
संजय कुमार सिंह
आज मेरे सात में से दो अखबारों में कल के कश्मीर चुनाव में मतदान से संबंधित खबर लीड है। कल मैंने लिखा था, आज के अखबारों की खबरें बताती हैं, संपादकों की प्राथमिकता जनता की जरूरतों से बहुत अलग है। इस पर एक पाठक ने लिखा है, एक लाइन लेनी है और उसी पर समीक्षा करनी है। हकीकत चाहे जो हो…धन्य हैं ऐसे समीक्षक और ऐसी समीक्षा। मौका मिला है तो बता दूं, मेरी लाइन यही है कि अखबारों को पाठकों और समाज की जरूरत के अनुकूल होना चाहिये। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा पाया माना गया है तो चारों पाये अलग-अलग मजबूत होने चाहिये। पर चारों को मिलाकर एक मजबूत पाया बनाने की कोशिश चल रही है और इसे उजागर करने का काम मीडिया का है पर वह ऐसा नहीं कर रहा है। मेरी कोशिश इसी को रेखांकित करने की है। जरूरी नहीं है कि हर कोई सहमत हो। मुझे लगता है कि कश्मीर में बहुचर्चित अनुच्छेद 370 हटाने की बहुप्रचारित कार्रवाई के पांच साल और वैसे दस साल बाद हो रहे चुनाव महत्वपूर्ण हैं और कोई भी इससे संबंधित खबरें जानना चाहेगा न कि सिर्फ नतीजे। कल मैंने बताया था कि दो ही अखबारों में पहले पन्ने पर कल मतदान की खबर थी।
आज दो अखबारों, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में लीड है और सबसे बड़ी बात है कि श्रीनगर में बमुश्किल 30 प्रतिशत मतदान हुआ है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बहुत कम है और इससे पता चलता है कि नोटबंदी से कालाधन खत्म होने (बाद में आतंकवाद और वेश्यावृत्ति भी) और अनुच्छेद 370 हटाने से हो सकने वाले न्याय या लाभ के भाजपाई प्रचार का सच क्या था। भाजपा को इससे देश भर में चाहे जो चुनावी लाभ मिला हो कश्मीर को कोई लाभ नहीं हुआ है। हुआ भी हो तो प्रचार नहीं है। अव्वल तो भाजपा राज्य के बड़े इलाके में चुनाव लड़ने की स्थिति में भी नहीं है और शायद इसीलिए यह कई संपादकों के लिए पहले पन्ने की खबर नहीं है। श्रीनगर में ही मतदान कम होने से कल हुए मतदान का औसत कम है और पहले अखबार ने इसे 56 तथा दूसरे ने 57 प्रतिशत बताया है जो गिनती के समय बढ़ भी जाता रहा है। उसकी कहानी अलग है। और तीसरी बार की बैसाखी इसी दम पर है पर वह सब अलग मुद्दा है। जहां तक कश्मीर में मतदान की बात है, रेइसी में 74.7 और पुंछ में 73.8 प्रतिशत पहले के मुकाबले ज्यादा है और इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। पर यह बाद की बात है। फिलहाल श्रीनगर में बमुश्किल 30 प्रतिशत मतदान बड़ी खबर है।
आज की दूसरी बड़ी लीड इंडियन एक्सप्रेस की है। यह कश्मीर को बांट कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने (और उसकी जरूरत) से संबंधित हो सकती है। शीर्षक है, “पूर्वी लद्दाख में एलएसी से संबंधित लंबित मुद्दों पर भारत और चीन ने ‘प्रगति’ की”। इसके तहत दो कॉलम की दो खबरों के दो शीर्षक हैं। पहला शीर्षक है, “दोनों पक्ष ऐसे समाधान तलाश रहे हैं जो टकराव से पहले की स्थितियों का ख्याल रखें जिससे अरुणांचल से संबंधित मामले निपटाये जा सकें”। दूसरी खबर का शीर्षक विदेश मंत्री जयशंकर के हवाले से है। उन्होंने कहा है, टकराव खत्म होना समस्या का एक भाग है, मुख्य मुद्दा पैट्रोलिंग का है। यह सब एक फ्लैग