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आज के अखबार : बताते हैं कि इस समय की राजनीति देश के लिए चाहे ‘अच्छी’ हो, पत्रकारिता के लिए बुरी है!

संजय कुमार सिंह

वैसे तो आज की सबसे बड़ी खबर यही है कि बंटेंगे तो कटेंगे की खुली चेतावनी के बावजूद इस बार देश में दीवाली बंट कर मनी। आप जानते हैं कि दिल्ली में दीवाली गुरुवार 31 अक्तूबर को मनी लेकिन दीवाली पर विशेष सौदों के लिए खोला जाने वाला शेयर बाजार कल यानी शुक्रवार यानी एक नवंबर को खुला था और कम से कम शेयर बाजार में सौदा करने वालों के लिए दीवाली कल मनी। पूजा के अलावा दीवाली रोशनी और पटाखों से मनाई जाती है। पटाखों पर प्रतिबंध है उसके बावजूद बेरोक-टोक चले। देर रात तक चले। दीवाली की पूर्व संध्या पर अयोध्या का दीपोत्सव भी बुधवार को हो गया था फिर भी शेयर बाजार विशेष सौदों के लिए शुक्रवार को खुला यह महत्वपूर्ण है, लेकिन खबर नहीं है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के प्रमुख विवेक देबरॉय का कल ही 69 साल की आयु में निधन हुआ। आज फैशन डिजाइनर रोहित बल का 63 साल की उम्र में निधन हो जाने की भी खबर है। ये दोनों मौतें इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सरकार ने अभी हाल में 70 पार के लोगों के लिए मुफ्त इलाज की घोषणा की है। दूसरी ओर, बहुत कम उम्र में निधन के मामलों में कोई कार्रवाई या चर्चा नहीं है। केंद्र सरकार की इस योजना को बंगाल और दिल्ली में लागू नहीं किया गया है इसपर प्रधानमंत्री ने अफसोस भी जताया है और राजनीति तो की ही है। यह अलग बात है कि दोनों राज्यों की सरकारों और वहां सत्तारूढ़ दलों ने इसका जवाब दिया है, कारण बताये हैं पर उसे अखबारों में उतनी प्रमुखता नहीं मिली। दोनों मौतें दिल्ली में हुई है जहां इलाज की सुविधा बेहतर बताई जाती है। दोनों लोगों को पैसे की कोई कमी तो नहीं ही थी। काश, आज के अखबारों में इस विशेष दीवाली पर कुछ होता।

ऐसा कुछ नहीं है और सरकार का प्रचार जारी है। उसमें विपक्ष की खिंचाई शामिल है। इसलिए डेमचोक में गश्ती शुरू हो गई और देपसांग में जल्दी ही शुरू होगी – आज भी कुछ अखबारों में लीड है। यह उस देश में उस समय हो रहा है जब आरोप है कि पुलिस उपद्रवियों को दो घंटे अलग रहने और काम करने की छूट देती है पर उसका विस्तार नहीं दिखता। लद्दाख सीमा पर चार साल से बंद (उसका कारण भी शायद ही कभी बताया गया हो) गश्ती फिर शुरू होना कई दिनों से लीड बन रही है। आज यह इंडियन एक्सप्रेस, दि एशियन एज में लीड है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले अधपन्ने पर लीड है, नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है और अमर उजाला में लीड से ऊपर टॉप की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज सरकारी प्रचार की ये दोनों खबरें लीड नहीं हैं, अधपन्ने पर भी नहीं। इंडियन एक्सप्रेस में प्रचार वाली दोनों खबरें हैं। प्रचार वाली दूसरी खबर आज अमर उजाला में लीड है। फ्लैग शीर्षक, मुख्य शीर्षक और उपशीर्षक से आप मामला समझ जायेंगे।  उसके बाद बताता हूं कि इंडियन एक्सप्रेस के साथ-साथ दूसरे अखबारों ने इसे कैसे छापा है।

