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सियासत

100वें वर्ष में प्रवेश करते ‘आरएसएस’ के बारे में कितना जानते हैं आप?

श्याम मीरा सिंह-

रएसएस के प्रकाशन- भारतीय विचार साधना नागपुर ने गोलवलकर के द्वारा पूरे जीवन में दिए गए भाषणों और अन्य चीजों को मिलाकर छापा, 1970 के दशक की शुरुआत में उसके सात वॉल्यूम छापे गए, जिन्हें अंग्रेजी में- Complete Works of Guru Golwalkar कहा जाता है और हिन्दी में श्री गुरूजी समग्र.

इसी श्री गुरूजी समग्र में गोलवलकर और हेडगेवार के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऊपर विचार लिखे हुए हैं.

श्री गुरूजी समग्र के वॉल्यूम चार में पेज न. 39-40 पर लिखा है कि- ‘’नित्यकर्म में सदैव संलग्न रहने के विचार की आवश्यकता का और भी एक कारण है. समय समय पर देश में उत्पन्न परिस्थिति के कारण मन में कुछ उथल पुथल होती ही रहती है. सन 1942 में ऐसी उथल पुथल हुई थी. उसके पहले 1930-31 में भी आंदोलन हुआ था. उस समय कई लोग डॉक्टरजी यानी आरएसएस के पहले संस्थापक- हेडगेवार के पास गए थे, इस ‘शिष्टमंडल’ ने डॉक्टर जी से अनुरोध किया कि आंदोलन से स्वातंत्रय यानी स्वतंत्रता मिल जाएगा और संघ को पीछे नहीं रहना चाहिए. उस समय एक सज्जन ने जब डॉक्टर जी से कहा कि वे जेल जाने के लिए तैयार हैं तो डॉक्टरजी ने कहा- जरूर जाओ. लेकिन पीछे आपके परिवार को कौन चलाएगा., उस सज्जन ने बताया- दो साल तक केवल परिवार को चलाने के लिए ही नहीं , आवश्यकतानुसार जुर्माना भरने की भी पर्याप्त व्यवस्था उन्होंने कर रखी है’’. तो डॉक्टर जी ने उनसे कहा- आपने पूरी व्यवस्था कर रखी है तो पहले दो साल के लिए ही संघ का कार्य करने के लिए निकलो.’’ घर जाने के बाद वह सज्जन न जेल गए न संघ का कार्य करने के लिए निकले’’.

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आरएसएस न तो स्वतंत्रता संग्राम में भाग ले रहा था, न किसी को प्रेरित कर रहा था, उल्टा जो आदमी अपना पैसा, घर छोड़ कर अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ना चाहते थे उन्हें भी स्वतंत्रता संग्राम में जाने से रोक रहे थे. और बड़ी ही बेशर्मी के साथ देश छोड़कर आरएसएस के लिए काम करने के लिए कह रहे थे. इसी किताब में अनजाने में खुद गोलवलकर भी स्वीकार कर लेते हैं कि खुद आरएसएस के कुछ स्वयंसेवक आरएसएस को अकर्मण्य यानी कुछ काम न करने वाला, निकम्मा. कहकर नाराज हो रहे थे.

इसी किताब में गोलवलकर आगे कहते हैं- 1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था. उस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा., प्रत्यक्ष रूप से संघ ने कुछ न करने का संकल्प लिया. परन्तु संघ के स्वयंसेवकों के मन में उथल-पुथल चल रही थी. संघ यह अकर्मण्य यानी कुछ काम न करने वालों की संस्था है, इनकी बातों में कुछ अर्थ नहीं ऐसा केवल बाहर के लोगों ने ही नहीं बल्कि अपने स्वयंसेवकों ने कहा. वे बड़े रुष्ट हुए.’’ इस पैराग्राफ में खुद गोलवलकर स्वीकार कर रहे हैं कि आरएसएस ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने का संकल्प लिया और आरएसएस के कुछ स्वयंसेवक इस बात से नाराज भी थे. 1940 से लेकर 1947 तक जब तक देश आजाद नहीं हो गया तब तक आरएसएस ने किसी भी ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में भाग नहीं लिया. यही कारण है कि ब्रिटिश सरकार भी आरएसएस के प्रति सॉफ्ट थी.

