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आज के अखबार : कांग्रेस की आलोचना का दिन है, कश्मीर में हार से ज्यादा महत्वपूर्ण हरियाणा की जीत

संजय कुमार सिंह

हरियाणा में हार के बाद आज के अखबारों में कांग्रेस की आलोचना भरी हुई है। कांग्रेस ने हार के लिए ईवीएम (चुनाव आयोग) को जिम्मेदार बताया है। ईवीएम की बैट्री मतदान के तीन दिन बाद भी 99 प्रतिशत चार्ज होने तथा उन्हीं में भाजपा को ज्यादा वोट होने का ठोस व विश्वसनीय आरोप है लगाया है। इसका तर्कसंगत और भरोसेमंद जवाब देने की बजाय चुनाव आयोग ने कहा है कि कांग्रेस की टिप्पणी अलोकतांत्रिक और जनादेश को खारिज करने वाली है। इंडियन एक्सप्रेस और दूसरे अखबारों ने भी इसे पहले पन्ने पर छापा है। एक्सप्रेस का उपशीर्षक है, पार्टी ने चुनाव आयोग से मुलाकात की, जांच की मांग की। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस का आरोप बहुत गंभीर है और इसका सीधा मतलब है कि जिन मशीनों से छेड़छाड़ की गई है उनकी बैट्री चार्ज करनी पड़ी (या बदली गई) और इनमें भाजपा को ज्यादा वोट है तो छोड़छाड़ की पुष्टि होती है। मैं नहीं कह रहा कि यह आरोप सही है और जांच कराना जरूरी है। पर इसका जवाब यह होता कि कांग्रेस ने फलां मशीन के 99 या 90 से ऊपर चार्ज होने का आरोप लगाया। उसमें भाजपा को इतने और कांग्रेस को इतने वोट मिले हैं। या इन ईवीएम की पर्चियों को गिन लिया जाता। यह सब चुनाव आयोग को अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए खुद करना चाहिये पर कल और आज जो छपा है उससे नहीं लगता है कि चुनाव आयोग को अपनी विश्वसनीयता की चिन्ता है या उसे बनाये रखने के लिए वह कुछ काम कर रहा है।

दूसरी ओर, जैसा मैंने कल लिखा था, लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार हुई तो प्रधानमंत्री ने ईवीएम जिन्दा है कि मर गया पूछने की कहानी सुनाकर कांग्रेस पर चुनाव प्रक्रिया की साख खराब करने का आरोप लगाया था और अब जब कांग्रेस आरोप लगा रही है तो प्रधानमंत्री ईवीएम पर चुप हैं, चुनाव आयोग कांग्रेस पर जानदेश को न मानने का आरोप लगा रहा है। इसमें मीडिया का काम निष्पक्ष रहना था। चुनाव आयोग ने अगर कुछ कहा है तो निश्चित रूप से यह खबर है और इसे प्रमुखता देना संपादकीय विवेक का मामला है। यह जनता को चुनाव आयोग का लचर जवाब बताने के लिए हो सकता है। पर इसके साथ कांग्रेस का पक्ष भी होना चाहिये। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने की खबर या शीर्षक में ऐसा कुछ नहीं है। एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड भी नहीं है। हालांकि, इसके साथ उमर अब्दुल्ला का इंटरव्यू है। इसमें और उन्होंने कहा है और यही शीर्षक है, (एलजी से) लड़कर मैं कैसे जम्मू-कश्मीर के मामले हल कर सकूंगा। बेशक यह विपक्ष का पक्ष है और महत्वपूर्ण चिन्ता है।  चुनाव आयोग के जवाब के साथ छपा है तो मामला संतुलित होता है। पर सभी अखबारों में ऐसा नहीं है।