कर्नाटक की मुफ्त गारंटी योजना ‘शक्ति’ पर कांग्रेस में बवाल, प्रधानमंत्री ने जमकर घेरा। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री की अपनी कई घोषणाओं का क्या हुआ कुछ पता नहीं है और प्रधानमंत्री ने जमकर तब घेरा है जब उसपर छिटपुट सवाल उठते रहते हैं। खासकर रोजगार के वादे पर और वह भी भारी बेरोजगारी के कारण। ऐसे में मोदी जी ने ज्ञान दिया है और यह लीड का शीर्षक है, वादे करना आसान, पूरे करना मुश्किल कांग्रेस जनता के सामने बेनकाब। प्रधानमंत्री ने कहा – हिमाचल, तेलंगाना, राजस्थान और छत्तीसगढ़ कहीं भी विपक्षी दल ने पूरे नहीं किये वादे। यह नहीं कहा कि भैंस भी नहीं खोले या घुसपैठियों को मंगलसूत्र दिया या नहीं। दूसरा उपशीर्षक है, शिवकुमार के बयान से नाराज खरगे बोले गारंटी उतनी ही दें जितनी पूरी कर सकें। आप जानते हैं कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, डीके शिव कुमार उप मुख्यमंत्री हैं और खरगे कांग्रेस अध्यक्ष। अगर उन्होंने मुख्यमंत्री से कुछ कहा तो वह पार्टी का आंतरिक मामला है और पार्टी की लोकतांत्रिक कार्यशैली दिखाता है। नरेन्द्र मोदी इसके लिए कांग्रेस की आलोचना करते थे और अब वही सब भाजपा में है। लेकिन वे आलोचना कांग्रेस की ही कर रहे हैं। यह उनकी राजनीति हो सकती है लेकिन अखबारों को इसे इतना प्रचार क्यों देना चाहिये? खासकर तब जब अपने वादे पूरे करने में उनका हाल ज्यादा बुरा है।

चुनावी वायदे और उनका पूरा नहीं होना, राजनीतिक चर्चा का विषय हो सकता है पर नरेन्द्र मोदी इसके लिए किसी और की आलोचना करें ऐसी स्थितियां तो नहीं ही हैं। वैसे भी, डबल इंजन के उनके प्रचार के आगे राज्य सरकारों की क्या बिसात? यही नहीं, राज्यों की सरकारें कैसे बनती और गिराई जाती रही हैं उसकी पूरी लंबी कहानी है और उसका बने रहना ही खबर है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर का शीर्षक है, कर्नाटक निशुल्क बस यात्रा योजना को लेकर विवाद : फर्जी वादों पर प्रधानमंत्री बनाम खरगे। आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल सरकार ने यह आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार से पैसे नहीं मिलने के कारण वह मनरेगा मजदूरों का भुगतान नहीं कर पा रही है जबकि केंद्र सरकार का कहना था उसमें अनियमितताएं हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इन अनियमितताओं के कारण अगर केंद्र सरकार पैसे नहीं दे और भुगतान नहीं हो पाये तो दोषी राज्य सरकार? दिल्ली में ऐसे कितने ही मामले हैं। फिर भी अखबारों में प्रधानमंत्री के आरोप को प्रमुखता मिली है। इसलिए लोगों को यह दमदार भी लगेगा।

