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सुख-दुख

अख़बार, टीवी और वेब से गायब होती खोज़ी रिपोर्टिंग पर एक युवा पत्रकार की चिंता

दिनेश पाठक-

उसका करियर कुल जमा एक साल का है। देश के बड़े मीडिया संस्थान में डिजिटल टीम में काम कर रही है। सोशल मीडिया पर उसने सवाल पूछा- इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म अब क्यों नहीं हो रहा? सब के सब बस क्लिक के भूखे क्यों हैं?

बातचीत में उसने जोड़ा कि एक साल का मेरा तजुर्बा यही है कि किसी अंधी सुरंग में आ गयी हूँ। कन्फ्यूज हूँ, क्या करूँ? बड़े सपनों को लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई की, अब लगता है कि गलत फैसला था। वह बस बोले ही जा रही थी। आक्रोश, अफ़सोस सब उसके शब्दों में था। मैं उसे सुनते हुए गुनने-धुनने लगा। जब चुप हो गयी तो मैंने पूछा कि कुछ बचा तो नहीं कहने को तुम्हारे मन में। हँसकर बोली-नहीं सर। सब निकल गया। बहुत दिन से भरी हुई थी। आपने सुन लिया इसलिए सुना सकी। दफ्तर में तो किसी भी सीनियर के पास वक्त ही नहीं है। सब किसी सुरंग में दिखते हैं, मैं भी।

मैंने पत्रकारिता की कमजोरियों पर कोई चर्चा नहीं की। क्योंकि दिक्कतें तो हैं। पर, जिस पेशे में हैं, उससे गिला भी क्यों करना। मैंने खुद पत्रकारिता में रहते हुए अपनी दिशा बदल दी। अब केवल एजुकेशन करियर पर ही लिखता हूँ। बोलता हूँ। स्कूल-कॉलेज जाता हूँ। सच कहूँ तो अच्छा भी लगता है। और मेरे पास आज जो कुछ भी है, उसी पत्रकारिता का ही दिया हुआ है। बुराई करूँ भी तो कैसे? यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि देश के बड़े प्लेटफॉर्म एजुकेशन, करियर का कंटेंट ले रहे हैं। पब्लिश कर रहे हैं।

जिस तरह की भूख इस बेटी में अपने पेशे को लेकर दिखी, मुझे लगा कि अगर सही रास्ता पा गयी तो बहुत आगे निकल जायेगी, अन्यथा भटक सकती है। और इतनी होनहार बेटी का निराश होकर पत्रकारिता छोड़ना पेशे का नुकसान होगा।

मैंने सुझाव दिया कि जब तक तुम्हें इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म का मौका नहीं मिलता है तब तक जिस भी विषय में रुचि हो, उसे पढ़ो और कुछ न कुछ ऐसा रोज लिखो, जिससे तुम्हें संतोष मिले। अपने मन का लिखकर किसी सीनियर को दिखा दो, वे सहमत हों तो अपने ही प्लेटफॉर्म पर छाप देंगे। अगर असहमत हों तो तुम सोशल मीडिया पर उसे चिपका दो। ऐसा करने से तुम्हारी क्रेडिबिलिटी बढ़ेगी, तब भी जब एक बड़े प्लेटफॉर्म पर तुम्हारा काम दिखेगा और तब भी जब तुम सोशल मीडिया पर लिखोगी। समय के साथ चलने की आदत डालो। नदी के बहाव में उल्टा तैरने की कोशिश नुकसान ज़्यादा करती है।

बस ध्यान रखना, कॉपी रिसर्च के बाद ही लिखना। कोशिश हो कि तुम्हारी कॉपी समाज के बड़े तबके को सम्बोधित करे। उसकी आवाज में संतोष का भाव था। अच्छा मुझे भी लगा कि शायद एक बेटी को दिशा मिल सकी।

पर, मेरी नजर में उसकी चिंता जायज है। अब अखबार, टीवी या डिजिटल माध्यमों में इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग न के बराबर हो रही है। देश के सभी बड़े चैनल चंद खबरों को प्याज के छिलके की तरह उतारते हुए कई सैकड़ा खबरें दिखाने का दावा करते हैं। प्रिंट में भी आधी से ज्यादा ख़बरें सरकारी ही छप रही हैं। बाकी प्रेसनोट, नेताओं के भौंडे बयान आदि छप रहे हैं। डिजिटल में फिलहाल अपने देश में अभी वह इनवायरमेंट ही नहीं बन पाया है जहाँ इन्वेस्टिगेशन की संभावना हो।

मैगजीन अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं, जहां इन्वेस्टिगेशन की संभावना हुआ करती थी। साप्ताहिक अखबारों ने काफी पहले दम तोड़ दिया है।

इन सबके बीच पत्रकारिता रूप-स्वरूप चाहे जितना बदले लेकिन चलेगी जरूर। मेरे 33 वर्ष के तजुर्बे में ही जनर्लिज्म ने कई करवट लिए हैं। आगे भी लेती रहेगी। समय के साथ ही चलना होगा। सबको। पूर्वाग्रह लेकर पेशे में एंट्री न लें। जो काम मिले, उसे करते हुए अपने लिए रास्ता तलाशें।

आज भी किसी यूनिवर्सिटी का जर्नलिज्म का कोर्स ऐसा नहीं है, जो युवाओं को जमीनी हकीकत बताता हो। असल कहानी करियर शुरू होने पर ही सामने आ रही है। क्योंकि कॉलेज में हकीकत पढ़ाने वाले न के बराबर हैं।

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