शीर्षक के तहत है जो हिन्दी में इस प्रकार होगा – पुनर्तैनाती की शर्तें सैनिक वार्ता के अगले दौर के बाद संभव है। पांच कॉलम का यह लीड कश्मीर में दूसरे चरण के मतदान की खबर के साथ है। छोटी सी खबर फोटो के साथ है जिसका शीर्षक है, जम्मू कश्मीर में दूसरे चरण का मतदान कम हुआ 57 प्रतिशत। अखबार के अनुसार पहले चरण में यह 61 प्रतिशत था। लोकसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत पहले से ज्यादा रहने पर प्रधानमंत्री ने दुनिया को संदेश दिया था और कश्मीर के लोगों की तारीफ की थी। विधान सभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि ज्यादा मतदान नये कश्मीर का सबूत है। अब श्रीनगर में कम मतदान ने पूरे राज्य में मतदान के प्रतिशत का औसत खराब कर दिया है। सोचने का विषय तो है ही।
आज इंडियन एक्सप्रेस की सेकेंड लीड एक्सप्रेस की पड़ताल है। इसके अनुसार कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में एक डॉक्टर से बलात्कार और हत्या के बाद चल रही सीबीआई जांच में पता चला है कि जिस फर्म ने 44 महीनों तक मेडिकल वेस्ट (कूड़ा या अपशिष्ट) का काम किया उसके पास इसके उपचार का प्लांट नहीं है। यही नहीं पिछले करार की शर्तों का उल्लंघन करने के बावजूद इस कंपनी या फर्म को फिर से अपशिष्ट निपटान का ठेका मिल गया। निश्चित रूप से यह भ्रष्टाचार का गंभीर मामला है पर इसका पता सीबीआई ने लगाया है जिसे बलात्कार और हत्या के मामले की जांच करनी है। अगर यह भ्रष्टाचार का मामला है तो चार साल से ज्यादा समय चलता रहा है और केंद्र सरकार, “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” के प्रधानमंत्री के वादे के बावजूद इसका पता नहीं लगा पाई। इस बीच विधानसभा औऱ लोकसभा के भी चुनाव हुए हैं और भाजपा ने राज्य में तृणमूल कांग्रेस को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी तब भी इसका पता नहीं चला। ऐसे में यह मामला कितना सही है वह अपने आप में संदिग्ध है। उसपर तुर्रा यह कि सीबीआई को अब पता चला और इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी पड़ताल के रूप में अब सेकेंड लीड के रूप में छापा है। यही नहीं, इसके साथ एक फाइल फोटो भी है, कोलकाता में हेल्थकेयर सिंडिकेट के खिलाफ एक प्रदर्शन में (स्थिति)।
वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने एक्स पर पूछा है, क्या डॉक्टर की हत्या और रेप इसलिए हो गया कि अस्पताल के वेस्ट मैनेजमेंट में घोटाला था? …ऐसा भ्रष्टाचार भारत के किस अस्पताल में नहीं मिलेगा? आंदोलनकारी डाक्टर सीबीआई से कब सवाल पूछेंगे? क्या वो सीबीआई की जांच से संतुष्ट हैं? दरअसल ये आंदोलनकारी सीबीआई से कभी भी सवाल नहीं पूछेंगे क्योंकि सीबीआई मोदी सरकार की है और इन्हें ममता बनर्जी का इस्तीफा चाहिये। ये दिखावटी आंदोलनकारी उत्तर प्रदेश, उड़ीशा या मध्यप्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे भी नहीं मांगेंगे जहां आरजी कर अस्पताल की घटना के बाद पर हत्या, रेप और छेड़छाड़ की गंभीर घटनाएं हुई हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने आज पहले पन्ने की अपनी तीसरी खबर से बताया है कि जम्मू में भाजपा की व्यवस्था अब ठीक है, कांग्रेस शुरुआती फायदे के बाद अब फंस गई है। अमर उजाला में ऐसी ही खबर का फ्लैग शीर्षक है, अमेरिका से लौटते ही कांग्रेस पर बरसे पीएम…. राहुल को भाजपा ने घेरा।