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री की साख अच्छी नहीं है तो वे दूसरों पर आरोप लगाने की राजनीति नहीं कर सकते हैं। और इसलिए खबर नहीं छपनी चाहिये। मेरा मुद्दा यह है कि हम अपनी पत्रकारिता से अगर किसी का समर्थन या विरोध करेंगे तो वह कौन होगा, कैसे चुना जायेगा। निश्चित रूप से यह चुनाव मेरी जाति या पारिवारिक धर्मांधता के आधार पर नहीं होनी चाहिये। इसका फैसला उम्मीदवार की योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर किया जाना चाहिये। इसकी परख होती रहनी चाहिये और समय के साथ, जरूरत पड़ने पर इसमें बदलाव भी होना चाहिये वरना हर पांच साल पर चुनाव का कोई मतलब नहीं है। अगर लोग जाति धर्म या किन्हीं कारणों से बनी राय पर ही कायम रहेंगे तो चुनाव नतीजे क्यों बदलेंगे जब चुनाव का मकसद लोगों को अपने फैसले बदलने का मौका देना ही होता है। लोग अपना फैसला जानकारी और सूचनाओं के आधार पर लेते हैं तो इसी को प्रदूषित किये जाने का काम चल रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने मोदी का प्रचार तो किया है, चुनाव आयोग को लिखी कांग्रेस की चिट्ठी का जिक्र पहले पन्ने पर नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने कांग्रेस पर मोदी के हमले और चुनाव आयोग पर कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक आतिशबाजी कहा है और दीवाली के बाद राजनीतिक आतिशबाजी शुरू हुई शीर्षक से दोनों दलों की खबरों (आरोपों) को एक साथ छापा है। एक खबर का शीर्षक है, गैरवास्तविक वायदों के कारण कांग्रेस बुरी तरह एक्सपोज हो गई है : प्रधानमंत्री। दूसरा शीर्षक है, कांग्रेस ने निष्पक्षता की कमी के लिए चुनाव आयोग की आलोचना की, पैनल ने पलट वार किया। बेशक, कहा जा सकता है कि पलटवार शीर्षक में नहीं है तो दोनों खबरें बराबर कैसे हैं। असल में चुनाव आयोग ने कहा है, कांग्रेस का बयान आयोग की आलोचना ज्यादा लगता है चुनाव आयोग द्वारा स्पष्ट किये गये मुद्दों का जवाब कम। जाहिर है, मामला ऐसा है नहीं और हरियाणा चुनाव पर कांग्रेस के आरोप, उनका जवाब और उसपर कांग्रेस की प्रतिक्रिया इतनी आसान और सरल नहीं है कि 1600 पन्ने के कथित जवाब को एक लाइन में कहा जा सके। उदाहरण के लिए, चुनाव आयोग पर आरोप ईवीएम के 99 प्रतिशत तक चार्ज रहने और इनमें भाजपा को ज्यादा वोट होने का है। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने 1600 पेज में जो भी कहा हो, कौन पढ़ेगा और कैसे पता चलेगा। चुनाव आयोग खुद क्यों नहीं बता रहा है और इसके लिए कितने पन्ने चाहिये? ऐसे में मुझे नहीं लगता है कि चुनाव आयोग का साथ दिया जा सकता है और मैं जो लिखता हूं उसमें ऐसा इसीलिए नहीं होता है। भले इसे देशभक्ति से जोड़ दिया जाये।

यही नहीं, दिलचस्प है कि इस समय सरकार का साथ दे रहे चंद्रबाबू नायडू भी ईवीएम के विरोधी रहे हैं। पुरानी खबरों के अनुसार, चुनाव आयोग ने 2019 में तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष एन चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश सरकार के तकनीकी सलाहकार, हरि कृष्ण प्रसाद वेमुरु से मिलने से इनकार कर दिया था। असल में चुनाव आयोग ने सितंबर, 2009 में उन्हें अपने सामने ईवीएम हैक करने के लिए आमंत्रित किया था। हरि प्रसाद की टीम को अपना काम पूरा करने से पहले ही चुनाव आयोग ने रोक दिया था और कह दिया कि उनकी टीम ईवीएम हैक नहीं कर पाई। काम रोकने के लिए चुनाव आयोग की दलील थी कि ईवीएम खोलने से ईसीआईएल के पेटेंट का उल्लंघन होगा। इसके बाद, 29 अप्रैल 2010 को हरि प्रसाद ने एक तेलुगू चैनल पर लाइव दिखाया कि ईवीएम को कैसे हैक किया जा सकता है। इसमें जिस ईवीएम का उपयोग किया गया था उसका इस्तेमाल महाराष्ट्र चुनाव में हुआ था। 12 मई 2010 को महाराष्ट्र के राज्य चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र पुलिस से इसकी शिकायत की। इसके बाद उनके खिलाफ़ मामला दर्ज किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अब चुनाव आयोग उन्हें ईवीएम चोर कहता है और तब भी कहा जब वे एक राज्य सरकार के तकनीकी सलाहकार थे।

