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पत्रकारिता में आएं तो रवीश कुमार की तरह ये गलती न करें!

रवीश कुमार-

पेरिस ओलिंपिक्स के दौरान जब विनेश फोगाट का मामला आया तब उस पर रिपोर्ट बनाने के लिए मेरा शारदा उग्रा, संदीप द्विवेदी और जॉनाथन सेल्वाराज जैसे शानदार खेल पत्रकारों के लेखन से गुज़रना हुआ। तीनों के लेखन में खेल की बारीकी देख कर ख़ुशी भी हुई कि रद्दी पत्रकारिता के दौर में कुछ लोगों के पास लिखने की कला बची हुई है।

जॉनाथन सेल्वाराज की एक-एक लाइन रोमांच से भर देती है। उनकी रिपोर्टिंग लंबे समय से खेल को समझने और देखने से बनी है। कितने साल की मेहनत होगी। साल में हर दिन की मेहनत होगा।

मैं कितने लोगों को जानता हूँ जिन्होंने दो-चार महीने शानदार रिपोर्टिंग की, किताब भी अच्छी लिखी लेकिन उसके बाद मूल काम छोड़ कर अपनी पत्रकारिता का प्रचार करने निकल गए। पहचान बनाने के खेल में लग गए। लेकिन ये वो लोग हैं जो जीवन भर साधना की तरह अपना काम करते रहे। निरतंरता से किसी काम को करने का अपना ही महत्व है।

आप कभी जॉनाथन का लिखा पढ़िएगा। उन्हीं की यह किताब आई है। जगरनॉट ने छापा है। क़ीमत 799 है। यह पेड प्रमोशन नहीं है। खेल के एक शानदार पत्रकार की किताब का ज़िक्र भर है।

मैं खेल, फ़िल्म और साहित्य में ज़ीरो हूँ। देखता हूँ न पढ़ता हूँ। समय नहीं मिला अपने भीतर रुचियों को निखारने का या मैंने समय नहीं निकाला। यह बात मैं अपनी बड़ाई में नहीं कह रहा, बल्कि यह बताने के लिए लिख रहा हूँ कि जब आप पत्रकारिता में आएँ तो तरह-तरह के विषयों को पढ़ा करें। जाना करें। मेरी तरह ये ग़लती न करें।

हो सकता है कि खेल के पाठक जॉनाथन सेल्वाराज को पहले से जानते थे लेकिन मेरे लिए उन्हें हाल-फ़िलहाल जानना कश्मीर देखने से कम नहीं था। वैसे मैं कश्मीर नहीं गया हूँ।

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