आप जानते हैं कि दो राज्यों में चुनाव हुए थे। एक में भाजपा जीती है दूसरे में बुरी तरह हारी है। जहां हारी है वहां कांग्रेस के वोट का मतप्रतिशत बढ़ा है उस लिहाज से सीटें नहीं बढ़ी हैं जबकि भाजपा का वोट प्रतिशत जितना बढ़ा है उस लिहाज से सीटें ज्यादा बढ़ी हैं। यह ईवीएम पर आरोप की पुष्टि करता है लेकिन वह मामला अलग है। कश्मीर में हारने के अलग मायने हैं क्योंकि अनुच्छेद 370 हटाने से देश को, वहां की जनता को और आतंकवाद खत्म करने जैसे जुमलों का कोई फायदा नहीं हुआ है। लेकिन भाजपा एलजी के जरिये वहां पांच साल शासन करती रही। सुप्रीम कोर्ट में संबंधित मामलों की समय पर सुनवाई नहीं हुई और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब चुनाव हुए तो जनादेश के अनुसार मुख्यमंत्री बनकर भी उमर अब्दुल्ला क्या कर पायेंगे यह चिन्ता का विषय है और इसे उन्होंने कहा है तथा वह इंडियन एक्सप्रेस में ही पहले पन्ने पर छपा है। कश्मीर में दो सैनिकों के अपहरण और उनमें एक की हत्या तथा दूसरे के जख्मी होने की खबर भी इंडियन एक्सप्रेस में इन खबरों के साथ है। पर प्रधानमंत्री अपनी सरकार और उसके काम की चर्चा या जीत के लिए उसे श्रेय देने की बजाय कांग्रेस की आलोचना में लगे हुए हैं और सबको दिख रहा है कि अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए वे क्या सब कर और बोल रहे हैं।

उदाहरण के लिए आज द टाइम्स ऑफ इंडिया में तीन कॉलम की लीड और तीन कॉलम में रतन टाटा के निधन की खबर के बीच में बाकी के दो कॉलम में छपी एक खबर का शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने कहा : कांग्रेस हिन्दू समाज को जाति आधार पर बांटने पर आमादा है”। इंट्रो है, वे मुसलमानों को डर में रखते हैं, उन्हें वोट बैंक बनाते हैं। सच्चाई आप जानते हैं। जहां तक जातीय जनगणना और  आरक्षण की बात है वह भी किसी से छिपा नहीं है। राहुल गांधी और कांग्रेस ने इसकी जरूरत बताई है, उदाहरण दिये हैं और कांग्रेस जो करना चाह रही है वह भाजपा की सहयोगी या बैसाखी पार्टी ने बिहार में पहले ही किया है। भले ही भाजपा के साथ आने के बाद यह मुद्दा बिहार में शांत या ठंडा हो गया हो पर इसकी जरूरत तो भारतीय समाज को है और भाजपा तथा मोदी के समर्थक भी महसूस करते रहे हैं। यही नहीं, दूसरी बैसाखी या दूसरे समर्थक दल के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने कहा है और आज ही इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर छपा है। इसका शीर्षक है, लोगों की भावनाओं का सम्मान और भेदभाव कम करने के लिए जातिवार जनगणना जरूरी है। स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार जिनके समर्थन से चल रही है वे भी जातिवार जनगणना और इसके बाद जातियों को प्रतिनिधित्व देने की जरूरत समझते हैं। प्रधानमंत्री इसके खिलाफ है (दस साल गवाह है) और सत्ता में बने हुए हैं। हरियाणा में जीत गये तो यह बता रहे हैं कि वही देश का भला कर रहे हैं (कर सकते हैं) और विरोधी विचारधारा के लोग समर्थन दे रहे हैं। यह राजनीति है और संभव है ईडी, सीबीआई शाखा वाली सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीति के कारण हो।

