सर्जना शर्मा-
इरा झा और अनंत मित्तल के साथ केवल दिल्ली टाईप दोस्ती नहीं पूरा घरोबा है। रिश्ते निभाना दुख सुख में 24 घंटे साथ खडे रहना कोई अनंत मित्तल से सीखे। बहुत सरल सहज बनावटीपन से दूर है अनंत। इनके साथ मेरी दोस्ती और रिशेते की शुरूआत बहुत अजीब तरह की है।
जब मैं नौकरी के लिए दिल्ली आयी तो पहली नौकरी मित्र प्रकाशन में 500 रुपए महीना की थी। इरा मित्र प्रकाशन में अक्सर अपने लेख देने आयी करती थी, दुबली पतली गोरी चिट्टी।
नवभारत टाइम्स ने 1985 में संपादकीय भर्तियों के विज्ञापन निकाले। मैनें भी अप्लाई किया, लिखित परीक्षा पास की इंटरव्यू स्वर्गीय राजेंद्र माथुर जी ने लिया था। नवभारत टाइम्स ने नियुक्ति पत्र दे दिया। लेकिन मुझे जयपुर जा कर ज्वाइन करना था। मेरी बीजी ने बहुत इमोशनल शर्तें लगा दीं और किसी कीमत पर जयपुर नहीं जाने दिया। उस समय बच्चों की इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि मां -पिता की इच्छा का अनादर करें।
खैर, मेरी बीजी ने नहीं जाने दिया जयपुर और इरा झा का वेट लिस्ट में पहला नंबर था मेरी जगह उनकी नियुक्ति हुई। वे जयपुर चली गयीं तब तक मैं उनको बहुत नहीं जानती थी। अनंत मित्तल की भी उसी बैच में नियुक्ति हुई थी। अनंत ने भी जयपुर में ही ज्वाइन किया। वहीं इरा और अनंत कि दोस्ती हुई दोनों की शादी हुई।
इरा और अनंत के लाइफ स्टाइल में बहुत अंतर था। इरा जज साहिब की बेटी नाज नखरे मंहगे शौक कभी कुछ सस्ता नहीं खरीदती थी। खैर अनंत ने ये शादी निभायी और बहुत अच्छे से निभायी। मैं अक्सर कहती थी इरा यदि मैं जयपुर चली जाती तो तुम्हारी शादी अनंत से कैसे होती। वो भी हंसती और कहती – यार अच्छा होता तुम जयपुर चली जाती तो मैं बच जाती।
फिर ये लोग जयपुर से दिल्ली लौट आए अनंत ने जनसत्ता में नौकरी कर ली और इरा नवभारत में ही रही। मिलना जुलना बहुत कम होता था लेकिव खबर पूरी रहती थी।
मैं भगवान दास रोड वर्किंग वूमैन हॉस्टल में रहती थी वहां एक बार आग लग गयी ALL INDIA WOMEN CONFRENCE की मैनेजमैंट आग के बहाने हॉस्टल खाली करवा कर यहां इंटरनेशनल गेस्ट हाऊस बनवाना चाहती थी। उस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। हमने मीडिया के माध्यम से अपनी लड़ाई लड़ी, मीडिया ने हमारा बहुत साथ दिया पूरे शहर में हमारे लिए सिंपथी की लहर चली सरकार के मंत्री अधिकारी सब हमारे पक्ष में आ खड़े हुए।
उन दिनों अनंत मित्तल जनसत्ता में थे । वे हमारे प्रति बहुत संवेदनशील थे रोज पत्रकार आते हमसे मिलते हर रोज सिटी पेज पर हमारी बड़ी स्टोरी होती थी अनंत मित्तल का इसमें बड़ा योगदान था अनंत के साथ दोस्ती शुरू हुई। फिर धीरे धारे इरा के साथ भी 1999 में हम नोएडा शिफ्ट हो गए। अनंत और इरा उस समय कंचनजंगा सोसायटी में सेक्टर 53 में रहते थे। नोएडा में घर आना जाना शुरू हुआ।