साल 1942 के वक्त भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त अंग्रेजी सरकार ने गांधी नेहरु समेत सभी स्वतंत्रता सैनानियों को जेल में डाल दिया था. लेकिन उस वक्त आरएसएस क्या कर रही थी इसे Walter Anderson, Shridhar Damle की किताब- The Brotherhood in Saffron से भी समझ सकते हैं, जिसमें वे लिखते हैं- आरएसएस की एक्टिविटीज पर एक ऑफिसियल रिपोर्ट में, अंग्रेजी सरकार के होम डिपार्टमेंट ने लिखा कि- यह तर्क देना मुश्किल है कि अभी आरएसएस कानून-व्यवस्था के लिए कोई खतरा है…” it would be difficult to argue that the RSS constitutes an immediate menace to law and order

यानी जब ब्रिटिश सरकार स्वंत्रता सैनानियों को जेल में डाल दिया उस वक्त ब्रिटिश सरकार आरएसएस को अपने लिए ख़तरा नहीं मानती थी. अंग्रेजों के होम डिपार्टमेंट ने लिखा कि- संघ (आरएसएस) ने ईमानदारी से खुद को कानून के दायरे में रखा है, और विशेष रूप से, अगस्त, 1942 में हुई गड़बड़ी में भाग लेने से परहेज किया है…’’.

“the Sangh has scrupulously kept itself within the law, and in particular, has refrained from taking part in the disturbances that broke out in August, 1942”

वहीं ब्रिटिश सरकार के एक अफसर ने आरएसएस और खाकसार मूवमेंट की तुलना भी की. खाकसार मूवमेंट, लाहौर और पंजाब क्षेत्र में इनायतुल्लाह खान मशरिकी के द्वारा शुरू किया गया आंदोलन था जिसका उद्देश्य अंग्रेजों से देश को आजाद कराना था., खाकसारों ने भारत के विभाजन का भी विरोध किया और एक संयुक्त देश का समर्थन किया। जिसमें हिंदू और मुस्लमान दोनों की जगह हो. खाकसार आंदोलन की सदस्यता सभी के लिए खुली थी , हिंदू मुस्लिम सिख इसाई कोई भी इसका सदस्य बन सकता था. आरएसएस और खाकसार आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए ब्रिटिश होम डिपार्टमेंट के अफसर ने कहा- इनायतुल्लाह खान एक unbalanced और लोगों को भड़काने वाला आदमी है, वहीं गोलवलकर- सावधान और चतुर नेता है.’’

Another Home Department official compared the leader of the paramilitary Khaskars to Golwalkar and noted that ‘while Inayatullah is an unbalanced and blustering megalomaniac, Golwalkar is wary, astute, and therefore by far the more capable leader’

इनायतुल्लाह खान मशरिकी ने सुभाष चन्द्र बोस की तरह ही एक बड़ी फ़ौज तैयार की थी. एक तरफ सुभाष चन्द्र बोस, इनायतुल्ला खान जैसे लोग थे, दूसरी तरफ, हेडगेवार और गोलवलकर जैसे लोग थे. इनायतुल्ला खान और सुभाष चन्द्र बोस भी गांधी के तरीके से सहमत नहीं थे, उन्हें लगता था कि अंग्रेजों को भगाने के लिए आक्रामक होकर हिंसात्मक लड़ाई लडनी होगी. लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि वे अंग्रेजों के साझीदार हो गए, इनायतुल्ला खान और सुभाष चन्द्र बोस दोनों ने गांधी से असहमत होते हुए भी अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी और सबसे बड़ी बात कि उन्होंने हिंदू और मुसलमानों में भेद नहीं किया बल्कि साथ लिया. इससे गांधी का आन्दोलन कमजोर नहीं हुआ, न ब्रिटिश सरकार को फायदा मिला. लेकिन वहीं गोलवलकर, हेडगेवार जैसे नेता गांधी के तरीके से असहमत तो थे, लेकिन अपनी तरफ से खुद कोई प्रयास नहीं कर रहे थे, अपनी तरफ से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ाई नहीं लड़ी. उल्टा हिंदू मुस्लिम आधार पर सांप्रदायिकता को कम करने के बजाय बढ़ावा दिया. ये अंतर ही गोलवलकर और हेडगेवार को जाने-अनजाने में ब्रिटिश सरकार के पक्ष में और भारत की आजादी के आंदोलन के विरोध में खड़ा करता था. इसलिए उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहना, असली स्वतंत्रता सैनानियों के बगल में खड़े कर देने जैसे होगा, जो वाकई में अपनी जान और करियर गवाकर अंग्रेजों से लड़ रहे थे.