इसके साथ नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी की खबर है। राहुल ने कहा है, कश्मीर को राज्य के दर्जे के लिए पूरी ताकत लगाएंगे। यह खबर नवोदय टाइम्स में भी सेकेंड लीड है और टॉप पर दो कॉलम में छपी है। शीर्षक है, पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कराने को सड़कों पर उतरेगा इंडिया। नरेन्द्र मोदी के पास इसके जवाब में क्या है या कश्मीर में स्थिति कैसे मजबूत हुई है यह इंडियन एक्सप्रेस की खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर है उसमें नहीं बताया गया है। दूसरी ओर हरियाणा में उन्होंने जो कहा उससे भी नहीं लगता है कि वोट मांगने के लिए उनके पास कुछ नया है। अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, “कांग्रेस का शाही परिवार सबसे भ्रष्ट, दलालों और दामादों के हवाले किया हरियाणा : मोदी”। हरियाणा में प्रधानमंत्री का चुनाव प्रचार नवोदय टाइम्स की लीड है। अखबार ने लिखा है, गोहाना में पार्टी की चुनाव रैली में गरजे प्रधानमंत्री (उपशीर्षक)। मुख्य शीर्षक है, “कांग्रेस सत्ता में आई तो हरियाणा को बर्बाद कर देगी पीएम : मोदी”।
इसपर मुझे याद आया कि ऐसा ही कुछ अमित शाह ने कर्नाटक चुनाव से पहले कहा था। पुरानी खबरों के अनुसार, 25 अप्रैल 2023 का एक शीर्षक है, ‘गलती से भी कांग्रेस आई तो पूरा कर्नाटक दंगे से ग्रस्त हो जाएगा’। एक साल से ज्यादा हो गया कर्नाटक में दंगे की खबर नहीं है, मणिपुर की हिन्सा रुकी नहीं है और कर्नाटक की निर्वाचित सरकार को परेशान करने के लिए मुख्य मंत्री सिद्धरमैया पर मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी गई है और आज खबर है कि लोकायुक्त की जांच होगी। लोकायुक्त को तीन महीने में रिपोर्ट देनी है। आप जानते हैं कि सेबी प्रमुख के खिलाफ कोई जांच नहीं हो रही है। कई मामले और आरोप होने के बावजूद। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि 2014 के चुनाव प्रचार में भ्रष्टाचार और काला धन नरेन्द्र मोदी का प्रमुख मुद्दा था। पहले के किसी मामले में किसी को सजा नहीं हुई, स्विस बैंक में रखा काला धन नहीं आया और पी चिदंबरम से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक के जो मामले बनाये गये वो साबित नहीं हुए हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी अभी भी भ्रष्टाचार को वैसे ही भुना रहे हैं।
ईडी, सीबीआई की मदद से विपक्षी नेताओं को डरा-धमकाकर अपने समर्थन में लेना और जो विरोध में रहे उसके खिलाफ मामला बना देना अब लगभग सर्विविदित है। कुल मिलाकर कांग्रेस के सत्ता में रहने से ना दंगा हुआ ना भ्रष्टाचार का कोई मामला साबित हुआ। इलेक्टोरल बांड के साथ सेबी प्रमुख के मामले की जांच नहीं हुई और तमाम भ्रष्टाचारी भाजपा में शामिल हुए सो अलग। ऐसी भाजपा का शासन सामान्य कैसे हो सकता है। आज अमर उजाला की लीड का फ्लैग शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों व वकीलों को चेताया, कर्तव्यों के पालन में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं झलके, कहा…. देश के किसी हिस्से को पाकिस्तान नहीं कह सकते, क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ है। आज द टेलीग्राफ में भी यही खबर लीड है। टेलीग्राफ का शीर्षक है, पाकिस्तान के दाग पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। जज को ऐसी टिप्पणी के लिए चेतावनी दी गई और अफसोस जताने पर छोड़ दिया गया।