बीबीसी की एक पुरानी खबर के अनुसार हरि कृष्ण प्रसाद वेमुरु ने इलेक्शन वॉच के संयोजक वीवी राव को भी तकनीकी सहायता दी है। ईवीएम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वालों में राव भी हैं। 2019 में उन्होंने बीबीसी से कहा था, “2009 में हमने ईवीएम से संबंधित 50 सवालों के साथ चुनाव आयोग से संपर्क किया था। उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिलने पर हमने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।” आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बाद में वीवपैट लगे और अब चर्चा है कि तकनीकी रूप से यह संभव है कि पर्ची कुछ दिखे और वोट किसी अन्य को जाये। यह सब बताना और आम आदमी के लिए यह सब जानना जरूरी है क्योंकि – चुनाव आयोग ने ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतों को लेकर आयोजित सर्वदलीय बैठक के बाद सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को ईवीएम हैक करके दिखाने की चुनौती 2017 में दी थी। चुनौती को स्वीकार करने की निर्धारित समय सीमा तक दो दलों ने इसका आवेदन किया पर बाद में चुनौती स्वीकार नहीं की। चुनाव आयोग और उसके समर्थक इसका उपयोग यह साबित करने के लिये करते हैं कि हैक किये जा सकने के आरोप निराधार हैं। पर सच्चाई यह है कि हैक करने वाले को ईवीएम खोलने नहीं दिया गया और जब टीवी पर हैक करके दिखा दिया गया तो ईवीएम चोरी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और वर्षों बाद भी चुनाव आयोग उनसे मिलने को तैयार नहीं हैं। एक सरकार के तकनीकी सलाहरकार के रूप में भी नहीं।

इसका मकसद लोगों को डराने के अलावा क्या हो सकता है। इसीलिये, दिल्ली सरकार ने ईवीएम हैक करने का वीडियो विधानसभा में दिखाकर बनाया है और वह यू ट्यूब पर है लेकिन उसके बारे में कहा जाता है कि वह सरकारी ईवीएम नहीं है और सरकारी ईवीएम सुरक्षा और निगरानी में रहते हैं। बिजली गुल होने और सीसीटीवी बंद होने की शिकायतों का जवाब 1600 पेज में हो तो किसे पता चलेगा लेकिन अखबार में यह खबर छपी है कि – आम नागरिकों में से एक, मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स जिले के बोलोंग आर संगमा ने फरवरी 2023 में सोशल मीडिया पर वीडियो साझा किया तो उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया। चुनाव आयोग का रवैया अभी भी वही है। अब यह नाम गूगल करने पर कोई खबर नहीं मिलती है, इसलिए यह पता नहीं चला कि उसे जमानत मिली या अभी भी जेल में है। इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस के आरोप, चुनाव आयोग का 1600 पेज का जवाब और उसकी भाषा तथा आरोपों पर कांग्रेस के एतराज के जवाब में आयोग कुछ भी कहे, विश्वास कैसे हो?  