आरएसएस ही नहीं बल्कि आरएसएस को आगे बढाने वाली हिंदू महासभा के नेता- सावरकर भी अंग्रेजों को मदद के लिए हाथ बढ़ा रहे थे. जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ और वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीयों को ब्रिटिश सेना की तरफ से युध्द में लड़ने के लिए भेजना शुरू कर दिया तो कांग्रेस ने इसका विरोध किया. कांग्रेस ने कहा कि न युद्ध हमारी जमीन पर लड़ा जा रहा, न भारत के हित के लिए लड़ा जा रहा. न भारत के खिलाफ़ लड़ा जा रहा तो इसमें ब्रिटेन की तरफ से हमारे भारतीय सैनिकों को लड़ने के लिए क्यों भेजा जा रहा है उन्हें क्यों शहीद करवाया जा रहा है. अंग्रेजों के इस फैसले का तीव्र विरोध करते हुए कांग्रेस ने 7 प्रान्तों की अपनी सरकारों से इस्तीफ़ा दे दिया. तब 3 September 1939 के दिन सावरकर Viceroy Lord Linlithgow से मिले और ब्रिटिश सेना का साथ देने के लिए कहा. इसके बारे में Lord Linlithgow ने ब्रिटेन में बैठे- Secretary of State for India, Lord Zetland से पत्राचार में कहा- सावरकर ने कहा है कि महामहिम की सरकार को हिन्दुओं की तरफ आना चाहिए, और उनके सपोर्ट के साथ काम करना चाहिए, यद्यपि हमारे और हिंदुओं के बीच अतीत में एक-दूसरे के साथ काफी difficulty रही हैं. लेकिन ये ब्रिटेन और फ्रांस के मामले में भी रहा है, और रूस और जर्मनी के रिश्तों के बीच भी रहा है. अभी हमारे हित एक जैसे हैं, इसलिए हमें साथ मिलकर काम करना चाहिए।’’.

Lord Linlithgow ने Lord Zetland से सावरकर के बारे में कहा- आज वे सबसे उदारवादी व्यक्ति हैं वे भी स्वयं अतीत में एक क्रांतिकारी पार्टी के अनुयायी रहे थे. लेकिन अब जब हमारे हित एक-दूसरे से इतने करीब से जुड़े हुए हैं कि हिंदू धर्म और ग्रेट ब्रिटेन के बीच दोस्ती होना जरूरी है, और पुरानी दुश्मनी अब जरूरी नहीं रह गई है.’’

Even though now the most moderate of men, he had himself been in the past an adherent of a revolutionary party, as possibly, I might be aware. (I confirmed that I was.) But now that our interests were so closely bound together the essential thing was for Hinduism and Great Britain to be friends, and the old antagonism was no longer necessary.

हिंदू महासभा और आरएसएस दोनों ने ही गांधी के नेतृत्व में चलाए जा रहे- भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया. आरएसएस और महासभा से जुड़े रहे- श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के Governor – Sir John Herbert को 26 जुलाई, 1942 के दिन एक पत्र में अंग्रेजों के खिलाफ़ बढ़ते विद्रोह को दबाने के लिए सलाह भी दी. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लिखा- मैं उन प्रश्नों पर विचार कर रहा हूं जिन पर हमने पिछली कैबिनेट बैठक में विस्तार से चर्चा की थी, विशेष रूप से कांग्रेस के खतरे भरे आंदोलन से उत्पन्न प्रश्नों पर। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस critical टाइम में राज्यपाल के रूप में आपके और आपके सहयोगियों के बीच एक complete understanding होनी चाहिए।’’ . श्याम प्रसाद मुखर्जी बंगाल के अंग्रेज गवरनर को आगे लिखते हैं- अब मैं उस स्थिति का जिक्र करना चाहता हूँ जो कांग्रेस द्वारा चलाये जा रहे व्यापक आन्दोलन के फलस्वरूप राज्य में उत्पन्न हो सकती है। कोई भी, जो युद्ध के दौरान जन भावनाओं को भड़काने की योजना बनाता है, जिसके परिणामस्वरूप आंतरिक गड़बड़ी या असुरक्षा होती है, किसी भी सरकार द्वारा उसका विरोध किया जाना चाहिए.’’