ऐसा हल्कापन सांसद भी दिखाते रहे हैं। आज खबर है, कंगना रनौत ने बयान वापस लिया और खेद भी जताया। पार्टी ने कहा, बेतुकी बात। यह सब आज कई अखबारों में है। दिलचस्प यह है कि राहुल गांधी ने कहा है, पीएम बतायें कि भाजपा निरस्त कृषि कानून को वापस लाना चाहती है कि नहीं। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि भाजपा की रग-रग में किसान विरोधी मानसिकता बसी हुई है और मोदी के नेतृत्व वाली सरकार एमएसपी की कानूनी गारंटी के खिलाफ है। यह सब सिर्फ नवोदय टाइम्स में है। इन खबरों के साथ आज, अमर उजाला में चार कॉलम की खबर है, युद्ध विराम के लिए रूस-यूक्रेन से बात कर रहा है भारत। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, संघर्ष विवादों को सुलझाने का तरीका नहीं है, दोनों पक्षों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
जहां तक सरकार के काम की बात है, केंद्र की भाजपा सरकार के शासन में शिक्षा से लेकर इलाज तक की सुविधा बेहतर नहीं हुई है (बीमे की कहानी अलग है) और बेरोजगारी की समस्या कम होने की बजाय कई गुना बढ़ गई है। मुफ्त बिजली और इलाज जैसी सेवा को रेवड़ी कहा जाता था पर मुफ्त राशन बांटा जा रहा है और नमक की कीमत वसूली जा रही है। इस व्यवस्था में दिल्ली में प्रदूषण दूर नहीं हुआ है। इस सिलसिले में जो चल रहा है उसे पहले लिख चुका हूं। आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है, “दिल्ली का एक्यूआई फिर ‘खराब’ हो गया तो भविष्य में जो होना है उसका यह संकेत है”। मामला पराली जलाने से ही संबंधित है और सरकार कई साल में इसका कुछ कर नहीं पाई है लेकिन वाहनों के मामले में कई नये नियम बने हैं और मनुष्यों का जीवन महंगा हो गया है। दूसरी ओर प्रदूषण पर नियंत्रण ही नहीं है। दिल्ली-गाजियाबाद सीमा पर कूड़े के पहाड़ और उससे निकलने वाले बदबू का कुछ किया नहीं जा सका है।
सरकार का दूसरा प्रमुख काम नागरिकों के लिए न्याय की सुविधा है। आप जानते हैं और कई बार कहा जा चुका है जमानत व्यक्ति का अधिकार है फिर भी जमानत मिलना मुश्किल हो गया है और निचली अदालतों में ज्यादा मुश्किल है। ऐसे में आज इंडियन एक्सप्रेस में खबर है, दिल्ली दंगे से संबंधित मामलों में जजों की नई पोस्टिंग का मतलब है जमानत याचिकाओं पर फिर से सुनवाई होगी, तीसरी बार। जमानत का इंतजार कर रहे ये चार लोग हैं – अब्दुल खालिद सैफी, गुलफिशा फातिमा, मोहम्मद सलीम खान और शिफा उर्र रहमान। खबर के अनुसार 2020 के इन मामलों में चारो की जमानत याचिकाएं अलग दायर की गई हैं और इनपर दो बार भिन्न पीठों के समझ पूरी सुनवाई हो चुकी है। दोनों ही पीठ के प्रमुख जजों को अन्य हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया और इस कारण दोनों मामले में कोई फैसला नहीं दिया गया है। अब पिछले जज का तबादला हो गया है तो तीसरी बार सुनवाई होनी है।