यही नहीं, द एशियन एज की आज की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा – कांग्रेस घृणा पैदा करने वाली फैक्ट्री है, सत्ता में वापस आने के लिए परेशान है। (झोला उठाकर चल दूंगा और किसी भी चौहारे पर … याद कीजिये)। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, हरियाणा के बाद महाराष्ट्र जीतने का समय है, 7.6 हजार करोड़ की परियोजनाओं का खुलासा। इस खबर के साथ चुनाव आयोग की टिप्पणी दो कॉलम में और आधी लाल स्याही से है। शीर्षक है, हरियाणा के नतीजे अस्वीकार्य कहने के लिए चुनाव आयोग ने कांग्रेस की आलोचना की। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग एक निष्पक्ष संस्था है और अगर किसी को लगे कि नतीजे उम्मीद के अनुकूल हैं तो शिकायत करेगा। मतदाता कह सकता है कि जो नतीजे आये हैं वही सही है और समर्थन जानने का यही तरीका है। कांग्रेस ने जब ईवीएम की गड़बड़ी की बात की है तो जनादेश नहीं मानने का कारण जनादेश नहीं, ईवीएम है और कहने का मतलब यही है कि इसमें बेइमानी हुई हो सकती है। जाहिर है कि यह चुनाव आयुक्तों पर आरोप नहीं है भले ही वे प्रधानमंत्री के नियुक्त किये हुए हैं। आरोप तो व्यवस्था और नीचे वालों पर है लेकिन उसका संतोषजनक जवाब, शिकायत की जांच कराने की बजाय इस तरह के बयान का कोई मतलब नहीं है। चुप रहने से उसकी निष्पक्षता का पता नहीं चलता बोलकर उसने अपना पक्ष उजागर कर दिया है और शर्मनाक है कि उसे इसकी परवाह नहीं है। यहां रतन टाटा के निधन की खबर लीड के बराबर में टॉप पर तीन कॉलम में बॉक्स है। 

वैसे, टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के जरिये कांग्रेस की भरपूर आलोचना की गई है। उससे पहले बता दूं कि लगभग ऐसा ही शीर्षक दि एशियन एज में भी है – ” घमंडी और हकदार : कांग्रेस को इंडिया ब्लॉक के गुस्से का सामना करना पड़ा”। उपशीर्षक है, “हरियाणा में कांग्रेस की हार के बाद सहयोगियों की भृकुटि तनी”। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है।  दो कॉलम की इस खबर का फ्लैग शीर्षक दो लाइन में है, सहयोगियों की नजर में कांग्रेस घमंडी और ज्यादा ही आत्मविश्वास से भरी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, चुनावों में झटके के बाद कांग्रेस पर सहयोगियों का हमला। कुल मिलाकर, हरियाणा की हार के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी की आलोचना उनके सहयोगियों ने ही की है और यह हिन्दुओं से एकजुट होने की संघ प्रमुख की अपील के बाद है। आलोचना करने वालों में ज्यादा ऊंची या बड़ी जाति के लोग ही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में इसका अच्छा विस्तार है। जिन अखबारों का नाम नहीं है उनमें यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और इनमें हिन्दी के मेरे दोनों अखबार, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स के साथ अंग्रेजी का द हिन्दू शामिल हैं। अमर उजाला ने कांग्रेस की आलोचना के लिए चुनाव आयोग की टिप्पणी का ही उपयोग किया है। हालांकि, कांग्रेस का पक्ष भी साथ छपा है। नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग पहुंची कांग्रेस।

इससे लगता है कि संघ परिवार और भाजपा की रणनीति कम से कम अखबारों में अब पहले की तरह नहीं है और आंशिक तौर पर ही काम कर रही है। मोदी सरकार में देश का, सरकार का, आम जनता का जो नुकसान हुआ है और लोकप्रियता पाने के साथ प्रमुख विरोधियों का नुकसान करने के लिए किये जा रहे उपायों या राजनीति का असर हो रहा है जिसे इंडियन एक्सप्रेस ने कल बूस्टर शॉट लिखा था। इस आलोक में सहयोगियों ने जो कहा (और नहीं कहा) वह महत्वपूर्ण है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, ‘घमंडी’: चुनाव में कांग्रेस की हार के एक दिन बाद, सहयोगियों ने हमला तेज किया। इंट्रो है, कांग्रेस ने सपा को अपमानित किया, उत्तर प्रदेश के 10 उपचुनाव में से 6 के उम्मीदवार घोषित किये। एक खबर यह भी है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने गठजोड़ की संभावना से इनकार किया। अलग अलग दलों के नेताओं के बयानों के संकलन का शीर्षक है, कांग्रेस को लगा कि हरियाणा में उसे किसी की जरूरत नहीं है। अब इस समूह में छपे बयानों का अनुवाद पढ़िये।

1. कांग्रेस जानती है कि जब कोई इनिंग जीत रही हो तो उसे हार में कैसे बदलना है। इसकी हार का कारण इसके स्थानीय नेताओं का आत्मविश्वास बहुत ज्यादा और घमंडी होना है। उसे लगा कि उसे किसी साझेदारी की जरूरत नहीं है। – सेना यूबीटी के संजय राउत,सामना में