The Mahasabha and the RSS opposed the Congress’s Quit India Resolution of 8 August 1942. What few know is that S.P. Mookerjee wrote to the Governor of Bengal Sir John Herbert on 26 July advising him to crush the revolt which had begun to brew. These extracts speak for themselves. I have been thinking over the questions which we discussed at some length at the last Cabinet Meeting, specially arising out of the threatened Congress movement. It is of utmost importance that there should be complete understanding between you, as Governor, and your colleagues during the present critical period. Let me now refer to the situation that may be created in the province as a result of any widespread movement launched by the Congress. Anybody, who during the war, plans to stir up mass feelings, resulting in internal disturbances or insecurity, must be resisted by any Government that may function for the time being.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी आगे लिखते हैं- आज हम नहीं चाहते कि कोई भी पक्ष पिछले मतभेदों को उछाले। आज मुद्दा यह है: क्या हम जापान या जर्मनी की नई आक्रामकता को भारत सहित मानव स्वतंत्रता के लिए खतरा मानते हैं? .मैं कहूंगा कि जिस आदर्श के लिए उन्होंने इतने लंबे समय तक संघर्ष किया वह अब हासिल हो गया है। आज ब्रिटेन और भारत में उसके representatives द्वारा यह स्वीकार कर लिया गया है. प्राप्त है कि जहां तक ​​ब्रिटेन और भारत का सवाल है. भारत की स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार कर लिया गया है। इसलिए, हमारे पिछले relationship को लेकर उनके और हमारे बीच अब कोई झगड़ा नहीं है।’.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत छोड़ो आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों को सलाह देते हुए ;लिखते हैं- सवाल यह है कि बंगाल में इस आंदोलन का मुकाबला कैसे किया जाए? प्रांत का प्रशासन इस प्रकार चलाया जाना चाहिए कि कांग्रेस के सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद भी यह आंदोलन प्रांत में जड़ें जमाने में विफल रहे। हमारे लिए, विशेषकर जिम्मेदार मंत्रियों के लिए यह संभव होना चाहिए कि हम जनता को यह बता सकें कि जिस स्वतंत्रता के लिए कांग्रेस ने आंदोलन शुरू किया है, वह पहले से ही जनता के प्रतिनिधियों की है. आपातकाल के दौरान कुछ क्षेत्रों में यह सीमित हो सकती है। भारतीयों को अंग्रेजों पर भरोसा करना होगा… यही कारण है कि मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप जमीन, समुद्र और हवा में बंगाली सेना खड़ी करने के लिए तत्काल कदम उठाएं और उन्हें अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए कहें।’’.

29 November 1941 के दिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा- महासभा ने सभी हिंदुओं से आह्वान किया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में सेना, नौसेना और वायु सेना में शामिल हों और उन सुविधाओं का पूरा लाभ उठाएं जो ब्रिटिश सरकार परिस्थितियों के दबाव में और मुख्य रूप से अपने हित में हमें दे रही है। अगर इंडियन फोर्सेज में हमारी संख्या का अनुपात कम होगा तो हम भारी भूल करेंगे.’’

