान। कहने की जरूरत नहीं है कि हरियाणा चुनाव से संबंधित खबरें हैं पर अखबारों में नहीं दिख रही हैं तो उसका कारण है और वह कारण बताने की जरूरत नहीं है। अब लोग समझते हैं।




Pramod Pandey
September 25, 2024 at 5:19 pm
एक लाइन लेनी है और उसी पर समीक्षा करनी है। हकीकत चाहे जो हो…धन्य हैं ऐसे समीक्षक और ऐसी समीक्षा।