2. कांग्रेस को अपने उच्च स्तर से नीचे आने की जरूरत है – सुप्रिया भट्टाचार्या (जेएमएम)

3. यह सोच — कि अगर हम जीत रहे हैं तो हम किसी क्षेत्रीय पार्टी क एडजस्ट नहीं करेंगे – चुनावी नुकसान का कारण बनती है – साकेत गोखले, सांसद, तृणमूल कांग्रेस।

4. गठजोड़ के सिद्धांतों का सम्मान किया जाना चाहिये। मिलकर राजनीति करने पर फोकस होना चाहिये — हर किसी को बलिदान करना होता है। आरजेडी

5. कांग्रेस को गहराई तक जाकर विचार करना होगा और (हरियाणा में) हार के कारणों का पता लगाना होगा। उमर अब्दुल्ला, नेशनल कांफ्रेंस 

नेशनल कांफ्रेंस की सफलता

नेशनल कांफ्रेंस को छह स्वतंत्र विधायकों का समर्थन मिलने की उम्मीद है और ऐसा होता है जो नेशनल कांफ्रेंस अकेले सरकार बनाएगी। दूसरी ओर, पांच विधायक नामजद करने की राजनीतिक व्यवस्था से सत्ता कब्जाने की रणनीति भी नाकाम हुई है और उसकी चर्चा भी नहीं है। हरियाणा में चुनाव जीतने और कश्मीर में बुरी तरह हारने के बाद भी भाजपा और उसके समर्थक-प्रचारक न सिर्फ खुद को राजनीति की माहिर खिलाड़ी की तरह पेश कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस (और राहुल गांधी) को अपमानित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यह तब है जब दिख रहा है कि राहुल गांधी घर बैठ जायें तो भाजपा, संघ परिवार और नरेन्द्र मोदी को मनमानी करने की पूरी छूट मिल जायेगी। आरएसएस की राजनीति यही है और नरेन्द्र मोदी ने न सिर्फ पार्टी और परिवार को पैसे कमाने (और उसे दिखाने का) मौका दिया है बल्कि खुद को ईमानदार और दूसरों को भ्रष्ट प्रचारित करने का उपाय भी किया है। गौरव बल्लभ जैसे आयातित प्रचारक बनाये हैं जो कहते हैं कि लोकतंत्र के चारो पायों का मिलकर काम करना जनहित है। और प्रधानमंत्री का मुख्य न्यायाधीश के घर जाना गलत नहीं है जबकि उससे तमाम संवैधानिक संस्थाओं का महत्व कम करने की भाजपा और नरेन्द्र मोदी की रणनीति का 100 ग्राम का आखिरी पर्दा भी हट गया था। अब यह कहा जा रहा है कि हरियाणा में भाजपा जीत गई यानी वहां बहुमत को भाजपा की राजनीति पसंद है। चुनाव आयोग ने भी इसे साबित करने वाला बयान दिया है और प्रचारकों ने उसे तान भी दिया है।

मुख्यमंत्री के बंगले पर राजनीति

आज के अखबारों में भाजपा की राजनीति की सफलता और उसे मिल रहे समर्थन के साथ प्रमुख विपक्षी दल और नेता के विरोध में ये टिप्पणियां ही नहीं हैं दूसरे प्रमुख विपक्षी दल आम आदमी पार्टी की कहानी कम दिलचस्प नहीं है। मेरे लिये यह सुकून की बात है कि आज यह इंडियन एक्सप्रेस में सेकेंड लीड और अमर उजाला में चार कॉलम में है। शीर्षक है, दिल्ली में मुख्यमंत्री का आवास सील, ताला जड़ा। उपशीर्षक है – “मुख्यमंत्री सचिवालय का आरोप : आतिशी का सामान लोक निर्माण विभाग ने बाहर निकाला”। “राजनिवास ने कहा : केजरीवाल के जाने के बाद आवास किसी को आवंटित ही नहीं किया”। कहने की जरूरत नहीं है कि यह उपराज्यपाल के जरिये आम आदमी पार्टी को नीचा दिखाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अगर अपना घर खाली कर दिया तो मुख्यमंत्री को घर आवंटित हो जाना चाहिये था। नहीं किया गया, उसका इंतजार नहीं किया यह गलती हो सकती है पर यह स्पष्ट नहीं किया गया होगा या बंगले से पार्टी का कब्जा छिनने के डर से अगर मुख्यमंत्री ने अपना सामान वहां पहुंचा दिया तो सामान्यतौर पर सही ही था। उसके बाद आवंटन हो सकता था। वैसे भी निर्वाचित मुख्यमंत्री तो वे हैं हीं और बंगले का अधिकार भी उनका है। फिर भी जो हुआ वह उन्हें और पार्टी को नीचा दिखाने के लिए तो है ही। एक बंगले के लिए मुख्यमंत्री का यह हाल तब है जब तमाम अयोग्य लोगों को बंगला मिला हुआ है।