आप जानते हैं कि दीवाली पर पटाखों से प्रदूषण होता है। पर मुद्दा पराली जलाना बना दिया गया है जबकि किसानों के पास आसान विकल्प नहीं है। गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए जो कुछ किया गया है उससे गाड़ियां महंगी हो रही हैं। पटाखे नहीं चलाकर प्रदूषण कम रखने में योगदान किया जा सकता है। यह इसलिए भी जरूरी है कि इससे जो बीमार नहीं हैं वो हो रहे हैं और जो हैं वो बेहद परेशान होते हैं। पर इसे कम करना मुद्दा नहीं हैं। प्रतिबंध का पालन नहीं हो रहा है जबकि लोगों को खुद पटाखे चलाने से बचना चाहिये। लेकिन इसे धर्म से जोड़ दिया गया है और त्यौहार पर पटाखा चलाना धर्म की रक्षा के लिए जरूरी है। यानी जान की बाजी लगाकर धर्म की रक्षा हो रही है। यह जिनकी प्राथमिकता है उनके बारे में मैं नहीं जानता लेकिन अखबारों और संपादकों से मैं उम्मीद करता हूं कि वे विवेक दिखायेंगे। आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड यही है, “दीवाली की रात पूरी दिल्ली में (प्रतिबंध के) उल्लंघन का बोल-बाला”। टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड का शीर्षक है, मौसम ने शहर की वायु की रक्षा की 2015 से दीवाली के बाद दूसरी बार सबसे साफ हवा। मुझे लगता है कि ऐसा हो भी तो महत्वपूर्ण यह था कि पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद पटाखे चले और रोकने की कोई कोशिश नहीं हुई। दिल्ली के मंत्री एलजी से पहले से कह रहे थे, इसके बावजूद।

हिन्दू में आज जीएसटी की वसूली बढ़ी पर अभी भी लक्ष्य से दूर, लीड है। मुझे इससे महत्वपूर्ण लगता है कि वायु प्रदूषण की चर्चा की जाये। जीएसटी वसूली की खबर तो हर महीने आती है। दीवाली पर प्रदूषण आज भर का मुद्दा है। उसके बाद भुला दिया जायेगा। हालांकि, द हिन्दू में आज छह कॉलम की  खबर का शीर्षक है, दीवाली के एक दिन बाद 99 शहरों की हवा की गुणवत्ता खराबरिकार्ड की गई। बेशक यह गंभीर बात है लेकिन मीडिया का इसपर ध्यान नहीं है और राजनीतिक कारणों से ऐसे मामलों को प्रमुखता मिल रही है जिससे आम जनता का कोई भला नहीं होने वाला है। उदाहरण के लिए बुजुर्गों की रेल यात्रा छूट को खत्म करके प्रधानमंत्री अफसोस जता रहे हैं कि वे बंगाल और दिल्ली के बुजुर्गों की सहायता नहीं कर पा रहे हैं। आइये देखें वायु की गुणवत्ता का मामला किस अखबार में आज कितना है। दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक हिन्दी में इस प्रकार होगा, दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध धुंए में हवा हो गया; एक्यूआई बहुत बुरा। नवोदय टाइम्स में यह खबर टॉप पर तीन कॉलम में है और विज्ञापन के बाद इतनी ही जगह है। शीर्षक है, खूब चलाये पटाखे, तेज हवा से गैस चैंबर बनने से बची दिल्ली।

अमर उजाला में यह खबर तीन कॉलम से ज्यादा में है। शीर्षक है, आतिशबाजी के बाद दिल्ली से हिमाचल तक धुंध की मोटी चादर। उपशीर्षक है, दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंध दिखा बेअसर। जो शीर्षक सबसे बड़े फौन्ट में होना चाहिये था वह सबसे छोटे में है, विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में दिल्ली शीर्ष परइंडियन एक्सप्रेस में प्रदूषण या प्रतिबंध बेअसर होने से संबंधित खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अमेरिका द्वारा  भारत की 10 इकाइयों पर प्रतिबंध की खबर आज हिन्दू  में अंदर के पन्ने पर है और इसकी सूचना पहले पन्ने पर है। प्रदूषण की खबर नवभारत टाइम्स में लीड के ऊपर टॉप पर है। शीर्षक है, पटाखों से फैला जहर, हवाओं ने बचाया। जनसत्ता में यह लीड है। फ्लैग शीर्षक है, पटाखों पर प्रतिबंध की उड़ी धज्जियां, राजधानी में छाई धुंए-धु्एं की परत। मुख्य शीर्षक है, तीन साल में इस बार सबसे ज्यादा प्रदूषित रही दिल्ली की दीपावली। हिन्दुस्तान में भी यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, दिल्ली एनसीआर में खूब पटाखे फूटे लेकिन तेज हवाओं से घटा प्रदूषण। मुख्य शीर्षक है, राहत : शुक्र है इस दीवाली हवा कुछ बेहतर रही। 