मेरे पापा जी पक्के संघी और सावरकरवादी, अनंत पक्का गांधी वादी और समाजवादी दोनों में खूब गर्मा गर्म बहसें होतीं। लेकिन बीजी पापा जी अनंत और इरा को बहुत प्यार करते थे। बीजी के हाथ का बना यूपी स्टाइल कद्दू आलू और पूरी दोनों को बहुत अच्छा लगता था बहुत अधिकार से दोनों कभी भी बीजी को बनाने के लिए कहते तो बीजी खुशी-खुशी बनातीं इनके आने का इंतजार करतीं। प्यार से खिलाती थी। घंटों गपशप राजनीति पर चर्चा चलती।
इरा झा का अपना जलवा था वो मंहगे स्टोर्स से सामान खरीदती, महंगी साड़ियां, पर्स, सिल्वर, जूलरी। वो अपने पापा के गुणगान हमेशा करती रहती थी। कहती थी हमने तो कभी एक बटन भी अपने कपड़ों में नहीं लगाया कभी खाना नहीं बनाया। पापा कुक रखते थे बटन लगाने फटे कपड़ों की मरम्मत करने दर्जी घर पर आता था। हम दोनों खूब शॉपिंग करते थे एक साथ आम दिनों और दीपावली की शॉपिंग एक साथ करते। खूब पार्टियां करते इरा गाती बहुत अच्छा थी। बहुत शौक था उसको पुराने गाने गाने का। कोई औपचारिकता नहीं थी जब दिल करता एक दूसरे के घर जाते गप्पे मारते खाते पीते थे।
अनंत – इरा का बेटा ईशान और मेरे दोनों भांजे इतनी धमाचौकड़ी करते थे कि तीन बार डबल बेड की प्लाई इन तीनों ने तोड़ी। गोदरेज की अलमारी पर चढ़ कर बेड पर ऊपर से कूदते थे बहुत शैतान थे तीनों। मेरे बड़े भांजे को कोई कम ही पसंद आता है लेकिन अनंत और इरा के प्रति बहुत लगाव रखता है। जब अनंत दो साल पहले इरा को लेकर चैन्नई गए तो कार्तिकेय इनके साथ चैन्नैई में कई दिन रहा।
मेरे पापा जी जब गए तो अनंत ने पूरा टेक ओवर कर लिया अंतिम संस्कार का पूरा इंतजाम मंदिर में मटका लटकाना सब काम अनंत ने किए एक बेटे का फर्ज निभाया। इसी तरह जब मेरी बीजी गयीं तो अनंत हमारे साथ हर कदम पर खड़े रहे।
लेकिन कहते हैं ना कुछ लोगों को दूसरों की दोस्तियां रास नहीं आतीं, मेरी और इरा की एक कॉमन मित्र ने पूरा मंथरा का रोल निभाया और उसने इतना जहर भरा इरा के दिमाग में कि कुछ दूरी बनी लेकिन अनंत और ईशान का व्यवहार पूर्ववत रहा। इरा प्यारी दोस्ती थी जिंदगी जी कर भर कर जीती थी। हमेशा अपनी ठसक में रहती थी। अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करती थी।
नवभारत टाइम्स के संपादक से और टाइम्स हाऊस से लंबी लड़ाई लड़ी लेकिन कभी टूटी नहीं। बाद में दैनिक हिंदुस्तान में नौकरी की। बस्तर का नक्सलवाद खूब कवर किया। वो जितनी हिंदी पत्रकारों में लोकप्रिय थी उतनी ही अंग्रेंजी पत्रकारों में भी थी।
इरा के दोस्तों मित्रों को उसकी कमी खलेगी लेकिन सबसे ज्यादा अकेलापन अनंत मित्तल को होगा। भगवान इरा की आत्मा को सद्गति दे अपने श्री चरणों में स्थान दें। अनंत और ईशान को दुख सहने की क्षमता दे।