मुख्यमंत्री डबल इंजन न हो तो

डबल इंजन की सरकार नहीं हो तो भाजपा की राजनीति क्या और कैसी होती है इसका पता नवोदय टाइम्स में छपी खबर से भी लगता है। आप नेता, संजय सिंह ने कहा है, सीएम आवास पर कब्जा करना चाह रही है भाजपा। द हिन्दू की खबर का शीर्षक है, आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री को फ्लैग स्टाफ रोड का बंगला नहीं आवंटित किया जा रहा है। यह खबर तीन कॉलम में दो लाइन के शीर्षक से छपी है। दि एशियन एज में दो कॉलम का शीर्षक है, “पीडब्ल्यूडी के सील करने के बाद आतिशी मुख्यमंत्री निवास खाली करने को ‘मजबूर’ हुईं”। आवंटन को लेकर आम आदमी पार्टी और भाजपा भिड़े। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। चाल कॉलम की इस खबर का शीर्षक दो लाइन में है – “आतिशि के शिफ्ट होने के बाद पीडब्ल्यूडी ने परिसर को लॉक कर दिया सो बंगले को लेकर भारी हंगामा”।

गरीबों को 2028 तक चावल मुफ्त

आज एक और दिलचस्प खबर है। आम आदमी पार्टी या कोई अन्य विपक्षी दल जनता को कुछ मुफ्त में दे तो भाजपा उसका हर तरह से विरोध करती है। मुफ्तखोरी की आदत से लेकर रेवड़ी तक कहा जा चुका है और भाजपा खुद मुफ्त राशन बांट रही है। एक बार नमक की कीमत भी वसूल चुकी है। आज द हिन्दू में खबर है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे दिसबर 2028 तक जारी रखने की सहमति दी है। नवोदय टाइम्स में यह लीड है, गरीबों को 2028 तक चावल मुफ्त। इसका मतलब यही है कि सरकार को तब तक आम लोगों को रोजगार और उनकी आर्थिक स्थिति ठीक होने की उम्मीद नहीं है और यह जरूरत बनी रहेगी। विश्व गुरु, पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और इस लिहाज से दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंच जाने जैसे खोखले प्रचार के बावजूद। कायदे से सरकार को प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात करनी चाहिये तो वह खुद क्या बांट या लुटा रही है उसका प्रचार करती है।

370 पर बेवकूफ नहीं बना सकते

भाजपा की इस राजनीति और मीडिया के देश विरोधी रुख तथा व्यवहार के बीच आज अमर उजाला की सेकेंड लीड दिलचस्प है। शीर्षक है, अनुच्छेद 370 पर लोगों को बेवकूफ नहीं बना सकते उमर। खबर के अनुसार भावी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, जो वंशवादी हैं और नरेन्द्र मोदी के 10 साल के शासन के बाद चुने गये हैं, ने कहा है – राज्य का दर्जा बहाल कराना होगी सरकार की प्राथमिकता। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है, हम अनुच्छेद 370 को हमेशा जिन्दा रखेंगे। यह हमारे लिए कल भी मुद्दा था, आज भी है और आगे भी रहेगा। लेकिन जिन लोगों ने इसे छीना अगर हम उन्हीं से इसे वापस पाने की उम्मीद करेंगे तो यह लोगों को धोखा देने के बराबर होगा। 

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