अपेक्षित, लेकिन अप्रत्याशित

आज की खबरों में सबसे अलग टेलीग्राफ की लीड है। फ्लैग शीर्षक है,  अनचाहे गर्भ की सूची में बंगाल के तीन जिले। मुख्य शीर्षक हैस अपेक्षित, लेकिन अप्रत्याशित। नई दिल्ली डेटलाइन से जीएस मुदुर की खबर के अनुसार, शोधकर्ताओं ने 82 भारतीय जिलों की पहचान की है, जहां अनचाहे या अवांछित गर्भधारण की दर असाधारण रूप से अधिक है। इनमें बंगाल के तीन, दिल्ली के छह और केरल के चार जिले शामिल हैं। इसके लिए परिवार नियोजन सेवाओं में कमी, लड़के की इच्छा या छोटे परिवार की पसंद को प्राथमिकता देना मानते हैं। यह अध्ययन – राष्ट्रव्यापी डेटा से अनचाहे गर्भधारण का पहला जिला स्तरीय विश्लेषण है। इससे पता चला है कि शोधकर्ताओं ने जिसे जिलों के हॉटस्पॉट या भौगोलिक क्लस्टर कहा है वहां अवांछित गर्भधारण की दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। भारत का राष्ट्रीय औसत प्रति 1,000 गर्भधारण पर 91 अनपेक्षित गर्भधारण (9.1 प्रतिशत) है। यह उच्च आय वाले देशों में प्रति 1,000 महिलाओं पर 34 के औसत से तीन गुना के करीब है। लेकिन राष्ट्रीय औसत जिलों में बड़ी असमानताओं को छुपाता है।

दिल्ली में दो हत्या, कश्मीर में दो घायल

अभी तक की चर्चा में आज जो खबरें छूट गईं उनमें दिल्ली में दो लोगों की हत्या के साथ जम्मू और कश्मीर के बडगाम जिले के मगम क्षेत्र में आतंकियों के हमले में उत्तर प्रदेश के दो प्रवासियों को गोली लगने की खबर है। यह एक पखवाड़े में पांचवां हमला है। इंडियन एक्सप्रेस में खबर दो कॉलम में है और दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में है। यह अमर उजाला में भी दो कॉलम में है। शीर्षक है, कश्मीर में फिर आतंकी हमला, यूपी के दो मजदूरों को गोली मारी। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सिंगल कॉलम में है। भाजपा सरकार आतंकवाद पर बड़ी-बड़ी बातें करती रहती है पर सच्चाई यह है कि 2019 चुनाव से पहले पुलवामा हमला हुआ था तो आप जानते हैं सीआरपीएफ के जवाने के काफिले रो रास्ते में विस्फोटकों से लदी एक कार आ गई थी और उसमें विस्फोट से हादसा हुआ था। कई वर्षों बाद आज भी उसकी जांच से संबंधित मामले सार्वजनिक नहीं हैं जबकि काफिले के रास्ते में विस्फोटकों से लदी कार का पहुंचना ही आश्चर्यजनक है। शुरू में कहा गया था कि कार में 300 किलो विस्फोटक थे जो सामान्य कद-काठी के चार लोगों के वजन से ज्यादा हुआ। बाद में वह कम होकर 60 किलो रह गया था लेकिन आज तक पता नहीं चला, मीडिया ने नहीं बताया कि गाड़ी कौन सी थी, कहां, किसके नाम पंजीकृत थी और उसके बाद क्या पता चला और क्यों नहीं चला। यह शेल कंपनियां बंद करने के दावों के बावजूद 20,000 करोड़ रुपये लगाने वाले का पता नहीं चलने और जानने की कोशिश करने वालों के साथ जो हुआ और क्यों नहीं जांच हो रही है के मुकाबले ज्यादा गोपनीय है। मीडिया अगर इन मुद्दों को उठाता रहता तो अभी तक सब पता होता लेकिन वह मन की बात में मस्त है। 

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