RSS की दो स्ट्रेटेजी थीं- एक स्वतंत्रता संग्राम लड़ रही कांग्रेस का विरोध करना, हिन्दुओं को कम्युनल आधार पर अपनी तरफ आकर्षित करना, दूसरा- ब्रिटिश सरकार की नज़र से दूर रहना, इसलिए चुपचाप अपने काम में लगे रहना और ऐसा कोई काम न करना जिसे उस समय ब्रिटिश विरोधी कहा जाता था, यानी स्वतंत्रता आन्दोलन से आरएसएस ने ठीक ठाक दूरी बनाकर रखी ताकि ब्रिटिश उन्हें अपना दुश्मन न समझकर मित्र की तरह लें. इसका फायदा भी आरएसएस को मिला. 25 October 1942 के दिन एक भाषण में Golwalkar ने देशभर में आरएसएस की कुल करीब 1,500 शाखाएं हैं और 2 लाख स्वयंसेवक हैं. हालाँकि वहीं उस वक्त की ब्रिटिश सरकार के अनुमान के मुताबिक 1943 तक आरएसएस के सदस्यों की संख्या 76,000 करीब थी. आरएसएस के प्रसार में मुस्लीम लीग का भी बड़ा हाथ रहा. दरअसल मुस्लिम लीग के नेता, आरएसएस और हिंदू संगठनों का डर दिखाकर मुस्लिमों की लामबंदी कर रहे थे वहीं आरएसएस और हिंदू महासभा जैसे संगठन मुस्लिमों का डर दिखाकर अपने संगठन का विस्तार करते जा रहे थे, एक तरफ के लोग मुस्लिमों और ईसाईयों को इस देश का नहीं मानते थे, तो दूसरी तरफ के नेताओं ने पाकिस्तान की मांग करना शुरू कर दिया. इन दोनों के बीच स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन को नुकसान हो रहा था, और ये दोनों ही तरफ के संगठन खूब समृद्ध होते जा रहे थे. साल 1946 में जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन और कलकत्ता में हुए सांप्रदायिक दंगों ने दोनों ही तरफ के सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया. पाकिस्तान की मांग ने हिन्दुओं को आरएसएस और हिंदू महासभा जैसे संगठनों के नजदीक ला दिया. आरएसएस अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ने के बजाय, चुपचाप अपना संगठन बढ़ता रहा. गांधी, नेहरु, पटेल, भगत सिंह, जैसे लोग जिस स्वतंत्रता का सपना देख रहे थे आखिर वह दिन आ गया. लेकिन आरएसएस ने इस स्वतंत्रता का स्वागत करने के बजाय इसमें भी कमियां निकालीं. जिस तिरंगे के लिए भगत सिंह ने जान दे दी, उस तिरंगे का आरएसएस ने विरोध किया. 15 अगस्त से एक दिन पहले यानी 14 अगस्त 1947 के दिन, आरएसएस ने अपनी पत्रिका- ऑर्गेनाइजर में कहा- जो लोग भाग्य की मार से सत्ता में आये हैं, वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगा दे दें, लेकिन हिंदुओं के द्वारा कभी भे इसका सम्मान नहीं होगा न वे इसे अपनाएंगे. तीन शब्द अपने आप में अशुभ है, और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित रूप से एक बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करेगा और एक देश के लिए हानिकारक है।’’

देश के तिरंगे के लिए आरएसएस की ये सोच थी, जिसे लेकर 1930 से ही देश की आजादी के लड़ाके अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे. आरएसएस के संघचालक- गोलवलकर ने भी न केवल तिरंगे झंडे को रिजेक्ट किया बल्कि राष्ट्रगान को भी रिजेक्ट किया.

गोलवलकर ने अपनी किताब- बंच ऑफ़ थॉट्स में लिखा- ‘’हमारे नेताओं ने देश के लिए एक नया झंडा लागू किया है, उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या ये सिर्फ एक बहकना और नकल करना है? हमारा देश एक प्राचीन और गौरवशाली देश रहा है. क्या हमारे पास अपना कोई ध्वज नहीं था? क्या हजारों सालों में हमारे पास अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था. बेशक हमारे पास था. फिर हमारे मन में इतनी शून्यता क्यों है? इतना खालीपन क्यों है?’’.

एक तरफ आरएसएस ने देश की आजादी के आंदोलन में भाग नहीं लिया, कभी कोई एक प्रदर्शन नहीं किया. उल्टा वर्षो बाद मिली आजादी में तीन पांच करके खुद को देशभक्त दिखाते रहे. इधर 15 अगस्त 1947 की शाम आने से पहले ही देश में सांप्रदायिक दंगे होने लगे. भारत विभाजन में लाखों हिंदू और मुसलमान मारे गए. विभाजन का कारण कुछ अज्ञान किस्म के लोग महात्मा गांधी को मानते हैं लेकिन असल में विभाजन के जिम्मेदार आरएसएस और हिंदू महासभा जैसे अति हिंदूवादी संगठन और मुस्लिम लीग जैसे इस्लामी चरमपंथी संगठन थे. इनके नेता थे. जिन्होंने देश की एकता को जोड़ने के बजाय, उसे तोड़ने का काम किया. एक दूसरे का डर दिखाया.

श्याम मीरा का यह वीडियो भी देख सकते हैं…

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